सोमवार, 20 सितंबर 2010
जब तक राज करेंगे सिर्फ माई के नाम के नाम पर करेंगे
लाल साहेब को अचानक भूराबाल की चिंता सताने लगी. चट-पट बोले, "सारी नौकरिया में भूरा बाल को दस परसेंट देंगे, लेकिन ओ भूरा बाल कभी कुर्सी की ओर नहीं लपकना...लपकने का एकाधिकार सिर्फ मेरे पास है....एक बार गलती से मिस्टेक हो गया ओर "माई' नाराज हो गई और हमरा राज हमरे पैर के नीचे से खिसक गया...उधर रेल से हम डिरेल हो गए, इधर मैडम soniyaa के पास से हमरा इनडाईरेक्ट रूलवा ख़तम हो गया. कुल्ले फिनीश हो गया, लेकिन इस बार कौनो हमको हराने की बात सोच रहा है, तो उससे फूलिश और कौन हो सकता है..अरे जब हम अपना दुश्मन नंबर एक पासवान जी को पटा ले सकते हैं, तो वोटर को पाटने में हमको केतना देरी लगेगा ...माना कि हमारे पास सरकारी फंड नहीं है, सरकारी गाडी घोड़ा नहीं है, सरकारी प्रचार तंत्र नहीं है, लेकिन मेरे साथ अब 'माई' है, समझे कि नहीं समझे...
अरे, आप क्या समझते हैं कि हम नौसिखुआ खेलाडी हैं, क्या जो भूराबाल को दस परसेंट नौकरी हमरे हाथ से भेंटा जाएगा ?अरे, हम जब तक राज करेंगे सिर्फ 'माई' के नाम पर वैकेंसी निकालेंगे, बूझे कि नहीं? हमरी माई को थोड़ा भी घबराने की जरूरते नहीं है. बस हमको 'माई' की चोंटी पकड़ के कुर्सी पर बैठना है, फिर खेला शुरू.......
खेला शुरू का मतलब का मीनिंग समझे कि नहीं? का समझिएगा, कभी राजनीति में आप लोगन पालिटिक्स किये हैं ? हम जनता हूँ राजनीति में पालिटिक्स करना....हम पर आँख, कान और नाक बंद कर के विश्वास कीजिए, आपका कुल्ले चिंता-फिनता हम डाउन लोड कर देंगे. हम जो चालीस परसेंट लेंगे, उसमें दस परसेंट किसका होगा? और किसका होगा, अरे आपका होगा...घी का दिया जलाईयेगा अपने घर-दूरा में, समझे कि नहीं कि अभियो धतुरवा की तरह सोचियेगा.....
जो जो लोगन ई सोच के चला है कि उसकी सरकार का इस बार रीन्यूवल हो जाएगा उ लोगन दिन में सपना देखने वाले लोग हैं. अरे उ लोगन तो आदमी का चारा खा गया है. उनको तो बड़ा पाप लगेगा. जनता के बीच का पब्लिक थोड़े नहीं समझेगा कि बिहार को लूटने के लिए, मेरे खिलाफ केतना केतना षड्यंत्र किया और केतना केतना आरोप का बरसात किया...लेकिन हुआ क्या? अरे आज भी हम पासवान जी को छोड़ कर सभी दल के खिलाफ मोर्चा ले रहे हैं और उड़न खटोला में उड़ रहे हैं.
कुछ लोग कहता है कि मेरे राजद से बहुते नेता लोग भाग रहे हैं जैसे डूबते, जहाज से चिड़ियाँ लोग फुर्र से उड़ जाते हैं. अरे कौनो नेता हमरे दल से बाहर नहीं निकला है, काहे कि हम ही अपने दल के एक मात्र नेता हैं और बाकि तो चिरकुट हैं. अब देखिये मेरे सालों को भी लोग नेता मानते हैं. लेकिन मेरे साले को किसने नेता बनाया? अरे, हमने अपनी राबरी को मुख्यमंत्री जरूर बनाये, लेकिन नेता नहीं. फिर अपने साले को हम काहे नेता बनायेंगे? उ कौन होता है मेरे दल में रह कर नेता बनने वाला? हमरे दल में उसी को रहने का खुला अधिकार है, जो नेता नहीं है और बस मेरा फालोवर है, समझे कि नहीं?
हमको नीतीश जी पर भी हँसी आती है. उ कहते हैं कि हम फिनीश हो जायेंगे. लेकिन भाजपा के नेता नरेंद्र मोदी के बिहार आने के नाम से ही डर के मारे छटपटाए हुए हैं. यानी मोदी आये, तो नीतीश फीनीश हो जायेंगे. का बात का इतना डर रहे हैं नीतीश? मोदी कौनो बाघ हैं या कि उ कौनो शिकारी हैं कि बन्दूक ले के आयेंगे और यहाँ फटफटा दाग देंगे? नीतीश दू बार जनता को धोखा दे चुके हैं और हम रेल मंत्री के रूप में असली गुरु बन के सबका मन जीत चुके हैं. हम कहता हूँ इस बार चुनाव भी हमही जीतेंगे.
शनिवार, 18 सितंबर 2010
अर्जुन साहब पहले किसका सूखा दूर करेंगे?
