सोमवार, 1 अगस्त 2011

लोकपाल नहीं लौह्पाल बनाना है


तेतरवेनामा
लोकपाल नहीं लौह्पाल बनाना है 
दिलीप तेतरवे
मन्ना लाल  खुश हैं कि उनके नाम में देश के एक मात्र सामजिक प्राणी के नाम का  अंतिम अंश शामिल  है. मन्ना  और अन्ना  के बीच तुकबंदी हो सकती है. मन्ना लाल  तैश में हैं. उनहोंने आन्ना जी की भाषा और ठस्सेबाजी अपना ली है. और जब देखो तब वे शुरू हो जाते हैं," अरे आप लोग क्या जानियेगा. हमें तो लोकपाल नहीं लौह्पाल बनाना है. अगर मुझे लगा कि लौह्पाल से काम नहीं चलेगा तो मैं हीरापाल या प्लेटिनमपाल बनाउंगा." 
          सो मन्ना लाल  लग गए हैं," अरे जनाब हमें वह बात भी सीना ठोंक कर कह देने की आदत है जो अन्ना जी कहते हुए डर-खप जाते हैं.यानी कि हम जो लौह्पाल या प्लेटिनमपाल बनायेंगे वह आरएसएस के सरसंघचालक जैसा सुप्रीम कुर्सीदार होगा. बड़ा ही खूंखार होगा. जिसका नाम सुनते ही मंत्री पद की शपथ लेने पहुंचे नेता, शपथ पत्र फाड़ कर हिमालय की और चल देंगें और संन्यास ले लेंगे. जिसके  खड़े होते ही संसद, न्यायपालिका, कार्यपालिका और पत्रकारिता शाष्टांग  दंडवत हो जायेंगे. जिसका फुल कंट्रोल संसद के ऊपर होगा. संसद में हर सदस्य वही बोलेगा जो मेरा लौह्पाल  बोलने के लिए स्वीकृति देगा. ठीक उसी तरह जैसे आर एस एस के सरसंघ चालक के इशारे पर उसका संघ, उसके मातहत की संस्थाएं और विविन्न कोटि के सदस्य बोलते हैं. लौह्पाल को छोड़ कर किसी अन्य चिन्तक, नेता, न्यायाधीश, अफसर, चपरासी या चोर-उचक्का को सोचने-समझने की छूट नहीं होगी." 
         मन्ना लाल बड़े भयानक चिन्तक हैं, " मैं चिंतन करते हुए किसी बात की चिंता नहीं करता. मैं चिंतन करते हुए तथ्यों और आधारों की चिंता नहीं करता. मैं बाथरूम में बीड़ी के कस लगाते हुए जो सोचता हूँ वही फ़ाइनल होता है. सो मैंने फाइनल कर दिया है कि मेरा लौह्पाल जनता के बीच कभी कभी या साल दो साल में प्रकट होगा. उनके सामने जितने व्यक्ति बैठेंगे  उनका नाम और पता लौह्पाल चेक करेंगे और उनकी  भक्ति का प्रमाणपत्र भी देखेंगे. जो उनका भक्त नहीं होगा वह उनके सामने पंक्ति में नहीं बैठ पायेगा. बिलकुल आर एस एस की बैठकों की तरह. मेरे लौह्पाल के सामने बैठे व्यक्तियों की पूरी गिनती होने के बाद इसकी सूचना लौह्पालक  को उनके परम भक्त और सेवक देंगे. फिर जो मेरे लौह्पालक  बोलेंगे वह ब्रह्मलकीर हो जाएगा."
       मन्ना लाल का स्पष्ट चिंतन है," लौह्पाल  का दिमाग ऐसे तो खाली होगा,  लेकिन उनके सलाहकार बड़े घाघ होंगे. वे  घाघ भूषन होंगे या फिर नागफूषण होंगे,यह तो वक्त ही बताएगा. लेकिन, वे दिन में करप्ट लोगों की कोर्ट में पैरवी करेंगे और शाम में मेरे लौह्पाल को  करप्शन दूर करने के तरीके बताएँगे. और मेरे लौह्पाल उसी पर अमल करेंगे. करप्शन वही दूर कर सकता है जो घाघ भूषण हो या नागफूषण. करप्शन सरदारभूषन  दूर नहीं कर सकते, क्योंकि उनको करप्शन करने का थोडा भी अनुभव नहीं है. जीरो करप्शन की मानसिकता वाले लोग नक्कारा होते हैं. मेरा लौहपाल  भी करप्शन एक्सपर्ट  होगा. वह जो बोलेगा, वह कभी करेगा नहीं. वह वक्त के अनुसार अपने सिद्धांत और नीति बदलता रहेगा. उसके पास मुखौटों का बड़ा भण्डार होगा."
           

