गुरुवार, 26 अगस्त 2010

अमिताभ बच्चन झारखण्ड पुलिस के मुखबिर!

ओपरेशन डिवाइड:एक अफसाना मुखबिरी पर!



"मैं गोपनीय सेवा राशि हूं…मैं किसी की सेवा नहीं कर सकती हू्…आला अधिकारी मुखबिर की मुखबिरी को तौल कर मेरा एक छोटा सा टुकड़ा दे देते है…मुखबिर आम तौर से एक गरीब, दबा-कुचला आदमी होता है, जो अपनी जान पर खेल कर अपराधियों की सूचना अधिकारियों को देता है। आम तौर से मुखबिरी के बाद, अगर वह जिन्दा बच गया तो, एक लाख की प्राप्ति रसीद पर अपना दस्तखत कर दस हजार रुपए भी जेब में डालते हुए, अपने आप को भाग्यवान मानता है।"

          "एक बार मैं एक्सपायरी डेट के निकट थी और मेरे आला अधकारी भी! सो उनको टुकड़े-टुकड़े कर मेरा
हिसाब बैठाना था। आला अधिकारी जी मुझको देखते और खूब गालियां निकालते-मनहूस, तुमको बंटते हुए अपनी
थैली भरने के लिए कोई मुखबिर नहीं मिल रहा…वैसे, एक मुखबिर को बुलाया है और उसके अनेक शुभ नाम तय
करने के लिए नाम बाबा को भी आमंत्रित किया है। नाम बाबा कुछ ले दे कर उस मुखबिर के एक दर्जन शुभ नाम घोषित कर देंगे…फ़िर वह प्राप्ति रसीद पर, कभी अमिताभ तो कभी हेमामालिनी के नाम पर धन प्राप्ति की बहुत सी
रसीदों पर दस्तखत मार देगा और धन की थैली मेरे ही हाथ में रह जायेगी! अरे, पहले के मुखबिर बड़े भोले-भाले
होते थे…उनको हम जहां हुक्म देते थे, वे वहीं दस्तखत या अंगूठा ठोंक देते थे…और ये अब के मुखबिर, बड़े चंट होते हैं, आडिटरों से भी अक्खड़ होते हैं…क्या मजाल की बिना रसीद ठीक से पढे रसीद पर गुग्गी या अंगूठा ठोंक दें…।"

         "खैर एक भयावह रात को जब बिजलियां कड़क रही थीं …चमगादर पर फड़फड़ा रहे थे…तभी मेरे आला
अधिकारी आये और मुझे कई टुकड़ों में बांट कर अलग-अलग पैकेटों में डाल दिया। सबसे छोटे पैकट पर लिखा गोलू मुखबिर ! साथ ही शुरू हो गई ओपरेशन डिवाइड!"

        "गोलू मुखबिर के सामने आला अधिकारी का बिगड़ैल हाउंड रह रह कर भौंकता और गोलू की और खूंखार
इरादे से झपटता। दो सिपाही बंदूक ताने ख्ड़े थे…एक सिपाही अपने हाथ में अलग-अलग किस्म की कलम रखे हुए
था…आला जी ने कड़कती आवाज में गोलू से पूछा-तुमने अपने बारहों नाम के दस्तखत करने की प्रैक्टिस कर ली है? बेचारा गोलू अपना सिर हिला कर रह गया…ऐसी परिस्थिति में मुखबिर की बोलती बंद हो जाती है।"

         "खैर, गोलू गवाह ने सबसे अंत में अपने असली नाम की रसीद पर दस्तखत किया और पूरी ईमानदारी के साथ आला जी ने गोलू को सबसे हेल्दी पैकेट पकड़ा दी…वैसे, गोलू को राशि का दस प्रतिशत दो सिपाहियों के लिए
ढीले करने पड़े।"
        "खैर, मैं टुकड़े- टुकड़े बंट गयी और मेरे टुकड़े के टुकड़े नीचे तक के अधिकारियों तक पहुंचे…वे लोग बहुत
कर्तव्यनिष्ठ थे-ठीक 10 बजे तुम्हारे ठिकाने पर छापा पड़ेगा…समझे कि नहीं?"