अर्जुन साहब फिर एक बार मुख्यमंत्री बन गए हैं. शपथ ली है कि सूखा राहत कार्य पर पूरा ध्यान देंगे. लोग छटपटाए हुए हैं, यह जानने के लिए कि वे पहले किसका सूखा दूर करेंगे. अपना, गडकरी जी का कि गाँव के ग़रीबों का. आम तौर से तो झारखण्ड का रिवाज है कि नेता लोग अपना सूखा दूर करने पर ही सारा ध्यान लगा देते हैं.
क्या मुंडा जी झारखण्ड की परम्परा को तोड़ेगें ? परम्परा को तोड़ना आसान नहीं होता हैं, और फिर मुंडा जी की पार्टी परम्पराओं को तोड़ने में विश्वास ही नहीं रखती है. देखिये, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का, उनकी पार्टी का वादा हर चुनाव में दुहराने की पार्टी की परम्परा है, और पार्टी उस ,पर आज भी कायम हैं, और जब तक यह सूरज चाँद रहेगा, उनकी पार्टी इस परम्परा को सदा कायम रखेगी . राम भी इस बात को समझ गए हैं कि मुंडा जी की पार्टी उनको सिर्फ मंदिर या मूर्ति के रूप में देखती है. राम नाम के सिक्के के बिना उनकी पार्टी चल ही नहीं सकती. एक बार इस सिक्के से ज़रा सा डगमगाए कि सिक्का ही नाकामयाब हो गया. बकौल भाजपाई पत्रकार अरुण जी के अनुसार वह राम नाम का सिक्का नहीं, बन्दूक की गोली थी जो, दो बार फायर नहीं की जा सकती है. खैर, विज्ञानं का युग है और कारतूस को रियूजैब्ल बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे, ऐसा सबका विश्वास है.
मुंडा जी ने सबसे अच्छा काम यह किया है कि बिना राम या कृष्ण के बारे में विचारे, सर संघ चालक और गडकरी जी का आशीष लेने के लिए नागपुर उड़ गए हैं. आखिर सरकार का और उनकी पार्टी का संचालन नागपुर वाले बाबा के आदेश निर्देश से ही तो होने वाला है. गडकरी तो थोपे हुए नेता हैं और सर संघ चालाक तो सर्वोच्च शक्ति के स्वामी हैं. सो वे नागपुर पहुँचते ही आशीष ग्रहण करेंगे और आदेश-निर्देश पर चलने की शपथ लेंगे. वही शपथ तो फलदायक होगा. नागपुरवाले बाबा खुश तो अर्जुन बाबा खुश.
सबसे तारीफ़ के काबिल तो सोरेन जी के पुत्र जी हैं, जिन्होंने अपने पिताश्री को मुख्यमंत्री पद से विस्थापित कर मुंडा जी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए क्या कुछ नहीं किया. अर्जुन जी के सुखार में हेमंत ऋतु ला दिया. भगवान करें सोरेन-जुनिअर के घर आँगन में सुखार ख़त्म हो जाये. सावन भागों बरसे.
क्या मुंडा जी झारखण्ड की परम्परा को तोड़ेगें ? परम्परा को तोड़ना आसान नहीं होता हैं, और फिर मुंडा जी की पार्टी परम्पराओं को तोड़ने में विश्वास ही नहीं रखती है. देखिये, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का, उनकी पार्टी का वादा हर चुनाव में दुहराने की पार्टी की परम्परा है, और पार्टी उस ,पर आज भी कायम हैं, और जब तक यह सूरज चाँद रहेगा, उनकी पार्टी इस परम्परा को सदा कायम रखेगी . राम भी इस बात को समझ गए हैं कि मुंडा जी की पार्टी उनको सिर्फ मंदिर या मूर्ति के रूप में देखती है. राम नाम के सिक्के के बिना उनकी पार्टी चल ही नहीं सकती. एक बार इस सिक्के से ज़रा सा डगमगाए कि सिक्का ही नाकामयाब हो गया. बकौल भाजपाई पत्रकार अरुण जी के अनुसार वह राम नाम का सिक्का नहीं, बन्दूक की गोली थी जो, दो बार फायर नहीं की जा सकती है. खैर, विज्ञानं का युग है और कारतूस को रियूजैब्ल बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे, ऐसा सबका विश्वास है.
मुंडा जी ने सबसे अच्छा काम यह किया है कि बिना राम या कृष्ण के बारे में विचारे, सर संघ चालक और गडकरी जी का आशीष लेने के लिए नागपुर उड़ गए हैं. आखिर सरकार का और उनकी पार्टी का संचालन नागपुर वाले बाबा के आदेश निर्देश से ही तो होने वाला है. गडकरी तो थोपे हुए नेता हैं और सर संघ चालाक तो सर्वोच्च शक्ति के स्वामी हैं. सो वे नागपुर पहुँचते ही आशीष ग्रहण करेंगे और आदेश-निर्देश पर चलने की शपथ लेंगे. वही शपथ तो फलदायक होगा. नागपुरवाले बाबा खुश तो अर्जुन बाबा खुश.
