अरुन्धत्ती राय ने अपने देश विरोधी बयानों से मेरी रांची की धरती को दागदार कर दिया, जिस धरती पर अनेक स्वतंत्रता सेनानिओयों ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी. लेकिन, नक्सलियों से बेइन्तहां प्रेम और सहयोग रखनेवाली महाश्वेता देवी भी कुछ कम नहीं हैं. उन्होंने भगवान् बिरसा पर लिखे अपने एक उपन्यास में बिरसा को बाल चोर की पदवी दे दी है. दोनों ने झारखण्ड की धरती को अपवित्र किया है.
लेकिन, ये दोनों महिलाएं ऐसा क्यों करती हैं ? वस्तुतः दोनों बहुत भूखी हैं. बहुत दिनों से अखबारों में हेड लाईन नहीं बटोर पा रहीं हैं. अरुन्धत्ति तो कुछ-कुछ सफल रहीं, लेकिन महाश्वेता देवी को ज्यादा सफलता नहीं मिली, क्योंकि वह नक्सलियों के मामले में ढुलमुल हो गयीं. परन्तु, अरुंधती तो शर्म जैसी नाचीज से नाता ही नहीं रखतीं हैं, सो अभी तक कश्मीर सम्बन्धी अपने मूर्खतापूर्ण बयान पर अडिग रह कर, नाम कमाने के रास्ते पर चल निकली हैं. एक कहावत है कि गुमनामी से बदनामी बेहतर होती है.
एक और महान हैं, अडिगाजी, उनको हनुमान राम के पेड सर्वेंट नजर आते हैं. उनको भारत में सभी दिशाओं में अन्धेरा और चोर टाईप के लोग नजर आते हैं, सिर्फ एक वे ही शरीफ और अच्छे हिन्दुतानी शेष रह गए हैं. अगर वे हिंदुस्तान से चीन चले जायें, जहाँ उनके आका विराजते हैं, तो हिन्दुस्तान, चोरों और उचक्कों का देश शेष रह जायेगा.
पता नहीं, इस वेला में हमारे माओ प्रेमी कम्युनिस्ट लोग कहाँ छुपे बैठे हैं ? किस बिल में समा गए हैं ? वे एक भी शब्द अपने प्रिय विचारक, प्रबुद्ध और प्रगतिशील अरुन्धत्ती की सेवा में मुह से नहीं निकाल रहे हैं. लगता है कि उनका गला ममता के खिलाफ बोलते-बोलते सूख गया है. कोई आगे बढ़ कर उनको चीन का मिनरल वाटर तो पिलाओ भाई....अगर कम्यूनिस्टों का हलक सूख गया है तो चीन का मिनरल वाटर अरुंधती को ही पिलाओ, ताकि वे अब अरुणाचल, असम, मेघालय, नगालैंड,सिक्किम, भूटान आदि पर भी अपनी माओवादी टिपण्णी से देश को अनुगृहीत कर सकें.
एक थीं महारानी लक्ष्मी बाई, जिन्होंने देश कि अस्मिता के लिए तलवार उठा कर बंदूकधारी अंग्रेजों के सामने खड़ी हो गयीं और अंतिम सांस तक अंग्रेजो से लोहा लिया. एक हैं माओ की वीरांगना अरुन्धत्ती, बहुत मोडर्न हैं, और कभी हाथ की कलम तो कभी अपनी जुबान को तलवार की तरह इस्तेमाल कर भारत माता को लहूलुहान करती रहती हैं. वह चीन का साल्ट खातीं हैं, सो हम उनको भारतीय नमकहराम तो कतई नहीं कह सकते हैं. सो, अब यह आम लोगों पर छोड़ता हूँ कि वे इस क्रांतिकारी महिला को किस श्रेणी में रखना चाहेंगे. यह माओ प्रिया या भक्तिनी, सचमुच आदरणीया हैं, देश के लिए कोहिनूर हैं. जांबाज हैं. चीन के लिए भारतीय संस्करण की देश भक्तिनी हैं. जो भी हैं, गजब की हैं. अजब की हैं. पता नहीं उनको अपने बयानों पर कब बुकर-सूकर टाईप का पुरस्कार न मिल जाये, जैसे भारत की झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वालों को कुत्ता कहने के कारण आस्कर अवार्ड मिल गया था. सो मैं अडवांस में अरुन्धत्ती को संभावित किसी बड़े पुरस्कार के लिए लाल सलाम कहते हैं और बधाइयाँ भी देते हैं.
