सोमवार, 23 अगस्त 2010
लेकिन जो कुछ हुआ अच्छा ही हुआ !
रांची में "भास्कर" के उदय होने से पहले मुझे जिसकी आशंका थी वही हुआ-अन्य हाफ रेट पर स्वयं उतर गये! वे पहले ग्राहकों से ज्यादा पैसा क्यों लेते थे, यह नहीं पूछ्ना चाहता हूं क्योंकि, मैं दिये गए पैसे वापस नहीं मांगता। खैर, रांची में जिस रणनीति के साथ नये समाचार पत्र का स्वागत होता है, उसी रणनीति के साथ "भास्कर" का स्वागत हुआ। लेकिन, जो कुछ हुआ, अच्छा ही हुआ! किन्तु, एक बात सोचने की है-ऐसी रणनीति वे भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए क्यों नहीं बनाते है? कहां चली जाती है उनकी आन्दोलनकारिता जब झारखड में भ्रष्टाचार की गंगा
बहने लगती है? अरबों रुपयों की लूट के बाद जब कोई भ्रष्टाचार दूसरे माध्यम से उजागर हो जाता है तो, कलमची अचानक आंदोलन करने लगते हैं…लगता है कि वे गंगा स्नान कर लेने के बाद, कुछ दान करने के मूड में आ जा जाते हैं!
रांची में पत्रकारिता को अनेक तरह से प्रदूषित किया गया है-वैचारिक प्रदूषण के साथ-साथ प्रदूषणकर्ताओं ने कश्य्प काउंटर या कोडा काउंटर से भी बहुत कचरा उठा कर पत्रकाफ़िता में डाला है! यहां नक्सली फूले फले, आम आदमी सूखते गये…यहां साम्प्रदायिकता पनपा और उसमें खाद-बीज डाल कर माननीय भी कहला गए। हर पांच पदस्थापन में से, दो पर तो उनका ही हक बनता रहा। जनता के नाम पर आंदोलन करते-करते वे बड़े रईश हो गये…बड़े उद्योगपति हो गये…और जनता ठगी का शिकार हो गयी!
गरीब चोर चोरी करे तो खूब शोर किया और पावर हाउसों ने लूट की तो उनकी मलाई मारी चाय पीते रहे। सिपाहियों को ट्रक ड्राइवरों से बीस रुपये सड़क-टैक्स वसूलने की तसवीरें छापी गईं और अरबों की लूट पर खबर आम होने तक मौन व्रत में रहते रहे और जैसे ही उनके बिना प्रयास के कोई समाचार या कोई दबाया गया सच सामने आया तो, वे ब्रेकिंग न्यूज देने लगे ! जैसे पुलिस से विधिवत जारी समाचार को कोई ब्रेकिंग न्यूज की संज्ञा दे रहा हो!
एक बार शहर के लोग डर गये-धारावाहिक समाचार आ रहा था कि रांचीवासियों को प्रदूषित पानी नल के द्वारा पिलाया जा रहा है। समर्थन में जांच रिपोर्ट भी छापी गई। पंद्रह दिनों तक रांची के लोग हैजा और अन्य खतरनाक बीमारियों के संभावित खतरे के बीच परेशान रहे। किसी ने हेमामालिनी द्वारा प्रचारित वाटर प्यूरिफायर खरीदा तो किसी ने और ब्रांडों के। यहां वाटर प्यूरिफायर खूब बिके…कुछ लोगों ने तो अपने बच्चों की किताबें नहीं खरीदीं, लेकिन वाटर प्यूरिफायर जरूर खरीद लिया! पर रांची के लोग तब अचंभित रह गये, जब जांच रिपोर्ट छापने
वाले ने ही कह दिया की जांच की रिपोर्ट ही प्रदूषित थी! नल से तो शुद्ध मिनरल वाटर सप्लाई हो रहा था! वह बड़ी हेल्दी रिपोर्टिंग थी और रिपोर्ट लिखने वाले का हेल्थ भी खूब सालिड देखा गया!
एक बार ज्ञानरंजन चुनाव लड़ रहे थे। तभी उर्दू में एक पर्चा वितरित किया गया। उसमें कहा गया था कि ज्ञानरंजन का असली नाम विजयरंजन है, जिसे एक बार दंगा कराने के कारण के आरोप में पुलीस ने गिरफ्तार किया था। जब उस झूठे पर्चे का सच एक ने सामने ला कर रख दिया तो उसे नौकरी से हाथ गंवानी पड़ी और अपनी नवजात बच्ची को दूध के बिना बिलखते देखना पड़ा। किसने लिखा और छापा था यह पर्चा? क्या झूठे पर्चे का प्रकाशन जनहित या लोकतंत्र के हित में है?
महोदय, यहां स्वहित की नहीं जनहित वाली पत्रकारिता की जरूरत है…पत्रकारिता के नाम पर कथित आंदोलन चलाने की नहीं। समाचार पत्र को अगर समाचार पत्र ही रहने दिया जाए तो अच्छा होगा।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
सचमुच अगर ऐसी कोई पहल हो तो मैं बिना स्वार्थ के अपान सहयोग देना अपना सौभाग्य समझूंगा.........
जवाब देंहटाएं