सबसे तारीफ़ के काबिल तो सोरेन जी के पुत्र जी हैं, जिन्होंने अपने पिताश्री को मुख्यमंत्री पद से विस्थापित कर मुंडा जी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए क्या कुछ नहीं किया. अर्जुन जी के सुखार में हेमंत ऋतु ला दिया. भगवान करें सोरेन-जुनिअर के घर आँगन में सुखार ख़त्म हो जाये. सावन भागों बरसे.
शुक्रवार, 17 सितंबर 2010
अर्जुनजी का तीर निशाने पर और बौखलाए यशवंतजी
अर्जुनजी का तीर निशाने पर और बौखलाए यशवंतजी
अर्जुनजी ने सधे हुए हाथों से झारखंडी तीर चलाया और रघुवरजी को हरिभजन पर लगा दिया....तो यशवंत जी को उनकी औकात बता दी....इसी औकात के लिए कभी यशवंत जी ने सुबोध जी से तगड़ा फाईट किया था. उन्होंने सुबोध जी से पूछा था "उन की औकात क्या है ? सुबोधजी सीमा में रहे. " सुबोधजी ने जी ने भी एक पोस्टर छाप बयान जारी कर के उनको लताड़ा था. लेकिन अर्जुन जी ने तो शब्दों से बिना चुनौती दिए बिना ही, उनको उनकी औकात बता दी और चढ़ बैठे आला कुर्सी पर.
अर्जुन जी ने सीधे गडकरी को पटाया और नागपुर तक अपनी पकड़ मजबूत कर ली. नागपुर बाबा से आशीर्वाद नागपुर जा कर ले आये. अब वे सरकारी खर्चे से नागपुर गए या कि अपनी मोटी जेब ढीली कर के गए यह तो पत्रकार लोग पाता लगायेंगे. लेकिन, यहाँ तो परम्परा है कि सरकार बनाने के लिए सरकारी टूर की व्यवस्था कर ली जाती है. राजस्थान जा कर अपने समर्थकों को खूब राजस्थानी भोजन करवाया जाता है. खान पान पर तब की रानीजी- सरकार ने खजाना खाली किया था कर दिया था और आने जाने का खर्च झारखण्ड सरकार ने वहां किया था.
सो अर्जुन जी ने दिखला दिया की वे कैसे मास्टर गेमर हैं. यशवंत जी को भी लालू जी की तरह याद नहीं रहता कि वे अब केन्द्रीय मंत्री नहीं हैं और वे नागपुर वाले बाबा के गुड बुक में भी नहीं हैं. बाबा को यशवंत जी का बिना इजाजत लिए मुह खोलना अच्छा नहीं लगता है. भाजपा में नेताओं को वही भजना पड़ता है जो नागपुर वाले बाबा कानो-कान सन्देश द्वारा भेजते हैं. और यशवंत जी को तो राष्ट्रीय स्तर पर बने रहने के लिए बड़े बड़े मसलों पर बोलने की आदत सी हो गई है. अडवानी जी ने जिन्ना से प्रेम दिखलाया तो वे हो गए परेशान और मार दिया एक विरोधी बयान. चाहते तो चुप भी रह सकते थे. इतना भी नहीं सोचा कि नागपुर वाले बाबा टेस्ट कर रहे हैं कि क्या जिन्ना का नाम बड़ा कर गांधीजी का नाम कुछ छोटा किया जा सकता है कि नहीं. वरना अडवानी जी जिन्ना के नाम पर विशेषण पर वशेषण का प्रयोग करते ?
यशवंत जी की फजीहत हुई. लेकिन उनको लगा की उनके बोलने से ही अडवाणी जी पार्टी में कुछ कमजोर पड़े हैं. सो जैसे ही प्रयोग-२ के तहत जशवंत ने जिन्ना की तारीफ़ में किताब लिख डाली तो फिर यशवंत जी जोर से उबले . जोर लगा कर, दम भर बोले. उनको लगा कि पार्टी से जशवंतजी के पलायन से पार्टी में उनकी पकड़ बढ़ेगी. लेकिन यह क्या, जशवंत फिर फुल पावर में पार्टी में वापस आ गए . लगता है कि यशवंत जी को अपना समाजवादी दिल चेंज करना होगा. "नागपुर वाले बाबा को कैसे खुश करें " वाला क्लास उनको करना होगा. उनको किसी संघ प्रचारक को अपना गुरू बनाना होगा. वरना अडवाणी और जशवंत से हारते हारते उनको प्रखंड स्तर तक के नेताओं से भी टक्कर लेने की नौबत आ जायेगी.