बुधवार, 27 अक्टूबर 2010
सोमवार, 25 अक्टूबर 2010
राहुल गाँधी को गंगा में फेंक देना चाहिए: शरद यादव
शरद यादव ऊपर से बहुत घबराहट में हैं, लेकिन अंदर से मुस्कुरा रहे हैं. उन्होंने अपने अटपटे भाषण से राहुल और नीतीश दोनों पर निशाना साधा है. उन्होंने राहुल और उनके स्वतंत्रता सेनानी परिवार की कटु आलोचना करते हुए कहा है कि भाषण देते हुए अपने कुरते की आस्तीन चढ़ाने वाले राहुल को गंगा में फेंक देना चाहिए.
उनको जो बोलना था, वे पूरी चालाकी के साथ बोल गए लेकिन, इससे नीतीश के लिए चुनावी रास्ता कठिन हो गया, क्योंकि शरद ने चुनावी मुद्दा ही बदल दिया और जो मुद्दा बढ़ाया है, वह घनघोर आलोचनों का शिकार होगा ही. अब शरद यादव की पार्टी जदयू भाजपा के साथ है, जो आरएसएस की एक इकाई है और आरएसएस ने तो कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन तक नहीं किया, उलटे उसने उस अभिनव भारत का साथ दिया जिसके एक सदस्य ने महात्मा गाँधी की ह्त्या कर दी थी. इस प्रकार शरद यादव ने जदयू के एक तीर(छाप) से दो-दो निशाने साधे और नीतीश को बता दिया कि वे उसके सामने दादागिरी न दिखाया करें.
इधर नीतीश, जदयू को अपनी जागीर की तरह देखने लग गए हैं. शरद जी को चटनी समझने लग गए हैं, सो शरद जी ने उनको समाजवादी दांव दिखला दिया है.
चाहे कुछ भी हो, शरद जी को भाजपाई लोगों के साथ रहते-रहते स्वतंत्र सेनानिओं के खिलाफ बोलने की भाजपाई-बीमारी लग गई है. भाजपाई लोग महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, डा. राजेंद्र प्रसाद आदि की आलोचना किया करते थे, लेकिन वे मोती लाल नेहरू की आलोचना नहीं किया करते थे, परन्तु शरद जी ने मोती लाल नेहरू से लेकर राहुल गाँधी तक की आलोचना कर और व्यक्तिगत आक्षेप कर, एक नया रिकार्ड बना दिया है. लेकिन, यह रिकार्ड नीतीश का भी रिकार्ड ख़राब कर देगा. पर शरद जी को क्या गम कि नीतीश की सरकार बिहार में फिर बने न बने.....नीतीश को पार्टी पर हावी होने की सजा तो मिलनी ही चाहिए. सो उन्होंने सजा दे दी है और अपने चुनावी भाषण का स्वयं लाभ उठा गए हैं.
अगर नीतीश को पता होता की शरद जी ऐसा गुल खिलायेंगे तो, वे उनको भी नरेंद्र मोदी की श्रेणी में रख देते. वरुण गाँधी की श्रेणी में रख देते- कट्टर सांप्रदाइक श्रेणी में रख देते.
अपने को असली और श्रेष्ठ सेक्यूलर मानने वाले नीतीश जी का मानना है कि भाजपा घटाव नरेन्द्र मोदी, घटाव वरुण गाँधी, एक विशुद्ध सेक्यूलर पार्टी है और अगर लोहिया जी जीवित होते तो वे आरएसएस और भाजपा की दोहरी सदस्यता ले लेते. आचार्य नरेंद्र देव जीवित होते तो वे समाजवाद में भाजपा के योगदान पर नीतीश के चश्मे से एक कीताब लिख डालते और उसे बुकर पुरस्कार मिलता.