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

ओके.....हिंदी जब हम लोगों का मदर टंग है तो

राष्ट्रीय दल का कार्यालय....और लोकल समस्या पर छुटभैये नेता टाकिंग कर रहे थे...एक ने कहा ए गो समस्या का प्राब्लम रहे तो बात है, यहाँ तो केतना केतना साल गुजर गया एक बार भी लारिलप्पा नहीं किये...बिना एम टानिक के अब एक्को दिन नहीं चलेगा....बीच में थोड़े दिनों के लिए इनडैरेक्ट  मौको मिला तो बड़कन नेता लोग टकसाल ऊपरे-ऊपरे ले उड़े...यहाँ  वर्कर का तो कोई महत्व का इम्पोर्टेंस  नहीं है....

            दूसर छुटभैये ने कहा," अरे का बतियाते हो तुम...हम नहीं जानते हैं कि  'के  राज' में तुम केतना लारीलप्पा किए हो ? उ जे तुमारा बसवा चल रहा है उ का तुमरे कमाई का है? का उ ऊपरे से सड़कवा  पर टपक गया ?'

         तभी एक लल्लू जी आये और अखबार दिखलाते हुए पूरी बौद्धिकता के साथ बोले,'अरे तुम लोगन सिर्फ अपनी समस्या के प्राब्लेम पर टाकिंग पर टाकिंग कर रहे हो...ज़रा ई खबरवा तो पढ़ो...केंद्र में हमरा राज है और केंद्र का परतीनिधी हमरे नेतवा का सुनबे नहीं  करता है. उ जो सुनता है तो सिर्फ मंत्री भैया का ही सुनता है...लेकिन अब नया रिप्लेसमेंट आयेगा...जो सिर्फ हिन्दी जानेगा और कुच्छो  नहीं और हमरे नेता जी को सुनेगा... और मंत्री भैया जी को घासे नहीं डालेगा....समझे... इसको कहते हैं राष्ट्रभाषा का राजनीतिक यूज ....देखो,  मंत्री  भैया जी भी अंग्रेजी नहीं जानते हैं और फिर भी जब बोलते हैं तो हमरे अंग्रेजी के टीचर जी हँसते हैं.. लेकिन उनका दिल्लीवाली  हिंदी का  स्पोकेन केतना अच्छा है...अभियो जा के तुम लोगन हिंदी फ्लूएंट स्पीकिंग  के लिए दिल्ली वाली हिंदी का स्पोकेन क्लास करो...और नहीं सीखोगे तो खेतवा में ग्रेज़िंग  करते रह जाओगे...बूझे कि नहीं बूझे ?'
       मुरली जी ने अपनी मुरली बजाई," हाँ ई तो सेंटे परसेंट ओके है कि हिंदी जब हम लोगों का मदर टंग है तो सीखना ही होगा. मेरे को भी सीखने का मन है, उ भी दिल्ली वाला हिंदिये...थोड़ा डिफीकल्ट है लेकिन  इंगलिश जेतना डिफीकल्ट नहीं....हम तो देल्लीए वाला  हिंदी का प्रैक्टिस करबे करते हैं....प्रैक्टिस  विल मेक योर हिंदी परफेक्ट...अंडरस्टैंड  किये कि नहीं?"

         एक छुटभैया जी से रहा नहीं गया,"देखो बस स्टैंड के एजेंट जी, यहाँ आला जी हिंदी जानते हैं कि नहीं, इसका कौनो सवाले में क्वेश्चने  नहीं उठाता है. सवाल में क्वेश्चंवा  ई है कि 'के -कांड' का  सी बी आई से जाँच काहे हो रहा है...ई जांच का फंदवा तो सभ्भे पार्टिया के बड़कन नेतवन   पर परबे  करेगा...चार पार्टी  का सिंडीकेट बना है ताकि "के कांड" की जाँच से बचने का रस्तवा तलाशा जाये....अंडरस्टैंड कि नहीं अंडरस्टैंड?

सोमवार, 23 अगस्त 2010

लेकिन जो कुछ हुआ अच्छा ही हुआ !




रांची में "भास्कर" के उदय होने से पहले मुझे जिसकी आशंका थी वही हुआ-अन्य हाफ रेट पर स्वयं उतर गये!  वे पहले ग्राहकों से ज्यादा पैसा क्यों लेते थे, यह नहीं पूछ्ना चाहता हूं क्योंकि, मैं दिये गए पैसे वापस नहीं मांगता। खैर, रांची में जिस रणनीति के साथ नये समाचार पत्र का स्वागत होता है, उसी रणनीति के साथ "भास्कर" का स्वागत हुआ। लेकिन, जो कुछ हुआ, अच्छा ही हुआ! किन्तु, एक बात सोचने की है-ऐसी रणनीति वे भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए क्यों नहीं बनाते है? कहां चली जाती है उनकी आन्दोलनकारिता जब झारखड में भ्रष्टाचार की गंगा
बहने लगती है? अरबों रुपयों की लूट के बाद जब कोई भ्रष्टाचार दूसरे माध्यम से उजागर हो जाता है तो, कलमची अचानक आंदोलन करने लगते हैं…लगता है कि वे गंगा स्नान कर लेने के बाद, कुछ दान करने के मूड में आ जा जाते हैं!