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

माँ सरस्वती को नमस्कार.....

हमारा भारत देश माँ की कृपा से सदियों तक विश्व का ज्ञान गुरु रहा. और उनकी ही कृपा से हम फिर से विश्व के ज्ञान गुरु बनने की ओर आगे बढ़ रहे हैं. माँ की कृपा हो हम पर है, लेकिन हमें उनकी कृपा का पात्र बनने के लिए लगनशील होना होगा. हमें रात-दिन की मेहनत करनी होगी. हमें समय के साथ कदम मिला कर चलना होगा. समय सबसे कीमती चीज है. बीता समय कभी लौट कर नहीं आता  है. और जो समय के साथ, लगन के साथ बढ़ता है, दुनिया की हर जंग जीत लेता है.

          जब हम माँ के सामने नतमस्तक होते हैं, तब जो ज्ञान की किरणें  हम पर बरसती हैं, वह सन्देश देती हैं कि ज्ञान से प्रकाशित हो जाओ और अपनी दुनिया, अपने देश, अपने समाज का मान बढ़ाने  वाले काम करो, मानवता को लिए काम करो. जीवन का उद्देश्य मात्र धन कमाना नहीं है. बीते युगों में कितने धनिक हुए, लेकिन उनका कोई इतिहास नहीं है. किन्तु  हम आज भी वेद और पुराण से ज्ञान पाते हैं और उनके रचने वालों को नमन करते हैं. हम वाल्मिक, तुलसी, वाण भट्ट, चरक, कणाद, वराहमिहिर को कभी भूल नहीं सकते. हमारे  ज्ञान रत्नों ने हमारा मान विश्व  में स्थापित किया.
           आप छात्रगण  भी अपने जीवन की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए यहाँ  प्रयत्न कर रहे हैं. माँ से मेरी प्रार्थना है कि वह आपकी आकांक्षाओं को पूरा करें.
          वन्दे माँ सरस्वती..
         

रविवार, 26 दिसंबर 2010

एक और साल बीत गया, मस्ती में, फकीरी में, विवादों में!

        