अब यशवंत जी एक आध पार्टी पदों से इस्तीफा दे दें या पार्टी को ही छोड़ कर चल दें तो इससे नागपुर को हानि होंगी? उनके लिए तो एक बिना इजाजर के बोलने वाले नेता से मुक्ति मिल जायेगी. सो बिना नागपुर के सेटिंग के वे दल के महान नेता बन ही नहीं सकते हैं. नागपुर में तो घुटना तो टेकना ही पड़ता है, चाहे वह कोई भी क्यों न हो. अब जनाब अरुण शौरी जी राजनाथ सिंह को बच्चा कह रहे थे, लेकिन जब एक बच्चा भाजपा का अध्यक्ष बन गया तो, उनकी भी कलम की स्याही सूख गई. जब अरुण शौरी जैसा नेता प्लस पत्रकार, इस घटना पर सारी तक नहीं बोल रहा है, ऐसे में यशवंत जी क्या करेंगे? कुछ नया करिए यशवंत जी, दिल या दल बदलिए, और इसके लिए मौसम भी अनुकूल है. बिहार में ज़रा दम लगाइए, शायद कोई दूसरा रास्ता मिल जाये.
अर्जुनजी ने सधे हुए हाथों से झारखंडी तीर चलाया और रघुवरजी को हरिभजन पर लगा दिया....तो यशवंत जी को उनकी औकात बता दी....इसी औकात के लिए कभी यशवंत जी ने सुबोध जी से तगड़ा फाईट किया था. उन्होंने सुबोध जी से पूछा था "उन की औकात क्या है ? सुबोधजी सीमा में रहे. " सुबोधजी ने जी ने भी एक पोस्टर छाप बयान जारी कर के उनको लताड़ा था. लेकिन अर्जुन जी ने तो शब्दों से बिना चुनौती दिए बिना ही, उनको उनकी औकात बता दी और चढ़ बैठे आला कुर्सी पर.
अर्जुन जी ने सीधे गडकरी को पटाया और नागपुर तक अपनी पकड़ मजबूत कर ली. नागपुर बाबा से आशीर्वाद नागपुर जा कर ले आये. अब वे सरकारी खर्चे से नागपुर गए या कि अपनी मोटी जेब ढीली कर के गए यह तो पत्रकार लोग पाता लगायेंगे. लेकिन, यहाँ तो परम्परा है कि सरकार बनाने के लिए सरकारी टूर की व्यवस्था कर ली जाती है. राजस्थान जा कर अपने समर्थकों को खूब राजस्थानी भोजन करवाया जाता है. खान पान पर तब की रानीजी- सरकार ने खजाना खाली किया था कर दिया था और आने जाने का खर्च झारखण्ड सरकार ने वहां किया था.
सो अर्जुन जी ने दिखला दिया की वे कैसे मास्टर गेमर हैं. यशवंत जी को भी लालू जी की तरह याद नहीं रहता कि वे अब केन्द्रीय मंत्री नहीं हैं और वे नागपुर वाले बाबा के गुड बुक में भी नहीं हैं. बाबा को यशवंत जी का बिना इजाजत लिए मुह खोलना अच्छा नहीं लगता है. भाजपा में नेताओं को वही भजना पड़ता है जो नागपुर वाले बाबा कानो-कान सन्देश द्वारा भेजते हैं. और यशवंत जी को तो राष्ट्रीय स्तर पर बने रहने के लिए बड़े बड़े मसलों पर बोलने की आदत सी हो गई है. अडवानी जी ने जिन्ना से प्रेम दिखलाया तो वे हो गए परेशान और मार दिया एक विरोधी बयान. चाहते तो चुप भी रह सकते थे. इतना भी नहीं सोचा कि नागपुर वाले बाबा टेस्ट कर रहे हैं कि क्या जिन्ना का नाम बड़ा कर गांधीजी का नाम कुछ छोटा किया जा सकता है कि नहीं. वरना अडवानी जी जिन्ना के नाम पर विशेषण पर वशेषण का प्रयोग करते ?
यशवंत जी की फजीहत हुई. लेकिन उनको लगा की उनके बोलने से ही अडवाणी जी पार्टी में कुछ कमजोर पड़े हैं. सो जैसे ही प्रयोग-२ के तहत जशवंत ने जिन्ना की तारीफ़ में किताब लिख डाली तो फिर यशवंत जी जोर से उबले . जोर लगा कर, दम भर बोले. उनको लगा कि पार्टी से जशवंतजी के पलायन से पार्टी में उनकी पकड़ बढ़ेगी. लेकिन यह क्या, जशवंत फिर फुल पावर में पार्टी में वापस आ गए . लगता है कि यशवंत जी को अपना समाजवादी दिल चेंज करना होगा. "नागपुर वाले बाबा को कैसे खुश करें " वाला क्लास उनको करना होगा. उनको किसी संघ प्रचारक को अपना गुरू बनाना होगा. वरना अडवाणी और जशवंत से हारते हारते उनको प्रखंड स्तर तक के नेताओं से भी टक्कर लेने की नौबत आ जायेगी.
अब यशवंत जी एक आध पार्टी पदों से इस्तीफा दे दें या पार्टी को ही छोड़ कर चल दें तो इससे नागपुर को हानि होंगी? उनके लिए तो एक बिना इजाजर के बोलने वाले नेता से मुक्ति मिल जायेगी. सो बिना नागपुर के सेटिंग के वे दल के महान नेता बन ही नहीं सकते हैं. नागपुर में तो घुटना तो टेकना ही पड़ता है, चाहे वह कोई भी क्यों न हो. अब जनाब अरुण शौरी जी राजनाथ सिंह को बच्चा कह रहे थे, लेकिन जब एक बच्चा भाजपा का अध्यक्ष बन गया तो, उनकी भी कलम की स्याही सूख गई. जब अरुण शौरी जैसा नेता प्लस पत्रकार, इस घटना पर सारी तक नहीं बोल रहा है, ऐसे में यशवंत जी क्या करेंगे? कुछ नया करिए यशवंत जी, दिल या दल बदलिए, और इसके लिए मौसम भी अनुकूल है. बिहार में ज़रा दम लगाइए, शायद कोई दूसरा रास्ता मिल जाये.