           रांची में पत्रकारिता को अनेक तरह से प्रदूषित किया गया है-वैचारिक प्रदूषण के साथ-साथ प्रदूषणकर्ताओं ने कश्य्प काउंटर या कोडा काउंटर से भी बहुत कचरा उठा कर पत्रकाफ़िता में डाला है! यहां नक्सली फूले फले, आम आदमी सूखते गये…यहां साम्प्रदायिकता पनपा और उसमें खाद-बीज डाल कर माननीय भी कहला गए। हर पांच पदस्थापन में से, दो पर तो उनका ही हक बनता रहा। जनता के नाम पर आंदोलन करते-करते वे बड़े रईश हो गये…बड़े उद्योगपति हो गये…और जनता ठगी का शिकार हो गयी!


          गरीब चोर चोरी करे तो खूब शोर किया और पावर हाउसों ने लूट की तो उनकी मलाई मारी चाय पीते रहे। सिपाहियों को ट्रक ड्राइवरों से बीस रुपये सड़क-टैक्स वसूलने की तसवीरें छापी गईं और अरबों की लूट पर खबर आम होने तक मौन व्रत में रहते रहे और जैसे ही उनके बिना प्रयास के कोई समाचार या कोई दबाया गया सच सामने आया तो, वे ब्रेकिंग न्यूज देने लगे ! जैसे पुलिस से विधिवत जारी समाचार को कोई ब्रेकिंग न्यूज की संज्ञा दे रहा हो!


           एक बार शहर के लोग डर गये-धारावाहिक समाचार आ रहा था कि रांचीवासियों को प्रदूषित पानी नल के द्वारा पिलाया जा रहा है। समर्थन में जांच रिपोर्ट भी छापी गई। पंद्रह दिनों तक रांची के लोग हैजा और अन्य खतरनाक बीमारियों के संभावित खतरे के बीच परेशान रहे। किसी ने हेमामालिनी द्वारा प्रचारित वाटर प्यूरिफायर खरीदा तो किसी ने और ब्रांडों के। यहां वाटर प्यूरिफायर खूब बिके…कुछ लोगों ने तो अपने बच्चों की किताबें नहीं खरीदीं, लेकिन वाटर प्यूरिफायर जरूर खरीद लिया! पर रांची के लोग तब अचंभित रह गये, जब जांच रिपोर्ट छापने
वाले ने ही कह दिया की जांच की रिपोर्ट ही प्रदूषित थी! नल से तो शुद्ध मिनरल वाटर सप्लाई हो रहा था! वह बड़ी हेल्दी रिपोर्टिंग थी और रिपोर्ट लिखने वाले का हेल्थ भी खूब सालिड देखा गया!


          एक बार ज्ञानरंजन चुनाव लड़ रहे थे। तभी उर्दू में एक पर्चा वितरित किया गया। उसमें कहा गया था कि ज्ञानरंजन का असली नाम विजयरंजन है, जिसे एक बार दंगा कराने के कारण के आरोप में पुलीस ने गिरफ्तार किया था। जब उस झूठे पर्चे का सच एक ने सामने ला कर रख दिया तो उसे नौकरी से हाथ गंवानी पड़ी और अपनी नवजात बच्ची को दूध के बिना बिलखते देखना पड़ा। किसने लिखा और छापा था यह पर्चा? क्या झूठे पर्चे का प्रकाशन जनहित या लोकतंत्र के हित में है?