 मैं पहली तारिख को बहुत खुश  रहता हूँ. इस दिन मुझको पंद्रह दिन के लिए वेतन मिलता है.शेष के पंद्रह दिन तो मैं अपने दिलेर दिल के साथ रहता हूँ,फकीरी में मस्त-"बदन से कबा सिर से चादर ले गई/जिन्दगी हम फकीरों से क्या ले गई."लेकिन, मैं एक तारीख़ तो पीछे मुड़ कर देखता हूँ कि देश दुनिया में क्या हो रहा है, अपने आप से बेफिक्र.
         देखा, पाया और  महसूस किया कि   मेरे जैसे पुराने कार सेवक को यह पता ही नहीं चला कि कब राडिया देवी जी ने भाजपा नीत   एनडीए शासन में मंदिर बनवाने के लिए जमीन हासिल कर ली,और दिब्य मंदिर का निर्माण कर लिया और २ स्पेक्ट्रम  डील में भयानक सफलता भी हासिल कर ली. खैर, इस मंदिर के निर्माण में तो मैं कार सेवा करने का पुण्य  नहीं उठा पाया लेकिन, जब मैं   अपनी गरीबी दूर करने के लिए उस मंदिर में  प्रार्थना  करने का मन बना कर पहुंचा, तो गार्ड ने यह धमकी दे कर भगा दिया कि यहाँ सिर्फ २जी वाले ही प्रार्थना या पूजा कर सकते हैं. अब मैं दीन-हीन क्या करता, जब मेरे सामने ही बहुत से पत्रकारों को भी मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया.
         मैं बहुत परेशान हूँ . मेरी बेटर  हाफ ने मुझको अल्टीमेटम दे दिया है कि या तो पड़ोस  के श्याम जी दलाल की तरह या फिर घनश्याम  जी अधिकारी की तरह कोई बड़ा स्कैंडल  करो या फिर चाय-काफी मांगना या सन्डे के दिन अद्धा के लिए रुपए मांगना बन्द कर दो. मैं गया था घनश्याम जी के द्वारे.लेकिन वहां तो काल की तरह सीबीआई के लोग उनका मकान घेर कर पता नहीं क्या कुछ कर रहे थे. बाद में पता चला कि घनश्याम जी को सीबीआई. वाले बड़े सम्मान के साथ कार में बैठा  कर कहीं ले गए. यह जानने के बाद भी बेटर हाफ ने मुझको सुनाया,"देखा कि नहीं देखा,घनश्याम जी की शानदार फोटो  आज के हर अख़बार में छपी है.उनकी बेटर हाफ कितनी खुश हैं.कह रहीं थीं कि अब साहेब को जेल में कितने दिन भी आराम करना पड़े, परिवार को तो उन्होंने सुपर ग्रेड  का बना ही दिया. हसबैंड हो तो ऐसा."
        यह साल अच्छा  बीता. अखबार की कीमत वसूल हो गई. स्कैंडलों ने मुझे दफ्तर में टाइम पास के लिए अच्छे-अच्छे टापिक दिए. लेकिन दुःख इस बात का है कि हमारे  देश के प्रधानमंत्री जी ने  स्कैंडल पर हुई  डिस्कशन में भाग ही नहीं लिया. सो डिस्कशन थोड़ी फीकी रह गई.आंकड़ों से सज नहीं पाई.फिर भी  स्कैंडलों पर तो डिस्कशन नुक्कड़ वाली चाय की दूकान से ले कर उच्चतम   स्तर तक चलती रही. डिस्कशन का स्तर,लोअर स्तर पर  हाई  रहा और हाई स्तर पर जरूर लो ग्रेड  का रहा.फ़िर भी इस कड़ाके की ठण्ड में काफी गर्मी रही. दिल को बहुत ऊर्जा मिली, बहुत सुकून मिला.
         एक और साल बीत गया, मस्ती में, फकीरी में, विवादों में, सपनों में टाईम पास करते हुए. मैं समय का शुक्रगुजार हूँ जो कभी रुकता नहीं, फिर भी कभी-कभी समय ठहर जाता है, जब रसोई घर खाली होकर मेरी जेब को ललकारता  है. जब प्याज को देखने मात्र के लिए बाज़ार जाता हूँ और रो पड़ता हूँ.जब दाल की बोरी पर नज़र टिक जाती है और हटाने पर भी हटती नहीं है.और जब मुकेश अम्बानी जी के निवास  महल को सिर उठा कर देखता हूँ,अपनी गरीबी के कद को जान लेता हूँ. समय तब भी रुका-सा लगता है जब, बिजली का बिल अँधेरे में पढ़ कर एक और एक नया  कर्ज लेने का ख्याल आ जाता है. 
          पता नहीं, जब भी कोई स्कैंडल भाजपा  जी उछलवाते  हैं, वे खुद  उसमें एक पार्टी बनते नजर आते हैं. बोफोर्स उछला तो हिंदुजा फंसता नजर आया. अब इधर राडिया देवी जी ने राजा और भाजपा के अनेक नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस  की नींद हराम कर दी है.राडिया देवी को शत शत नमन जिन्होंने विश्व  के सबसे बड़े लोकतंत्र को अकेले ही लोक कर अनूठा करिश्मा कर दिया.उनका नाम फोर्ब्स पत्रिका की पावरफुल लोगों की सूची में सबसे ऊपर अंकित किया जाना चाहिए.         

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

इस वर्ष मैं राडिया मंदिर के निर्माण में कार सेवा करूंगा !