गुरुवार, 16 सितंबर 2010
नीतीश: गुड खायेंगे लेकिन गुलगुल्ला नहीं?
नीतीश: गुड खायेंगे लेकिन गुलगुल्ला नहीं?
बिहार में चुनाव सर पर है और हमारे नेता नीतीश जी परेशान हैं. कहीं भाजपा अपने असली चेहरों, नरेन्द्र मोदी और वरुण गांधी को चुनाव प्रचार में न उतार दें. लुटिया ही डूब जायेगी. सत्तर प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट का कबाड़ा बोल जाएगा. नीतीश जी गुड खाने में एक्सपर्ट हैं, लेकिन उनको गुलगुल्ला नहीं पचता है. संविधान में लिखा है कि इस देश में हर नागरिक को अपनी बात किसी भी शहर गाँव में जा कर व्यक्त करने की छूट है. लेकिन अब चुनाव पर हमरे नेता जी संविधान की फ़िक्र करने लगेंगें तो हो गया चुनाव.बस चुनाव के कारण ही नीतीश जी मोदी जी और वरुण जी को उनके संवैधानिक अधिकार से जुदा कर रहे हैं. अमेरिका ने भी मोदी जी को अमेरिका जाने का वीसा नहीं दिया था. नीतीश जी अमेरिकी वाला चल रहे हैं. वैसे, बाद में, अगर उनका हाथ किसी मंच पर मोदी जी धर कर हवा में लहराने लगेंगे तो उ अपना हाथ क्यों पीछे खींचेंगे? उस समय बिहार चुनाव समाप्त हो चुका होगा और अल्पसंख्यकों के वोट कौन्त हो चुके होंगें.
लेकिन, नीतीश जी की सहयोगी भाजपा सोचती है कि अगर उनके असली चेहरे सामने आ जायें तो कमाल हो जाएगा....." फिर से राममंदिर का मसला गर्म हो जाएगा और लोग अडवानी के जिन्ना प्रेम को भूल जायेंगे. भाजपा के शिव सेना प्रेम को भूल जायेंगे. बिहारी लोग बाल ठाकरे की लाठियों को भूल जायेंगे. अगर इस चुनाव में भाजपाजदयू गंठजोड़ की सरकार नहीं बनी, फिर भी भाजपा अगले चुनाव में, बिना जदयू की बैसाखी के दौड़ सकेगी. कुल मिला कर कमाल हो जाएगा."
सो मेरे प्रिय नेता नीतीश जी परेशान हैं. इधर उनके प्रिय बाहुबली लोग भी बिदक रहे हैं. पिछले चुनावों में गुंडाराज ख़तम करेंगे के नारे के साथ नीतीश जी ने कितना कितना गुंडों का काया कल्प कर दिया. उनको नेता बना दिया. इस बार तो लालू और पासवान तो हद किये हुए हैं. झटा झट कुल्ले फोर्सवन पर कब्जियाते चले जा रहे हैं. हम कौनो राहुल जी तो हैं नहीं न कि सोचेंगे कि कालेज के पढ़ाकू लड़कों को अपनी पार्टी के लिए न्योता दें और अपना लुटिया डूबा दें. हमको राजनीती में कोई प्रैक्टिकल नहीं न करनी है, बल्कि हमको प्रक्टिकल राजनीती करनी है. और उसके लिए ढेर फोर्सवन चाहिए. राजनीती फ्लोज फ्राम द बैरेल आफ फोर्सवन!
नीतीश जी को चिंता रामानंद तिवारी को लेकर भी हो रही है. अरे नीतीश भाई तो भाजपा को घुड़का रहे हैं ताकि वह अपने असली चेहरों को बिहार चुनाव में नहीं उतारे और ई तिवारी जी तड़ाक से बोल दिए कि भाजपा से गठबंधन पर फिर से विचार किया जाये. अरे, तिवारी जी नीतीश जी से दू कदम आगे काहे भागने की कोशिश कर रहे हैं? कहीं फिर से लालू जी की शरण में जानना पड़ जाये. इधर आप फ्रंटियर मेल बने और उधर नीतीश जी बिजली का कनेक्सने काट देंगे. फिर लारी लप्पा करते रह जाईयेगा.
अब बिहार चुनाव है, कौन दही चूडा का खेल नहीं न है. ईहाँ भीषण खेला चलता है. ढेरे रंग का टाकिंग होता है. झूठ पर ऐसा मुलम्मा चढाते हैं कि का कहें. सच तो यहाँ पर बेचारा बना, जनता के पास खड़ा रहता है. और जनता का वोट भी चोरी हो जाता है और सत्ता बनाने का अधिकार भी. बाद में बल गुलामी करना रह जाता. विकास सिर्फ अखबारी बयान में, सुन्दर सुन्दर अक्षर में झलकता है. अब अखबार में नेता जी का बयान कहता है कि बिहार तरक्की कर गया है, तो मानना ही पडेगा लेकिन क्या करें अनपढ़ वाईफ जी नहीं न मान रही हैं कि हमलोगन की असल में तरक्की हो गई है.