          महोदय, यहां स्वहित की नहीं जनहित वाली पत्रकारिता की जरूरत है…पत्रकारिता के नाम पर कथित आंदोलन चलाने की नहीं। समाचार पत्र को अगर समाचार पत्र ही रहने दिया जाए तो अच्छा होगा।








रविवार, 22 अगस्त 2010

कामन वेल्थ गेम का घोटाला हमारे लिए पर्सनल एंड पालिटिकल वेल्थ साबित होगा

भ्रष्टाचार पर एक महामानव भाषण दे रहे थे- सोनिया जी देखें, कलमाडी जी ने कितना लूटा है और कितना लुटाया है. देखिये, हम तो इस मामले में ज़रा जोर दे कर बोल नहीं रहे हैं. मामला बड़ा सीरीअस है. इस कामन वेल्थ गेम से हमारे देश की प्रतिष्ठा जुडी है. आप जानते ही हैं कि हमारी पार्टी पूरी तरह दूध से धोई है.

          देखिये, यह बात सच है कि  मेरे तीस पैंतीस सांसद प्रश्न के बदले घूस लेते हुए पकडे गए थे. पूरी दुनिया ने उनको टीवी पर घूस लेते देखा था. लेकिन, यह मामला ज्यादा दिनों तक पब्लिक के बीच में नहीं टिका. हम खुश नसीब हैं कि हमारे विरोधियों  को किसी  मामले को लंबा खींचने का टेक्नीक  मालूम ही नहीं है. वे गोएबोल्स जी को कभी अपना भगवान् या गुरू मानते ही नहीं. खैर, हमारे उन सांसदों के खिलाफ घूस लेने का  मामला प्रमाणित था, सो हम लोगों ने उन सांसदों के खोने का गम नहीं मनाया. एक दम से गुमसुम रह गए.

          हाँ, मैं आज जिस कुर्सी पर बैठा हूँ, उसी कुर्सी पर बैठे, मेरे एक पूर्वर्ती  राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी पूरी दुनिया ने घूस लेते हुआ देखा. उनका भी बोरिया बिस्तर हमने बांध कर नागपुर पार्सल कर दिया. उस समय भी हमने कुछ नहीं कहा. लेकिन, कलमाडी के मामले में तो हम ने साफ़ साफ़ कहा है कि दोषी के खिलाफ ठोस कार्यवाही  हो. अब सोनिया जी पर डिपेंड  करता है  कि वे कब घोटाले  की जाँच करवाती हैं और कब कलमाडी को कमंडल पकड़ाती  हैं. जाँच-वांच  का काम हमारे मुताबिक़ ही सोनिया जी गेम हो जाने तक रोके रखना चाहती हैं. यह तो हमारे हक़ में है. इस कामन वेल्थ गेम का घोटाला हमारे लिए पर्सनल  एंड पालिटिकल वेल्थ साबित होगा.

          हाँ, हम इस मामले को बिहार चुनाव में जोर दे कर उठाएँगे, क्योंकि अभी इस पर ज्यादा जोर  मारने से एक बड़ा मामला चुनाव के पहले ही हवा में गुम हो जायेगा. सो,  अभी हम इस मामले को हल्का हल्का सुलगाये  रखेंगे. जिन्दा रखेंगे. ठीक बिहार चुनाव के समय हम इस मामले को तोप के आगे रख कर, बिहार में उछाल देंगे. यह सालिड मामला है. जब हम बोफोर्स तोप पर एक चुनाव जीते थे,  तभी हम समझ गए थे कि पब्लिक आरोप में विश्वास करती है, अफवाह में विश्वास करती है, वह कोर्ट के फैसले से पहले हमारे फैसले को तरजीह देती है. विश्व के किसी भी लोकतंत्र में ऎसी जनता नहीं मिलेगी. हम खुश नसीब हैं.

       देखिये, हम जानते थे कि बोफोर्स मामले में कोई नहीं फंसेगा, लेकिन  हमने उस मामले को सच साबित करने के लिए भ्रष्टाचार के  अमाउंट से चार गुना ज्यादा पब्लिक का पैसा खर्च कर दिया, तो कर दिया. जब तक मामले पर जाँच चलती रही मामला गर्म रहा और बेचारे राजीव जी पर लोग शंका करते रहे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बोफोर्स मामले में राजीव जी को दोषी नहीं ठहराया और न क्वाचेत्री को. जब हमारे हाथ में सी बी आई थी, तब भी हम प्रमाण खड़ा या पैदा नहीं कर पाए.  लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी हम जब चाहते हैं, बोफोर्स की बात करते हुए  थकते नहीं हैं.

