शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

अर्जुनजी का तीर निशाने पर और बौखलाए यशवंतजी

अर्जुनजी  का तीर निशाने पर और बौखलाए यशवंतजी  
अर्जुनजी  ने सधे हुए हाथों से झारखंडी तीर चलाया और रघुवरजी  को हरिभजन पर लगा दिया....तो यशवंत जी को उनकी औकात बता दी....इसी औकात के लिए कभी यशवंत जी ने सुबोध  जी से तगड़ा फाईट किया था. उन्होंने सुबोध जी से पूछा था "उन  की औकात क्या है  ? सुबोधजी  सीमा में रहे. " सुबोधजी  ने जी ने भी एक पोस्टर छाप बयान जारी कर के उनको लताड़ा था. लेकिन अर्जुन जी ने तो  शब्दों से  बिना चुनौती दिए बिना ही, उनको उनकी औकात बता दी और चढ़ बैठे आला कुर्सी पर.

अर्जुन जी ने सीधे गडकरी को पटाया और नागपुर तक अपनी पकड़ मजबूत कर ली. नागपुर बाबा से आशीर्वाद नागपुर जा कर ले आये. अब वे सरकारी खर्चे से नागपुर गए या कि अपनी मोटी जेब ढीली कर के गए यह तो पत्रकार लोग पाता लगायेंगे.  लेकिन, यहाँ तो परम्परा है कि सरकार  बनाने के लिए सरकारी टूर की व्यवस्था कर ली जाती है. राजस्थान जा कर अपने समर्थकों को खूब राजस्थानी भोजन करवाया  जाता है. खान पान पर तब की रानीजी- सरकार ने खजाना खाली किया था  कर दिया था और आने जाने का खर्च झारखण्ड सरकार ने वहां किया था.

सो अर्जुन जी ने दिखला  दिया की वे कैसे मास्टर गेमर  हैं. यशवंत जी को भी लालू जी की तरह याद नहीं रहता कि वे अब केन्द्रीय  मंत्री नहीं हैं और वे नागपुर वाले बाबा के गुड बुक में भी नहीं हैं. बाबा को यशवंत जी का बिना इजाजत लिए मुह खोलना अच्छा नहीं लगता है. भाजपा में नेताओं को वही भजना पड़ता  है जो नागपुर वाले बाबा कानो-कान सन्देश द्वारा  भेजते हैं. और यशवंत जी को तो राष्ट्रीय स्तर पर बने रहने के लिए बड़े बड़े मसलों पर बोलने की आदत सी हो गई है. अडवानी जी ने जिन्ना से प्रेम दिखलाया तो वे हो गए परेशान और मार दिया एक विरोधी बयान. चाहते तो चुप भी रह सकते थे. इतना भी नहीं सोचा कि नागपुर वाले बाबा टेस्ट कर रहे हैं कि क्या जिन्ना का नाम बड़ा कर गांधीजी का नाम कुछ छोटा किया जा सकता है कि नहीं. वरना अडवानी जी जिन्ना के नाम पर विशेषण पर वशेषण का प्रयोग करते ?

यशवंत जी की फजीहत हुई. लेकिन उनको लगा की उनके बोलने से ही अडवाणी जी पार्टी में कुछ कमजोर पड़े हैं. सो जैसे ही प्रयोग-२ के तहत जशवंत ने जिन्ना की तारीफ़ में किताब लिख डाली तो फिर यशवंत जी जोर से उबले . जोर लगा कर, दम भर  बोले. उनको लगा कि पार्टी से जशवंतजी  के पलायन से पार्टी में उनकी पकड़ बढ़ेगी. लेकिन यह क्या, जशवंत फिर फुल पावर में पार्टी में वापस आ गए . लगता है कि यशवंत जी को अपना समाजवादी दिल चेंज  करना होगा.  "नागपुर वाले बाबा को कैसे खुश करें " वाला क्लास उनको करना होगा. उनको किसी संघ प्रचारक को अपना गुरू बनाना होगा. वरना अडवाणी और जशवंत से हारते हारते उनको प्रखंड स्तर तक के नेताओं से भी टक्कर लेने की नौबत आ जायेगी. 

अब यशवंत जी एक आध पार्टी पदों से इस्तीफा दे दें या पार्टी को ही छोड़ कर चल दें तो इससे नागपुर को हानि होंगी? उनके लिए तो एक बिना इजाजर के बोलने वाले नेता से मुक्ति मिल जायेगी. सो  बिना नागपुर के सेटिंग  के वे दल के  महान नेता बन ही नहीं सकते हैं. नागपुर में तो घुटना तो टेकना ही पड़ता है, चाहे वह कोई भी क्यों न हो. अब जनाब अरुण शौरी जी राजनाथ सिंह को बच्चा  कह रहे  थे, लेकिन जब एक  बच्चा  भाजपा का अध्यक्ष बन गया तो, उनकी भी कलम की स्याही सूख  गई. जब अरुण शौरी जैसा नेता प्लस पत्रकार, इस घटना पर सारी तक नहीं बोल रहा है,  ऐसे में यशवंत जी क्या करेंगे? कुछ नया करिए यशवंत जी, दिल या दल बदलिए, और इसके लिए मौसम भी अनुकूल है. बिहार में ज़रा दम लगाइए, शायद कोई दूसरा रास्ता मिल जाये.   

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