उनको जो बोलना था, वे पूरी चालाकी के साथ बोल गए लेकिन, इससे नीतीश के लिए चुनावी रास्ता कठिन हो गया, क्योंकि शरद ने चुनावी मुद्दा ही बदल दिया और जो मुद्दा बढ़ाया है, वह घनघोर आलोचनों का शिकार होगा ही. अब शरद यादव की पार्टी जदयू भाजपा के साथ है, जो आरएसएस की एक इकाई है और आरएसएस ने तो कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन तक नहीं किया, उलटे उसने उस अभिनव भारत का साथ दिया जिसके एक सदस्य ने महात्मा गाँधी की ह्त्या कर दी थी. इस प्रकार शरद यादव ने जदयू के एक तीर(छाप) से दो-दो निशाने साधे और नीतीश को बता दिया कि वे उसके सामने दादागिरी न दिखाया करें.
इधर नीतीश, जदयू को अपनी जागीर की तरह देखने लग गए हैं. शरद जी को चटनी समझने लग गए हैं, सो शरद जी ने उनको समाजवादी दांव दिखला दिया है.
चाहे कुछ भी हो, शरद जी को भाजपाई लोगों के साथ रहते-रहते स्वतंत्र सेनानिओं के खिलाफ बोलने की भाजपाई-बीमारी लग गई है. भाजपाई लोग महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, डा. राजेंद्र प्रसाद आदि की आलोचना किया करते थे, लेकिन वे मोती लाल नेहरू की आलोचना नहीं किया करते थे, परन्तु शरद जी ने मोती लाल नेहरू से लेकर राहुल गाँधी तक की आलोचना कर और व्यक्तिगत आक्षेप कर, एक नया रिकार्ड बना दिया है. लेकिन, यह रिकार्ड नीतीश का भी रिकार्ड ख़राब कर देगा. पर शरद जी को क्या गम कि नीतीश की सरकार बिहार में फिर बने न बने.....नीतीश को पार्टी पर हावी होने की सजा तो मिलनी ही चाहिए. सो उन्होंने सजा दे दी है और अपने चुनावी भाषण का स्वयं लाभ उठा गए हैं.
अगर नीतीश को पता होता की शरद जी ऐसा गुल खिलायेंगे तो, वे उनको भी नरेंद्र मोदी की श्रेणी में रख देते. वरुण गाँधी की श्रेणी में रख देते- कट्टर सांप्रदाइक श्रेणी में रख देते.
अपने को असली और श्रेष्ठ सेक्यूलर मानने वाले नीतीश जी का मानना है कि भाजपा घटाव नरेन्द्र मोदी, घटाव वरुण गाँधी, एक विशुद्ध सेक्यूलर पार्टी है और अगर लोहिया जी जीवित होते तो वे आरएसएस और भाजपा की दोहरी सदस्यता ले लेते. आचार्य नरेंद्र देव जीवित होते तो वे समाजवाद में भाजपा के योगदान पर नीतीश के चश्मे से एक कीताब लिख डालते और उसे बुकर पुरस्कार मिलता.
शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010
सबके सब एक दूसर को नंगा-अधनंगा कर रहे हैं
बिहार में चुनावी राजनीति का पारा सातवें आसमान पर है. नेतालोग एक दूसर पर बेरहमी से आरोपों की बरसात कर रहे हैं. जनता बहुत खुश है कि सबके सब एक दूसर को नंगा-अधनंगा कर रहे हैं. लेकिन, लालू जी को बड़ी चिंता चिंता यह है कि नीतीश को रोकें कि राहुल को. बेचारे छटपटा रहे हैं. उनका दिमागे नहीं काम कर रहा है. पहले से उनको राहुल फैक्टर के बारे में कोई खाश अंदाज नहीं था. लेकिन, जो पहले चरण के चुनाव में दिखा वह चिंताजनक है.