                     
       मैं जब भी महीना का अंतिम दिन पार करता हूँ सभी धर्मों  के ईश्वर को याद करता हूँ और कहता हूँ कि हे भगवान् आपने एक और महीना पार कर दिया. और जब कभी दिसम्बर का महीना पार कर जनवरी में पहुँचाना  होता है, तो महीना और साल दोनों  पार करना होता है. यह और भी कठिन होता है. बीता हुआ पूरा साल याद आने लगता है. भूत काल में जाते हुए मैं तो कांप-कांप जाता हूँ. लगता है कि एक साथ अनेक भूत मेरे चारों ओर खड़े  हो गए हैं और मेरी बची  हुई लंगोटी  ले कर भाग जाना चाहते हैं. फिर भी मैं सबको मुस्कुराता हुआ  हैप्पी न्यू ईयर, कहता हूँ ताकि वे भी मुझे हैप्पी न्यू ईयर कह सकें.   
        नेता सेवक लाल  मुझसे सेवा मांगता नजर आता है. अधिकारी मुझे अधिकार   दिखाता नजर आता है. जज साहब मेरे खिलाफ फैसला देते नजर आते हैं-इस कंगाल ने सौ रुपए  की लूट की है. मेरा ही वकील मेरे खिलाफ दलील देता नजर आता है. नरेगा की रसीद पर मेरा अंगूठा ब्लौकाधिकारी जबरन ले जाता है और मैं मजदूर के रूप में ट्रेन से  दूसर राज्य में रोजी-रोटी कि तलाश में जाता हुआ नजर आता हूँ. मुझे ट्रेन में जब भी झपकी  आती है, मुझे बाल ठाकरे और राज ठाकरे की लाठियां और मेरी घायल पीठ नजर आती है. 
         क्या करूँ,  मैं तो भूत काल में जाते हुए डरता हूँ. जेल में आराम फरमा रहे हमारे कुछ महान नेता लोगों से मुझे ईर्ष्या होने लगती है.काश मैं भी बस एक बार नेता बनता और लूट मचाता और जेल में आराम फरमाता. वहीँ चैन से नववर्ष मनाता. लेकिन अपनी किस्मत में तो रोज खटो  और रोज खाओ वाली नौबत है.  
       मेरी पत्नी  ने कई दिनों से शोर मचा रखा है कि एक मोबाईल कर्ज ले कर भी खरीद लाओ और  राडिया देवी से गपियाओ, दुःख के दिन बीत जायेंगे. बारहवाँ कर्ज लिया और मोबाईल ले आया, लेकिन क्या बताऊँ, जब भी राडिया  देवी  को फोन लगता हूँ जवाब आता है-नीरा मैया  का मोबाईल ऑफ है, उनसे अभी आपका संपर्क  नहीं हो सकता. उस शक्तिरूपेण राडिया  देवी  ने फोन क्यों बन्द कर रखा है, जो पक्ष और विपक्ष, सबको खरीद कर विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को बौना कर सकती हैं, मेरी समझ में नहीं आ रहा है. हमारे यहाँ तो जेल के साधारण कैदी भी जेल में मोबाईल रखते हैं और सुरक्षित   जेल से रंगदारी  उगाही  कर लेते हैं. उनका मोबाईल कभी ऑफ होता नहीं है, फिर राडिया देवी  का मोबाईल क्यों ऑफ हो गया? इसके पीछे जरूर किसी जाँच एजेंसी  की साजिश है, जो हम जैसे ग़रीबों को उनसे दूर रखना चाहती है, ताकि कोई गरीब कभी अमीर  न बन पाए. बहुत नाइंसाफी है. 
        सो नव वर्ष पर मैंने राडिया देवी को  बड़ी मेहनत से चिट्ठी लिखी   है. साथ में भूतहा  बाबा से दस रुपए का ताबीज भी खरीद कर डाल दिया है- भूतहा  बाबा बचाएँ राडिया देवी को सीबीआई की काली नजर से. मैंने उनको बहुत दिल छूने वाली चिट्ठी  लिखी है- हे राडिया देवी! सादर प्रणाम. मेरे गाँव में  हम मजदूरों की दलाली कर हमें दूसर राज्यों में मजदूरी दिलाने वाला फेमस  दलाल पिंटू ,आपका मंदिर बनवा रहा है....मैंने दलाल पिंटू से खुद जा कर कहा है कि मैं उस राडिया मंदिर के निर्माण में कार सेवा करूंगा. मैं जानता हूँ कि आप अपने परम भक्त दलाल  पिंटू को दर्शन देंगी  और तब हे देवी मुझे बस अपनी एक झलक ही दिखला देना.  आपको लड्डू चढ़ाऊंगा . कवि हूँ सो आपके नाम पर राडिया चालीसा लिख डालूँगा,  ताकि सारे ग़रीबों का आपकी कृपा से उद्धार हो सके. जय, जय राडिया देवी! 
        