          हाँ,  उस समय जरा जी घबराया था, जब एक विदेशी कोर्ट ने बोफोर्स केस के एक  अभियुक्त को बिना सबूत के गिरफ्तार करने की हमारी सरकारी एजेन्सी की मांग पर जुर्माना लगा दिया था. हम तब भी ज़रा घबराये थे जब इसी मामले में अजीताभ बच्चन ने इंग्लॅण्ड के एक कोर्ट में  कुछ समाचार पत्रों पर केस कर दिया था और समाचार पत्रों ने फटा-फट मान हानि का जुर्माना भर के छुट्टी पा ली थी. लेकिन, पब्लिक मेमोरी पर हमको पूरा भरोसा था. पब्लिक की मेमोरी बड़ी शार्ट होती है. और हमारा अनुमान ठीक ही निकला. लोगों ने इस फैसले पर ध्यान ही नहीं दिया. सो आज भी हम बोफोर्स पर बोलते हैं.

          हाँ, इसी मामले को उठाते हुए एक दलबदलू  नेता ने जोश में बड़ी गड़बड़ी कर दी थी- कह दिया था,"हमारी सरकार बनी तो मै बोफोर्स घोटाले से जुड़े सारे नामों को सरकार बनने के सात दिन के अन्दर जारी कर दूंगा. घोटालेबाजों की लिस्ट मेरी जेब में है." लेकिन, कोई लिस्ट उनके पास नहीं थी.  पब्लिक की मेमोरी बड़ी शार्ट होती है, सो किसीने नेता जी के वादे को ज्यादा याद नहीं किया. 

         देखिये, भ्रष्टाचार कई तरह के होते हैं. सिर्फ पैसों की लूट को आप भ्रष्टाचार क्यों मानने की गलती करते  हैं ?. राजनीतिक भ्रष्टाचार पर भी मेरे विचार और नीति बहुत ही स्पष्ट है. ज़रा सुनिए,  अयोध्या मामले पर हमने  कितना शोर मचाया. उससे अधिक हमारे विरोधियों ने शोर मचाया.  हम चाहते थे कि हमारे विरोधी इस मामले में सच बोलते हुए हमारे खिलाफ खूब बोलें, खूब शोर मचाएं और सभी विरोधियों ने वैसा ही किया.  वे खूब बोले. बस हमारा काम बन गया. इस मामले पर हमने खूब वोट काटा. ऐसे राजनीतिक भ्रष्टाचार को  आज की राजनीति कहते हैं. सो सिर्फ भावना भड़का कर वोट लेने की जो हमारी तरकीब थी, जो नीति थी, वह गोएबेल्स महोदय की कृपा से पूर्ण हो गयी.

        अब आपको बता दें कि हमारी सफलता का राज है, प्रचार पर ध्यान देना और थेथरोलाजी से काम लेना। जब नेता थेथरोलाजी से काम लेता है तो जनता पर बार बार दबाव पड़ता है। हम जितनी बार अपनी बात को दुहराते हैं उतनी ही बार जनता भ्रम में पड़ जाती है और सोचने लगती है कि जब कोई इतने दम के साथ कुछ बोल रहा है तो कुछ न कुछ तो जरूर सच है। और यही हमारा फंडा है।

               

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

भारत में गोएबेल्स के बन्दों पर एक छोटा सा फ़साना

      
           इन दिनों राजनीती में इतिहास गढ़ने वालों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है. जसवंत जी ने जिन्ना का इतिहास गढ़  दिया तो पहले भाजपा ने उनको कुछ दिनों के लिए इतिहास बनना दिया और फिर स्वागत कर के ले आये वापस,  क्योंकि उनके जैसा इतिहास गढ़ने वाला और दूसरा अभी उनकी पार्टी में है ही कहाँ. इतिहास गढ़ने के लिए जिगर होना चाहिए. उपने गढ़े हुए इतिहास को पाकिस्तान या विदेशों में बेच  की   कला होनी चाहिए.