खैर, तरक्की की हकीकत कुछ भी हो, चुनाव तक मोदी जी और वरुण जी धैर्य से काम लें और चुनाव के बाद हमरे प्रिय नेता जी उनको फटाफट पटना बुला कर चूड़ा दही खिलायेंगे.
बिहार में चुनाव सर पर है और हमारे नेता नीतीश जी परेशान हैं. कहीं भाजपा अपने असली चेहरों, नरेन्द्र मोदी और वरुण गांधी को चुनाव प्रचार में न उतार दें. लुटिया ही डूब जायेगी. सत्तर प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट का कबाड़ा बोल जाएगा. नीतीश जी गुड खाने में एक्सपर्ट हैं, लेकिन उनको गुलगुल्ला नहीं पचता है. संविधान में लिखा है कि इस देश में हर नागरिक को अपनी बात किसी भी शहर गाँव में जा कर व्यक्त करने की छूट है. लेकिन अब चुनाव पर हमरे नेता जी संविधान की फ़िक्र करने लगेंगें तो हो गया चुनाव.बस चुनाव के कारण ही नीतीश जी मोदी जी और वरुण जी को उनके संवैधानिक अधिकार से जुदा कर रहे हैं. अमेरिका ने भी मोदी जी को अमेरिका जाने का वीसा नहीं दिया था. नीतीश जी अमेरिकी वाला चल रहे हैं. वैसे, बाद में, अगर उनका हाथ किसी मंच पर मोदी जी धर कर हवा में लहराने लगेंगे तो उ अपना हाथ क्यों पीछे खींचेंगे? उस समय बिहार चुनाव समाप्त हो चुका होगा और अल्पसंख्यकों के वोट कौन्त हो चुके होंगें.
लेकिन, नीतीश जी की सहयोगी भाजपा सोचती है कि अगर उनके असली चेहरे सामने आ जायें तो कमाल हो जाएगा....." फिर से राममंदिर का मसला गर्म हो जाएगा और लोग अडवानी के जिन्ना प्रेम को भूल जायेंगे. भाजपा के शिव सेना प्रेम को भूल जायेंगे. बिहारी लोग बाल ठाकरे की लाठियों को भूल जायेंगे. अगर इस चुनाव में भाजपाजदयू गंठजोड़ की सरकार नहीं बनी, फिर भी भाजपा अगले चुनाव में, बिना जदयू की बैसाखी के दौड़ सकेगी. कुल मिला कर कमाल हो जाएगा."
सो मेरे प्रिय नेता नीतीश जी परेशान हैं. इधर उनके प्रिय बाहुबली लोग भी बिदक रहे हैं. पिछले चुनावों में गुंडाराज ख़तम करेंगे के नारे के साथ नीतीश जी ने कितना कितना गुंडों का काया कल्प कर दिया. उनको नेता बना दिया. इस बार तो लालू और पासवान तो हद किये हुए हैं. झटा झट कुल्ले फोर्सवन पर कब्जियाते चले जा रहे हैं. हम कौनो राहुल जी तो हैं नहीं न कि सोचेंगे कि कालेज के पढ़ाकू लड़कों को अपनी पार्टी के लिए न्योता दें और अपना लुटिया डूबा दें. हमको राजनीती में कोई प्रैक्टिकल नहीं न करनी है, बल्कि हमको प्रक्टिकल राजनीती करनी है. और उसके लिए ढेर फोर्सवन चाहिए. राजनीती फ्लोज फ्राम द बैरेल आफ फोर्सवन!
नीतीश जी को चिंता रामानंद तिवारी को लेकर भी हो रही है. अरे नीतीश भाई तो भाजपा को घुड़का रहे हैं ताकि वह अपने असली चेहरों को बिहार चुनाव में नहीं उतारे और ई तिवारी जी तड़ाक से बोल दिए कि भाजपा से गठबंधन पर फिर से विचार किया जाये. अरे, तिवारी जी नीतीश जी से दू कदम आगे काहे भागने की कोशिश कर रहे हैं? कहीं फिर से लालू जी की शरण में जानना पड़ जाये. इधर आप फ्रंटियर मेल बने और उधर नीतीश जी बिजली का कनेक्सने काट देंगे. फिर लारी लप्पा करते रह जाईयेगा.
अब बिहार चुनाव है, कौन दही चूडा का खेल नहीं न है. ईहाँ भीषण खेला चलता है. ढेरे रंग का टाकिंग होता है. झूठ पर ऐसा मुलम्मा चढाते हैं कि का कहें. सच तो यहाँ पर बेचारा बना, जनता के पास खड़ा रहता है. और जनता का वोट भी चोरी हो जाता है और सत्ता बनाने का अधिकार भी. बाद में बल गुलामी करना रह जाता. विकास सिर्फ अखबारी बयान में, सुन्दर सुन्दर अक्षर में झलकता है. अब अखबार में नेता जी का बयान कहता है कि बिहार तरक्की कर गया है, तो मानना ही पडेगा लेकिन क्या करें अनपढ़ वाईफ जी नहीं न मान रही हैं कि हमलोगन की असल में तरक्की हो गई है.