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

टेपवा झूठ बोले कौवा काटे...

             
          न्यूज जब प्राइवेट टीवी  चैनेल पर आना शुरू हुआ  तो बड़े घराने के लाडले-लाडलियां अचानक पत्रकार हो गए और लगे चैनलों  पर भौकियाने और पत्रकारिता  के सारे उसूलों को तार-तार कर दिया. अब तो समाचार ज्यादातर स्क्रोल में तेजी से भागते नजर आते हैं,  जबकि मेन स्क्रीन पर दूसर चैनलों से उधार लिया गया बासी माल दौड़ता रहता है, विशेष कमेन्ट के साथ. फ़िल्मी गोससिपबाजी भी खूब चलती है. ये जिससे चाहते हैं, उसीसे किसी हीरो या हिरोइन का टांका भिड़ा देते हैं. ये अच्छे जोड़ी मेकर हैं. ये अच्छे जोड़ी ब्रेकर भी हैं.
         बेवजह हर न्यूज को ब्रेक करने का दावा करने वाले न्यूज चैनलों पर नीरा राडिया के टेप लीक ने ब्रेक लगा दिया है. अब वे न्यूज ब्रेक करते हैं कि देखिए बरखा का खुलाशा, पहली बार आपके इस चहेते भंडाफोड़  चैनेल पर.....सारा का सारा टेप जाली है...सारा का सारा टेप बकवास है...ज़रा गौर से देखिए, बरखा की आँखों में, बरखा की बूँदें झलक रहीं हैं. इन घड़ियाली बूंदों में हैं सच्चाई, ईमानदारी, पत्रकारिता के उसूल.....बरखा पवित्र है...बरखा बरखा है....टेपवा  झूठ बोले कौवा काटे...काली नीरा से ना डरियो...मैं कोर्ट चली जाऊँगी तुम देखते रहियो...टेपवा  झूठ बोले कौवा काटे...
           फिर एक चैनेल ने प्रोग्राम सेट किया ताकि तीस तीसमारखाओं का दुग्धाभिषेक  किया जा सके..... सो लाइव के पहले नाटकबाजों  की तरह रीहर्सल कर लिया गया. फिर टेक वन, टेक टू....शुरू हो गया राग दुग्धाभिषेक.....बेचारी बरखा  बहुत खूबसूरत हैं सो सभी उनके पीछे ही पड़ गए हैं, जबकि नीरा जी ने तो तीस को सेट किया था....देखिए, बरखा का मासूम चेहरा... ..जानिए इनकी शराफत...सुनिए इनका सफाईनामा....देखिए इनका पत्रकारिता में सफ़रनामा....उन्होंने अपनी कलम से कितने तूफ़ान खड़े किए....और एक छोटा सा नामुराद टेप उनके पूरे कृतित्व पर कैसे भारी पड़ सकता है...बरखा नारी हैं और किसी अन्य नारी से उनका बातचीत करने का अधिकार कोई नहीं छीन सकता है- जो बरखा से टकराएगा वह चूर-चूर हो जाएगा....ऊंचे स्वर में सब उनकी जय बोल, जो कलम जला-जला लिखते हैं, चटपटा-मसालेदार...... ऊंचे स्वर में सब उनकी जय बोल.....!!! 
         बरखा जी बरखा जी, जरा बताएंगी  कि नीरा जी ने आपसे  क्या बात की? यह प्रश्न करते ही महोदय प्रश्नकर्ता जी ने स्वयं जवाब भी दे दिया-दुनिया जानती है कि आपने क्या बात की, लेकिन बात में ऎसी कोई बात नहीं थी कि यह साबित हो की आपने कोई खोता-पेटी लेने की बात की हो. आपने घरेलु बात की. चाय-कॉफ़ी पर बात की. मौसम की बात की. तीज-त्योहार की बात की...मुकेश अम्बानी और रतन टाटा जी के स्वास्थ्य की बात की...उनके इम्पायर की हलचलों पर बात की. यह सब बातचीत तो चलती ही रहती है....अगर आपने न्यूज फिक्सिंग की बात की होती या फिर संसद के फिक्सिंग की बात की होती  तो कोई अपनी ऊँगली उठा सकता था...आपको, बरखा जी, किसी बात की चिंता करने की क्या जरूरत है....         
       
