ओपरेशन डिवाइड:एक अफसाना मुखबिरी पर!
"मैं गोपनीय सेवा राशि हूं…मैं किसी की सेवा नहीं कर सकती हू्…आला अधिकारी मुखबिर की मुखबिरी को तौल कर मेरा एक छोटा सा टुकड़ा दे देते है…मुखबिर आम तौर से एक गरीब, दबा-कुचला आदमी होता है, जो अपनी जान पर खेल कर अपराधियों की सूचना अधिकारियों को देता है। आम तौर से मुखबिरी के बाद, अगर वह जिन्दा बच गया तो, एक लाख की प्राप्ति रसीद पर अपना दस्तखत कर दस हजार रुपए भी जेब में डालते हुए, अपने आप को भाग्यवान मानता है।"
"एक बार मैं एक्सपायरी डेट के निकट थी और मेरे आला अधकारी भी! सो उनको टुकड़े-टुकड़े कर मेरा
हिसाब बैठाना था। आला अधिकारी जी मुझको देखते और खूब गालियां निकालते-मनहूस, तुमको बंटते हुए अपनी
थैली भरने के लिए कोई मुखबिर नहीं मिल रहा…वैसे, एक मुखबिर को बुलाया है और उसके अनेक शुभ नाम तय
करने के लिए नाम बाबा को भी आमंत्रित किया है। नाम बाबा कुछ ले दे कर उस मुखबिर के एक दर्जन शुभ नाम घोषित कर देंगे…फ़िर वह प्राप्ति रसीद पर, कभी अमिताभ तो कभी हेमामालिनी के नाम पर धन प्राप्ति की बहुत सी
रसीदों पर दस्तखत मार देगा और धन की थैली मेरे ही हाथ में रह जायेगी! अरे, पहले के मुखबिर बड़े भोले-भाले
होते थे…उनको हम जहां हुक्म देते थे, वे वहीं दस्तखत या अंगूठा ठोंक देते थे…और ये अब के मुखबिर, बड़े चंट होते हैं, आडिटरों से भी अक्खड़ होते हैं…क्या मजाल की बिना रसीद ठीक से पढे रसीद पर गुग्गी या अंगूठा ठोंक दें…।"
"खैर एक भयावह रात को जब बिजलियां कड़क रही थीं …चमगादर पर फड़फड़ा रहे थे…तभी मेरे आला
अधिकारी आये और मुझे कई टुकड़ों में बांट कर अलग-अलग पैकेटों में डाल दिया। सबसे छोटे पैकट पर लिखा गोलू मुखबिर ! साथ ही शुरू हो गई ओपरेशन डिवाइड!"
"गोलू मुखबिर के सामने आला अधिकारी का बिगड़ैल हाउंड रह रह कर भौंकता और गोलू की और खूंखार
इरादे से झपटता। दो सिपाही बंदूक ताने ख्ड़े थे…एक सिपाही अपने हाथ में अलग-अलग किस्म की कलम रखे हुए
था…आला जी ने कड़कती आवाज में गोलू से पूछा-तुमने अपने बारहों नाम के दस्तखत करने की प्रैक्टिस कर ली है? बेचारा गोलू अपना सिर हिला कर रह गया…ऐसी परिस्थिति में मुखबिर की बोलती बंद हो जाती है।"
"खैर, गोलू गवाह ने सबसे अंत में अपने असली नाम की रसीद पर दस्तखत किया और पूरी ईमानदारी के साथ आला जी ने गोलू को सबसे हेल्दी पैकेट पकड़ा दी…वैसे, गोलू को राशि का दस प्रतिशत दो सिपाहियों के लिए
ढीले करने पड़े।"
"खैर, मैं टुकड़े- टुकड़े बंट गयी और मेरे टुकड़े के टुकड़े नीचे तक के अधिकारियों तक पहुंचे…वे लोग बहुत
कर्तव्यनिष्ठ थे-ठीक 10 बजे तुम्हारे ठिकाने पर छापा पड़ेगा…समझे कि नहीं?"

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