वैसे, नीतीश जी कम परेशान नहीं हैं. उनको भाजपा के नेताओं के भाषणों से परेशानी है, क्योंकि वे घुमाफिरा कर साम्प्रदाइक बात परोस रहे हैं. दूसरी ओर, कांग्रेस सेंधमारी कर रही है.
राहुल सेन्ट्रल फंड का हिसाब मांग रहे हैं, और हिसाब-किताब रखने का काम तो बिहार में कब से बंद पड़ा है. उनको तो सिर्फ नरेंद्र मोदी के द्वारा भेजे गए पैसे के हिसाब से मतलब था, जिसको लौटा कर उन्होंने अपने आप को सेक्यूलर साबित करने का प्रयास किया है. यह उनके जीवन का सबसे बड़ा साहसिक कदम था. इस लोहियावादी ने साबित कर दिया कि वह भाजपा के दलदल में रहने के बाद भी बिल्कुल साफसुथरा है. पांच सौ प्रतिशत सेक्यूलर है.
आज हर कोई अपने आप को सेक्यूलर साबित करने पर तुला है. अब आडवाणी जी बिहार आये और बोले कि हमारे नरेन्द्र मोदी जी आकंठ सेक्यूलर हैं, लेकिन क्या करें उनके खिलाफ प्रचार ज़रा गलत हो गया.
मोदी जी के प्रचार आइटम से क्रोधित हो कर नीतीश जी ने भी उनके खिलाफ कुछ गलत प्रचार कर दिया. उनको और उनके कदम चिन्हों पर चल रहे वरुण गाँधी को भी बिहार दौरे से अलग कर कुछ ज्यादा ही गलत प्रचार कर दिया. वर्ना मोदी जी तो सच्चे सेक्यूलर हैं. अब इससे अधिक दुःख कि बात क्या हो सकती है कि मोदी जी कि छवि सिर्फ गलत प्रचार के कारण ख़राब हो गई है. ये अखबारवाले भी बड़े वाहियात हैं. जो मन में आता है अखबार में मोदी जी के नाम पर छाप देते हैं. बेचारा सच्चा सेक्यूलर सिपाही साम्प्रदाइक घोषित हो गाया है.
वैसे,आडवाणी जी भी कुछ कम सेक्यूलर नहीं हैं और चर्चा है कि इस बार शायद वे मस्जिद बनवाने के लिए रथयात्रा का प्रोग्राम बनायेंगे....उनको किसी भी हालत में बस एक बार प्रधानमंत्री बनना है. इस दिशा में उन्होंने जिन्ना साहब की तारीफ़ में क्या क्या नहीं किया. उनके चेले जशवंत जी भी ने जिन्ना भक्ति पर किताब लिख डाली. जशवंत जी तो पकिस्तान में तो काफी पॉप्यूलर हो गए, लेकिन अब देखना है कि गुरु चेले कि जोड़ी अपने नए इमेज को भारत में कितना भुना पाती है.
वैसे, नीतीश जी कम परेशान नहीं हैं. उनको भाजपा के नेताओं के भाषणों से परेशानी है, क्योंकि वे घुमाफिरा कर साम्प्रदाइक बात परोस रहे हैं. दूसरी ओर, कांग्रेस सेंधमारी कर रही है.
राहुल सेन्ट्रल फंड का हिसाब मांग रहे हैं, और हिसाब-किताब रखने का काम तो बिहार में कब से बंद पड़ा है. उनको तो सिर्फ नरेंद्र मोदी के द्वारा भेजे गए पैसे के हिसाब से मतलब था, जिसको लौटा कर उन्होंने अपने आप को सेक्यूलर साबित करने का प्रयास किया है. यह उनके जीवन का सबसे बड़ा साहसिक कदम था. इस लोहियावादी ने साबित कर दिया कि वह भाजपा के दलदल में रहने के बाद भी बिल्कुल साफसुथरा है. पांच सौ प्रतिशत सेक्यूलर है.
आज हर कोई अपने आप को सेक्यूलर साबित करने पर तुला है. अब आडवाणी जी बिहार आये और बोले कि हमारे नरेन्द्र मोदी जी आकंठ सेक्यूलर हैं, लेकिन क्या करें उनके खिलाफ प्रचार ज़रा गलत हो गया.