खैर, तरक्की की हकीकत कुछ भी हो, चुनाव तक मोदी जी और वरुण जी धैर्य से काम लें और चुनाव के बाद हमरे प्रिय नेता जी उनको फटाफट पटना बुला कर चूड़ा दही खिलायेंगे.
शुक्रवार, 3 सितंबर 2010
अर्जुन बनेगें कि रघुवर......कि सिन्हा जी कब्जियायेंगे कुर्सी ?
अर्जुन बनेगें कि रघुवर......कि सिन्हा जी कब्जियायेंगे कुर्सी ?
सगरो बड़ा छटपटाहट है...कौन होगा अगला मुख्मंत्री ? इसी पर करते हैं आपसे दस हजार के लिए सवाल नंबर वन.....अर्जुन का निशाना बेहतर था कि रामचंद्र जी(रघुवर) का? आपके लिए आप्शन है-(ए) दोनों में से किसी का नहीं. (बी) अर्जुन का, अगर निशाना कुर्सी पर साधना हो.(सी)रामचंद्र का, अगर निशाना थैली पर साधना हो (डी)अर्जुन का, अगर निशाना गडकरी पर साधना हो.
सर, मेरा जवाब साफ़ है कि मैं आप्शन (डी) को मानूंगा क्योंकि इस आप्शन एक साथ दो काम करेगा..अर्जुन की तीरंदाजी भीई पास हो जायेगी और गडकरी का bhii .......
अरे आप यह क्या कह रहे हैं.....आप सिर्फ आप्शन बोलिए उसे चुनने का कारण मत बताइए....अगर आप कारण बताना शुरू कर देंगे तो सब उल्टा-पुल्टा हो जाएगा...हमारा खेल हंगामे में बदल जाएगा....कुर्सी फिक्सिंग शुरू हो जायेगी. सी.बी.आई. बुला ली जायेगी...लम्बी जाँच चलेगी और सभी अभियुक्त छूट जायेंगे और इस बीच बिना पैसा लगाये रोज पब्लिसिटी पा लेंगें. राजनीति में उनकी तरक्की हो जायेगी. सो आप सिर्फ आप्शन बोलिए....
सर मैं आप्शन (डी) पर अडिग हूँ...मैं कोई लफड़ा मोल नहीं लेना चाहता और आप भी लफडा मोल लेना नहीं चाहते, यह बात मुझे पसंद आई, लेकिन आपने राजनीति से सम्बंधित प्रश्न क्यों उठाये...
अरे, अरे आप तो मेरे काम करने की कोशिश कर रहे हैं...प्रश्न करना मेरा काम है और आपका काम सिर्फ जवाब देना है. और मै यंहां का लालू हूँ और जहाँ लालू होते हैं वहां दूरा अगर बोलता है तो उसकी फजीहर निश्चित है, समझे कि नहीं.
लेकिन एक लघु शंका है....
अरे, अरे आप हाट कुर्सी पर बैठ कर क्या बोल रहे हैं? आपको फारिग हो कर ही हाट कुर्सी पर आना चाहिए था. फिर भी आप क्या कहना चाहते हैं जल्दी कहिये....
सर जी, आपने महामना सिन्हा जी को चीफ मिनिस्टर के आप्शन में क्यों नहीं रखा? वे भी थो कुर्सी पाने के लिए चत्पताये हुआ हैं...
मै ज्यादा पालिटिक्स नहीं जनता.... एक बार अक्तिव पालिटिक्स में कूदा था और एक अच्छे दोस्त को खो बैठा...यूपी का ब्रांड अम्बेसडर बना और फिर से विवादों में घिर गया...फिर पर्लती मरी और गुजरात का ब्रांड अम्बस्दर बन गया. पता नहीं अब क्या होगा, लेकिन जब अपर्णा सर ऊखल में डाल ही दिया है तो मूसल से क्या डरना...
खैर, पचास हजार के लिए यह रहा अगला प्रश्न - क्या नीत्तीश जी ने बिहार को सेंटर के पैसे से तरक्की दी या या फिर कोई और ट्रीक अपनाया?
सर जी, आपने फिर से राजनीतिक प्रश्न ही परोस दिया है...मैं फिर बोलूँगा तो आप कहेंगे की मेरा बोलने का काम नहीं है, यश काम सिर्फ और सिर्फ आपके और नेताओं का काम है...आप जनता हो और नीतीश जी को सुन कर जाँ लो कि आपकी कितनी तरक्की हुई है....उनकी इस्पीच से पता चलता है की बिहार और उसकी जनता की तरकी इतनी हुई है, इतनी हुई है कि लोगों की आँखें चौंधिया गई हैं और लोग कुछ देख और सुन नहीं पा रहे हैं...मैं तो सदमे में हूँ यह जाँ कर कि मेरे बेजोर तरक्की हो गई है...अरे सर जी मैं तो यहाँ आने से पहले अपनी का गहना बेच कर आया हूँ और अगर फेल कर गया तो फिर किसी दूसर राज्य में जा कर रोजी रोटी तलाशनी होगी और अगर मुंबई जाने की नौबत आई तो नीतीश जी के गठबंधन के शिव सैनिको के जूते खाने के लियेया सम्मान के साथ तैयार रहना होगा......