          जिनका अपना इतहास बहुत काला  रहा हो, उनके लिए दूसरों के सच्चे इतिहास को झुठलाने की जरूरत होती है. झूठा इतिहास लिखने के लिए बहुत मेहनत  करनी होती है. गोएबेल्स महोदय को अपना ईश्वर मानना पड़ता है.  झूठे इतिहास और प्रोपगंडा करने की  कला का भीषण प्रचार गोएबेल्स महोदय ने किया था. उनका कहना था कि आप एक झूठ  सुबह से बोलना शुरू करें  तो, शाम तक आपको स्वयं लगने लगेगा कि आप सच  ही बोल रहे हैं. सो इतिहास गढ़ने वालों ने गोएबेल्स के मंदिर अपने काले दिल में बनाने शुरू कर दिए. और अब गोएबेल्स की पूजा करना वे  अपना पहला  धर्म मानते हैं.
          एक महोदय ने पहले सरदार बल्लव भाई  पटेल पर रिसर्च कर डाला और उनको नेहरु का पक्का विरोधी साबित करने की कोशिश की. उनके संगठनों ने उनका जन्म दिन और जयंती मानना शुरू कर दिया. और जन्म दिन मानते हुआ या फिर जयंती मानते हुए, नेहरू की छवि धूमिल करने के लिए, गोएबेल्स के मन्त्रों  का प्रयोग शुरू  कर दिया. लेकिन, एक दिन एक साधारण व्यक्ति  उनसे पूछा," महोदय, मेरी समझ में नहीं आता कि आप सरदार बल्लभ भाई पटेल की इतनी तारीफ़  करते हो, जब  उन्होंने ही  आपके संगठन को दो बार प्रतिबंधित करने का काम किया था. क्या आप  इसे स्पष्ट  करेंगे ?"
          अब महोदय क्या स्पष्ट करते ?   उनका तो मकसद था सरदार बल्लभ भाई पटेल के नाम पर नहरू की छवि को धूमिल करने का. वे तो आकाश में धूल फेंक रहे थे, ताकि सूरज को ढँक कर कुछ अन्धेरा फैलाया जा सके.

          एक महोदय को दिल में आ गया  कि वे कश्मीर का एक नया इतिहास लिख दें. तो उन्होंने कलम उठाई और ऊं जय गोएबेल्स कहा और शुरू हो गए.....सबसे पहले उन्होंने तय किया कि वे कल्पित  दस्तावेजों को गढ़ने की फैक्ट्री खोलेंगे. इस  फैक्ट्री  में  जो दस्तावेज गढ़े जायेंगे, उनको आम आदमी के बीच परोसा जाएगा.   फिर तय किया कि किस किस राष्ट्रनायक को खलनायक बनाना है. सो उन्होंने इतिहास गढ़ना और उसे प्रचारित करना शुरू कर दिया. उनको उपने इस गढ़ंत  इतिहास से देश भर में बहुसंख्यक  वोट फिर से कब्जियाना था, जिसे वे श्री राम को धोखा  देने के कारण खो बैठे थे. उन्होंने श्री राम का मंदिर वहीँ बनाने की घोषणा की थी लेकिन  कहीं भी मंदिर नहीं बनाया. अगर बना देते तो उनका चुनावी मुद्दा ही समाप्त हो जाता. सो वे बेवकूफ तो थे नहीं कि श्री राम जी का मंदिर बनवा देते और अपने मुद्दे की ह्त्या कर देते.

         महोदय जी ने अपने गुरू गोएबेल्स से आशीष लिया. गोएबेल्स ने उनको सपने में आ कर बताया," हे वत्स! कोरा  झूठ  चमत्कारपूर्ण नहीं होता है. आधा सच और आधा झूठ का मिक्सचर  बनाओ और  अपने  कुत्सित  लक्ष्य  को  प्राप्त करो. मेरा पूरा पूरा आशीष तुमको है. कश्मीर जाओ और वहां की समस्या रूपी आग में घी डालो और खुश रहो. जब कश्मीर में पाकिस्तानी  आतंकी जोर लगायें और दंगा करें तो अपने विरोधियों की जम कर आलोचना करो, सरकार की आलोचना करो और सीना ठोंक कर गर्व से कहो कि  सरकार विफल है, निकम्मी है, देशद्रोही है.....तुम कोई भी आरोप लगा सकते हो...आरोप  लगाने के लिए किसी आधार की जरूरत नहीं होती है. बस, आरोपों को बार बार दुहराते चले जाओ, तुमको भी लगने लगेगा कि बेटे तुम सत्य बोल रहे हो.बहुतों का इस प्रोपगंडा से ब्रेन वाश हो जायेगा और वे भी तुम्हारी तरह ही सोचने लगेंगे."
           फिर क्या था, उनका गढ़ंत इतिहास तेजी से फलने लगा. सभी जानते हैं कि झूठ कि गति अनंत होती है. सो हजारों लोग, उस नए स्वाद के इतिहास में डूब गए. लेकिन, क्या होगा मेरे देश का जिसकी आजादी बड़ी कुर्बानी के बाद मिली है ? यह गोएबेल्स के चेले नहीं सोचते हैं. लेकिन समय बड़ा बलवान होता है. उसके सामने सच के अलावा कुछ भी ज़िंदा नहीं बचता है.