                        

सोमवार, 29 नवंबर 2010

कांच के घर से पत्थरबाजी

        
         
     रतन टाटा हों या फिर भाजपा नेता अरुण शौरी, दोनों को मौका मिल गया स्पेक्ट्रम घोटाले पर बोलने का. रतन टाटा भ्रष्टाचार पर बड़ी बड़ी बातें करने लगे थे. लेकिन उसी समय राडिया से उनकी हुई बातों के लीक हो जाने के कारण उनकी और भाजपा की हालत गड़बड़ा गई है .अब भाजपा को शायद जेपीसी जाँच की मांग करते हुए अपने ऊपर भी खतरा नजर आता होगा.



             उधर, महोदय अरुण शौरी ने राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और नायडू पर हमला बोल दिया है. लेकिन, इस हमले के लिए शौरी को बहुत देर इन्तजार करना पड़ा है. चलिए, स्पेक्ट्रम घोटाले के कारण दूध का छीका तो टूटा. बिल्ली का भाग जगा. जब शौरी जी संसद में मुकेश अम्बानी के खिलाफ आग उगलने की पूरी तयारी में थे, तभी राजनाथ जी और अडवाणी जी के इशारे पर उनकी जगह नायडू को खड़ा कर दिया गया. आखिर पूंजीपतियों की पार्टी है भाजपा और उसके नेता लोग अगर किसी पूंजीपति के खिलाफ शोध वक्तव्य देने लगेंगे तो भाजपा के चरित्र पर दाग नहीं लगेगा क्या? अवश्य लगेगा. यह बात अरुण शौरी को समझना चाहिए. लेकिन, क्या किया जाए अरुण शौरी को लगता है की वे पत्रकार हैं. जब कि पत्रकारिता के आदर्शों का उन्होंने शायद ही कभी पालन किया हो. लगता है, अडवाणी जी जब रथ ले कर पूरे देश में साम्प्रदाइकता का ताण्डव कर रहे थे, तब शौरी जी की कलम सूख गई थी. शौरी जी को कभी आरएसएस से प्यार हो जाता है तो कभी उसकी राजनीतिक शाखा पर गुस्सा आ जाता है. बात असल में यह है कि इनदिनों भाजपा में उनकी पूछ घट गई है. गडकरी जी तो उनके नाम से बिदक जाते हैं.

             पता नहीं, रतन टाटाजी को क्या जरूरत पड़ गई थी क़ि कांच के महल में बैठ कर भ्रष्टाचार पर प्रवचन देने लगे. कांच को आदत नहीं होती है, भ्रष्टाचार पर भाषण सुनने की. सो, उसका दरकना लाजिमी था और टेप के रूप में दरका गया. और टूटा हुआ कांच और टूटा हुआ हीरा जुड़ता नहीं है. अब टेप के प्रसारण पर रोक लगे या टेप लीक करने वाले को सजा मिले, उससे टाटाजी के माथे पर से बोली गयी बातों का बोझ तो उतरेगा नहीं. यह लीक भोपाल गैस लीक जैसा है. लेकिन, इस लीक से अडवाणी जी परेशान हैं. उनको बड़ी शर्म आ रही है. गजब हैं जनाब अडवाणी जी, उनको जिन्ना की जय करने में या गुजरात में नरसंहार होने पर शर्म नहीं लगी थी, लेकिन राजनीतिक फिक्सिंग के मामले में बड़ी शर्म लग रही है. दिल के किस कोने में उन्होंने अपनी प्यारी शर्म छिपा कर रखी थी? इस पर भी जेपीसी जाँच होनी चाहिए. अरे अडवाणी जी आपको जिन बातों पर शर्म करनी चाहिए उसकी सूची तो बड़ी लम्बी है, विश्वास न होतो अरुण शौरी ही आपको गिनवा देंगे.

