सगरो बड़ा छटपटाहट है...कौन होगा अगला मुख्मंत्री ? इसी पर करते हैं आपसे दस हजार के लिए सवाल नंबर वन.....अर्जुन का निशाना बेहतर था कि रामचंद्र जी(रघुवर) का? आपके लिए आप्शन है-(ए) दोनों में से किसी का नहीं. (बी) अर्जुन का, अगर निशाना कुर्सी पर साधना हो.(सी)रामचंद्र का, अगर निशाना थैली पर साधना हो (डी)अर्जुन का, अगर निशाना गडकरी पर साधना हो.
सर, मेरा जवाब साफ़ है कि मैं आप्शन (डी) को मानूंगा क्योंकि इस आप्शन एक साथ दो काम करेगा..अर्जुन की तीरंदाजी भीई पास हो जायेगी और गडकरी का bhii .......
अरे आप यह क्या कह रहे हैं.....आप सिर्फ आप्शन बोलिए उसे चुनने का कारण मत बताइए....अगर आप कारण बताना शुरू कर देंगे तो सब उल्टा-पुल्टा हो जाएगा...हमारा खेल हंगामे में बदल जाएगा....कुर्सी फिक्सिंग शुरू हो जायेगी. सी.बी.आई. बुला ली जायेगी...लम्बी जाँच चलेगी और सभी अभियुक्त छूट जायेंगे और इस बीच बिना पैसा लगाये रोज पब्लिसिटी पा लेंगें. राजनीति में उनकी तरक्की हो जायेगी. सो आप सिर्फ आप्शन बोलिए....
सर मैं आप्शन (डी) पर अडिग हूँ...मैं कोई लफड़ा मोल नहीं लेना चाहता और आप भी लफडा मोल लेना नहीं चाहते, यह बात मुझे पसंद आई, लेकिन आपने राजनीति से सम्बंधित प्रश्न क्यों उठाये...
अरे, अरे आप तो मेरे काम करने की कोशिश कर रहे हैं...प्रश्न करना मेरा काम है और आपका काम सिर्फ जवाब देना है. और मै यंहां का लालू हूँ और जहाँ लालू होते हैं वहां दूरा अगर बोलता है तो उसकी फजीहर निश्चित है, समझे कि नहीं.
लेकिन एक लघु शंका है....
अरे, अरे आप हाट कुर्सी पर बैठ कर क्या बोल रहे हैं? आपको फारिग हो कर ही हाट कुर्सी पर आना चाहिए था. फिर भी आप क्या कहना चाहते हैं जल्दी कहिये....
सर जी, आपने महामना सिन्हा जी को चीफ मिनिस्टर के आप्शन में क्यों नहीं रखा? वे भी थो कुर्सी पाने के लिए चत्पताये हुआ हैं...
मै ज्यादा पालिटिक्स नहीं जनता.... एक बार अक्तिव पालिटिक्स में कूदा था और एक अच्छे दोस्त को खो बैठा...यूपी का ब्रांड अम्बेसडर बना और फिर से विवादों में घिर गया...फिर पर्लती मरी और गुजरात का ब्रांड अम्बस्दर बन गया. पता नहीं अब क्या होगा, लेकिन जब अपर्णा सर ऊखल में डाल ही दिया है तो मूसल से क्या डरना...
खैर, पचास हजार के लिए यह रहा अगला प्रश्न - क्या नीत्तीश जी ने बिहार को सेंटर के पैसे से तरक्की दी या या फिर कोई और ट्रीक अपनाया?
सर जी, आपने फिर से राजनीतिक प्रश्न ही परोस दिया है...मैं फिर बोलूँगा तो आप कहेंगे की मेरा बोलने का काम नहीं है, यश काम सिर्फ और सिर्फ आपके और नेताओं का काम है...आप जनता हो और नीतीश जी को सुन कर जाँ लो कि आपकी कितनी तरक्की हुई है....उनकी इस्पीच से पता चलता है की बिहार और उसकी जनता की तरकी इतनी हुई है, इतनी हुई है कि लोगों की आँखें चौंधिया गई हैं और लोग कुछ देख और सुन नहीं पा रहे हैं...मैं तो सदमे में हूँ यह जाँ कर कि मेरे बेजोर तरक्की हो गई है...अरे सर जी मैं तो यहाँ आने से पहले अपनी का गहना बेच कर आया हूँ और अगर फेल कर गया तो फिर किसी दूसर राज्य में जा कर रोजी रोटी तलाशनी होगी और अगर मुंबई जाने की नौबत आई तो नीतीश जी के गठबंधन के शिव सैनिको के जूते खाने के लियेया सम्मान के साथ तैयार रहना होगा......
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