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

महंगाई के पीछे किस किस के हाथ

      महंगाई  को लेकर बहुत सी पार्टियों के नेता लोग अपनी छाती पीट रहे हैं. महंगाई के मसले पर महंगी से महंगी रैलियां निकाल रहे हैं. हर रैली के बाद बड़े-बड़े प्रेस कन्फेरेंसे कर रहे हैं, ताकि उनका मुखड़ा छपे और उनका वक्तब्य भी. पर सवाल है कि महंगाई किसने बढाई है ? अमेरिका की मंदी ने या फिर पिछले साल की कम वर्षा ने ? शायद, दोनों ने या सचमुच  दोनों ने?  क्या विश्वभर में फैली मंदी का कुछ असर भारत पर भी पडा है?  प्रश्नों के जवाब जो भी हों, यह बात तय है कि  इन पार्टियों को जब कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं मिल रहा था, तब इन पार्टियों ने   महंगाई के नाम पर राजनीतिक रोटियां  सेंकिनी शुरू कर दी.
      लेकिन, काम करने वाले प्रधानमंत्री ने इन पार्टियों के नेताओं को महंगाई के मुद्दे पर, इससे निजात पाने के लिए उपाय सुझाने का निवेदन किया तो, ये अगल-बगल झाँकने लग गए! आलोचना करना आसान है, लेकिन कुछ कर के दिखाना आसान नहीं.
      भाजपा के शासन काल में  एक वित्तमंत्री जी थे, यशवंत सिन्हा जी. ये महोदय चंद्रशेखर सरकार में भी वित्त मंत्री थे. और ये जनाब जब भी वित्त मंत्री बने देश को कंगाल बनाने का काम किया. तब  वाजपेयी  जी  ने इनको देश का अहित करने वाला वित्त मंत्री कहा. बाद में, जब सिन्हा जी भाजपा की शरण में आ गए तो बाजपाई जी ने इनमें न जाने कौन सा गुण देख लिया कि  इनको देश का एक बार फिर से वित्त मंत्री बना दिया. लेकिंग जल्दी ही,  इनके काम काज  की देश भर में इतनी तीखी आलोचना हुई कि बाजपेयी जी ने उनको वित्त मंत्री के पद से हटा दिया और अपने चहेते और जिन्ना समर्थक  जसवंत सिंह को वित्त मंत्री बना दिया. दोनों के नाम में ज्यादा का अंतर नहीं था और काम करने के अंदाज में भी. जब बाजपेयी जी का शासन शाइनिंग इंडिया के स्लोगन के साथ डाई आउट कर गया तो, मनमोहन सरकार ने देश की वित्तीय  स्थिति को सम्हाला. लेकिन, मजे की बात है आज यशवंत सिन्हा जी भी महँगाई पर भाषण झाड़ रहे हैं. वित्त व्यवस्था के वे इतने बड़े जानकार हैं  तो, उनको यह बताना चाहिए  कि किन किन गलत नीतियों के कारण आज भारत में महंगाई है. इस महंगाई के पीछे पूर्व की सरकारों की किन किन गलत नीतियों का हाथ है और उसमे एक असफल वित्त मंत्री के रूप में उनका कितना हाथ है ? महंगाई की प्रक्रिया एक दिन या  दो चार वर्षों कि वित्त व्यवस्था  से ही नहीं प्रभावित  होती है, उसके पीछे लम्बे अतीत की वित्त ब्यवस्था और कुछ अन्य तथ्य भी शामिल होते हैं.
       विपक्ष का काम है, तथ्य के आधार पर  आलोचना करना लेकिन,  कुतर्क करना और लगातार कुतर्क करते रहना, विपक्ष का काम नहीं है. विपक्ष ने महँगाई के नाम पर देशव्यापी  बंद कराया, उससे देश की जनता को इस महँगाई में १३ हजार करोड़ की हानि उठानी पड़ी. हजारों दैनिक मजदूरों और फेरीवालों के घर में बंदी के दिन चूल्हे नहीं जले. उन ग़रीबों का क्या कसूर था जो आज कमाते हैं और आज खाते हैं. बंदबाज नेताओं के लिए तो उनके  भारत बंद ने, उनको समाचार पत्रों में लीड स्टोरी बनाने की ख़ुशी दी. ग़रीबों को एक रात भूखे सोने से उनको  क्या फर्क पड़ता है. उनको तो जनता की भावना को भड़काना था. अपना भाव जमाना था. उनको जमीनी हकीकतों से क्या लेना देना.  आखिर ऐसे विपक्ष को क्या कहा जा सकता है ? गैरजिम्मेदार? नाकाबिल ?  शायद, वे इन टिप्पणियों के भी काबिल नहीं हैं.