सोमवार, 22 नवंबर 2010

राजनीती में आकर भाईगिरी का होम ट्यूशन

        राजनीति के क्षेत्र में इन दिनों बड़ा उलटफेर हो रहा है, भ्रष्टाचार पर बवाल मच रहा है. बेचारे अशोक चौहान तीन हजार वर्ग   फीट के फ्लैट पर फ़्लैट हो गए. बेचारे येदुरप्पा अपने ही दल के अनेक विधायकों के विरोध के बाद  अपनी कुर्सी बचाने के लिए अब अपने ही दल के शीर्ष नेताओं को धमकी दे रहे हैं कि अगर उनको गद्दी से उतारा गया तो वे भाजपा को समुद्र में डुबा देंगे. वे भी जमीन के मामले में फंस गए हैं. अब यह बात तो जग जाहिर है कि जमीन के कारण दुनिया में हर युग में बवाल मचता ही रहा है. पांच गाँव देने बे बदले कौरवों ने महाभारत के युद्ध को आमंत्रित किया और उनका सर्वनाश हो गया. 
      लेकिन, यह  तो मानव की नीयति  है कि वह जमीन के पीछे भागते  हुए हमेशा जमीन से कट जाता रहा है. जमीन परिवार को बांटता-काटता है. भाई-भाई के बीच खून खराबे का कारण बनता है. और यही कारण है कि जब बड़े बड़े मॉल बनाने का धंधा मुंबई में शुरू हुआ तो जो महान हस्तियां  इस धंधे से जुड़ीं उनको भाई कह कर संबोधित किया गया. जमीन का धंधा यानी बिग बौस का धंधा. बिग बौस यानी  जिनको लोग प्यार से भाई कह कर सिर झुका लेते हैं और अपनी जमीन उनके  नाम औने-पौने दाम पर कर देते हैं. लेकिन अब उन महान भाइयों का जमाना लद गया है, जमीन अब राजनीतिक स्तर पर ही सलटा ली जाती है.       
           कारण बहुत स्पष्ट है कि हमारे बहुत से नेता या तो डैरेक्ट  भाईगिरी स्कूल से आते हैं या फिर राजनीती में आकर भाईगिरी का होम ट्यूशन कर लेते हैं. ऐसे नेताओं के भाषणों में जोरदार तेवर होता है, ऊंचा स्वर होता है, मसल पावर भी झलता है, मनी पावर भी उबलता है और वे मनमोहन जी की तरह हमेशा काम या आंकड़ों का पाठ संयत स्वर में या एक ही धीमी पिच में नहीं करते हैं. वे जब बोलते हैं तो सैकड़ों मील दूर बैठे लोग बिना किसी माध्यम के सुन लेते हैं. वे जब बोलते हैं तो विरोधी तो विरोधी, आम लोगों की भी नींद उड़ जाती है. वे अपने क्षेत्र में वैसे प्रभावी और भौकने वाले होते हैं, जिस प्रकार स्वान स्वामी अपने क्षेत्र में अपनी पूँछ  ऊंची कर भौंक  लगाते हैं. ऐसे महान नेता गण अपने क्षेत्र की रक्षा भी उसी प्रकार करते हैं, जिस प्रकार अपनी   गली के शासक स्वान स्वामी जी करते हैं. ऐसे सभी महान नेताओं को शत-शत कोटि प्रणाम, करने की जरूरत है. ध्यान  रहे कि तुलसी दास जी ने भी रामचरित मानस लेखन शुरू करते हुए हर प्रकार के लोगों की स्तुति की, जिनमें खल, कामी, चोर, बेईमान सभी शामिल थे. तब भी उनको रामचरित मानस के लोकार्पण के बाद बहुत उत्पातियों का सामना करना पड़ा था. हम तो आम लोग हैं, बस अपनी सलामती की दुआ ही कर सकते हैं, जिसका निश्चित होना असं नहीं है.