मोदी जी के प्रचार आइटम से क्रोधित हो कर नीतीश जी ने भी उनके खिलाफ कुछ गलत प्रचार कर दिया. उनको और उनके कदम चिन्हों पर चल रहे वरुण गाँधी को भी बिहार दौरे से अलग कर कुछ ज्यादा ही गलत प्रचार कर दिया. वर्ना मोदी जी तो सच्चे सेक्यूलर हैं. अब इससे अधिक दुःख कि बात क्या हो सकती है कि मोदी जी कि छवि सिर्फ गलत प्रचार के कारण ख़राब हो गई है. ये अखबारवाले भी बड़े वाहियात हैं. जो मन में आता है अखबार में मोदी जी के नाम पर छाप देते हैं. बेचारा सच्चा सेक्यूलर सिपाही साम्प्रदाइक घोषित हो गाया है.
वैसे,आडवाणी जी भी कुछ कम सेक्यूलर नहीं हैं और चर्चा है कि इस बार शायद वे मस्जिद बनवाने के लिए रथयात्रा का प्रोग्राम बनायेंगे....उनको किसी भी हालत में बस एक बार प्रधानमंत्री बनना है. इस दिशा में उन्होंने जिन्ना साहब की तारीफ़ में क्या क्या नहीं किया. उनके चेले जशवंत जी भी ने जिन्ना भक्ति पर किताब लिख डाली. जशवंत जी तो पकिस्तान में तो काफी पॉप्यूलर हो गए, लेकिन अब देखना है कि गुरु चेले कि जोड़ी अपने नए इमेज को भारत में कितना भुना पाती है.
शनिवार, 16 अक्टूबर 2010
लोहिया के लोग भाजपा की गोद में
तिवारी जी रुष्ट हो कर बोले," देखिये, राहुल बिहार में अकेले चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा रहे हैं, तो हम इन साम्प्रदायिक तत्वों से अलग हो कर चुनाव क्यों नहीं लड़ सकते हैं ? १९77 से हम लोग कई पार्टियों में आते जाते रहे हैं. सो हमारा अनुभव है राजनीति डील करने का. अगर हमें पूर्ण बहुमत न भी आते तो हम कांग्रेस से सहयोग ले सकते हैं. लालू से नहीं लेते तो कम से कम हम लोजपा का दरवाजा तो खटखटा सकतेहैं. हम कब तक मोदी एंड पार्टी का दबाव झेलते रहेंगे?
नेता जी कहिन, अरे तिवारीजी, ई तो हम भी जानते हैं कि समझदार मतदाता समझता है कि हम लोग घुमा फिरा के आरएसएस के साथ हैं, लेकिन जाहिल वोटरलोग ई बतवा नहीं न जानता है. मोदी को बिहार आने से रोक के सब जाहिल वोटरों का हमने मन जीत लिया है, समझे? इतना ही नहीं, हमने तो प्रथम चरण के चुनाव में रथवाले अडवाणी को भी बिहार आने से रोक दिया है. उ यहाँ आता और फिर से राम मंदिर, राम मंदिर रटने लगता....गडकरी भी उस बुढवा को नहीं देखना चाहता है. सो गडकरी मेरी बात मान कर अडवाणी जी का कार्यक्रम बदल दिए हैं.
तिवारी जी का क्रोध फिर भी कम नहीं हो रहा था-अरे जब हम लालू के साथ थे, तब उसके 'माई' से परेशान थे और अब भाजपा के भगवाधारियों से. पता नहीं ये कौन ब्रांड के हिन्दू हैं. कभी जिन्ना की जय करते हैं तो कभी राम की. अडवाणी और जशवंत ने जिन्ना को कितना हाईलाईट किया, लेकिन लोहिया के बारे में कुछ भी नहीं लिखा और किताब पाकिस्तान में बेच के पैसा भी खूब टान लिया. सोचते हैं क़ि हम भी एगो किताब लोहिया पर लिखिए दें- लोहिया के लोग भाजपा की गोद में.
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