       क्या कारण है की विपक्ष के पास आज कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है ? वस्तुतः भाजपा हो या लेफ्ट पार्टियाँ, जदयू हो या सपा, बसपा हो या राजद, सभी पार्टियाँ अपने अन्दर के झमेलों से परेशान हैं. भाजपा एक अनुभवहीन, आर.एस.एस. द्वारा थोपे गए नेता नितीन गडकरी  के हाथ में है. उनको पता  ही नहीं  है कि उनको करना क्या है और क्या नहीं करना  है. वे एक कस्बाई नेता की तरह व्यवहार  कर रहे हैं.
        जदयू में अध्यक्ष शरद पावर और बिहार के मुख्यमंत्री तथा जदयू के नेता नीतीश जी में  नहीं पट नहीं  रहा है. नीतीश शरद के चहेते और भाजपा के पोस्टर नेता मोदी जी के खिलाफ अभियान  चलाये हुए हैं. नीतीश को बिहार चुनाव में मुस्लिम वोट बचाने की फ़िक्र है तो शरद को अपने क्षेत्र के लिए हिन्दू वोट बचाने की फ़िक्र है.
राजद और लोजपा के सामने अस्तित्व का संकट बना हुआ है.
         राजद को मिला राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा, चुनाव आयोग ने समाप्त कर दिया है, लेकिन लालू जी इंटरनॅशनल गुरु हैं, उनको इसेसे  क्या फर्क पड़ता है? वे जमे हुआ हैं और एक साथ सभी दलों को झटका देने के फ़िराक में हैं, केवल लोजपा को छोड़ कर. लालू जी ने अपने कल के दुश्मन नंबर वन पासवान  जी को अपना हमदम बना कर, कल को भुला दिया है.
          दूसरी ओर,  नीतीश जी तो  चुनाव में उन  दोनों की दुश्मनी की कहानियों और उनके द्वारा एक  दूसरे के खिलाफ  दिए गए पुराने बयानों  को फिर से हरा तो करेंग ही. कल के साथी और तीनतिलंगे के नाम से मशहूर नीतीश, लालू और पासवान, एक दूसरे की  मजबूतियों  और कमजोरियों को बखूबी जानते हैं. सो चुनाव संग्राम शुरू होते ही वे एक दूसरे के खिलाफ पोल खोलो अभियान  शुरू कर देंगे. कोई लोकलिहाज़ की वे परवाह नहीं करेंग. और चुनाव अभियान पूरी तरह से सच्चे-झूठे आरोप अभियान में तब्दील हो जायेगा.
       लालू और पासवान तो नीतीश राज के  ग्यारह हज़ार करोड़ के घोटाले पर अपनी हवा बनाने की कोशिश करेंगे और मतदाताओं के सामने  नीतीश की मुस्लिम नीति की धज्जियाँ उड़ायेंगे. नीतीश चारा घोटाले  की जिक्र करेंगे तो लालू और पासवान कहेंगे कि नीतीश तो इंसानों का चारा हजम कर गए, बाढ़ और सुखाड़ के धन को भी लूटा. यानी सभी एक दूसरे की खूब बखिया उधेरेंगे. एक दूसरे पर कीचड़ के गोले दागेंगे. काफी गंदगी फैलेगी. काफी मनोरंजन भी होगा. झूठ बोलने की एक लम्बी प्रतियोगिता शुरू हो जायेगी. छुटभैये नेता लोग भी चक-चक कपड़े पहन कर वक्तव्यों  की बाँग लगाने लगेंगे.
       शब्द सस्ते हो जायेंगे और लोकतंत्र कुछ और बदनुमा हो जायेगा. फिर एक नई सरकार बनेगी...फिर लूट का एक नया खेल, नयी लूट के लिए शुरू हो जाएगा. फिर कुछ नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण देंगें और नए तरीके से भ्रष्टाचार  शुरू कर देंगे. लेकिन कब तक चलेगा यह सिलसिला? शायद, तब तक जब तक जनता जाति, धर्म,भाषा, क्षेत्र, आदि से ऊपर उठ कर, अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करेंगे.