रतन टाटा हों या फिर भाजपा नेता अरुण शौरी, दोनों को मौका मिल गया स्पेक्ट्रम घोटाले पर बोलने का. रतन टाटा भ्रष्टाचार पर बड़ी बड़ी बातें करने लगे थे. लेकिन उसी समय राडिया से उनकी हुई बातों के लीक हो जाने के कारण उनकी और भाजपा की हालत गड़बड़ा गई है .अब भाजपा को शायद जेपीसी जाँच की मांग करते हुए अपने ऊपर भी खतरा नजर आता होगा.
उधर, महोदय अरुण शौरी ने राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और नायडू पर हमला बोल दिया है. लेकिन, इस हमले के लिए शौरी को बहुत देर इन्तजार करना पड़ा है. चलिए, स्पेक्ट्रम घोटाले के कारण दूध का छीका तो टूटा. बिल्ली का भाग जगा. जब शौरी जी संसद में मुकेश अम्बानी के खिलाफ आग उगलने की पूरी तयारी में थे, तभी राजनाथ जी और अडवाणी जी के इशारे पर उनकी जगह नायडू को खड़ा कर दिया गया. आखिर पूंजीपतियों की पार्टी है भाजपा और उसके नेता लोग अगर किसी पूंजीपति के खिलाफ शोध वक्तव्य देने लगेंगे तो भाजपा के चरित्र पर दाग नहीं लगेगा क्या? अवश्य लगेगा. यह बात अरुण शौरी को समझना चाहिए. लेकिन, क्या किया जाए अरुण शौरी को लगता है की वे पत्रकार हैं. जब कि पत्रकारिता के आदर्शों का उन्होंने शायद ही कभी पालन किया हो. लगता है, अडवाणी जी जब रथ ले कर पूरे देश में साम्प्रदाइकता का ताण्डव कर रहे थे, तब शौरी जी की कलम सूख गई थी. शौरी जी को कभी आरएसएस से प्यार हो जाता है तो कभी उसकी राजनीतिक शाखा पर गुस्सा आ जाता है. बात असल में यह है कि इनदिनों भाजपा में उनकी पूछ घट गई है. गडकरी जी तो उनके नाम से बिदक जाते हैं.
पता नहीं, रतन टाटाजी को क्या जरूरत पड़ गई थी क़ि कांच के महल में बैठ कर भ्रष्टाचार पर प्रवचन देने लगे. कांच को आदत नहीं होती है, भ्रष्टाचार पर भाषण सुनने की. सो, उसका दरकना लाजिमी था और टेप के रूप में दरका गया. और टूटा हुआ कांच और टूटा हुआ हीरा जुड़ता नहीं है. अब टेप के प्रसारण पर रोक लगे या टेप लीक करने वाले को सजा मिले, उससे टाटाजी के माथे पर से बोली गयी बातों का बोझ तो उतरेगा नहीं. यह लीक भोपाल गैस लीक जैसा है. लेकिन, इस लीक से अडवाणी जी परेशान हैं. उनको बड़ी शर्म आ रही है. गजब हैं जनाब अडवाणी जी, उनको जिन्ना की जय करने में या गुजरात में नरसंहार होने पर शर्म नहीं लगी थी, लेकिन राजनीतिक फिक्सिंग के मामले में बड़ी शर्म लग रही है. दिल के किस कोने में उन्होंने अपनी प्यारी शर्म छिपा कर रखी थी? इस पर भी जेपीसी जाँच होनी चाहिए. अरे अडवाणी जी आपको जिन बातों पर शर्म करनी चाहिए उसकी सूची तो बड़ी लम्बी है, विश्वास न होतो अरुण शौरी ही आपको गिनवा देंगे.
राजनीति के क्षेत्र में इन दिनों बड़ा उलटफेर हो रहा है, भ्रष्टाचार पर बवाल मच रहा है. बेचारे अशोक चौहान तीन हजार वर्ग फीट के फ्लैट पर फ़्लैट हो गए. बेचारे येदुरप्पा अपने ही दल के अनेक विधायकों के विरोध के बाद अपनी कुर्सी बचाने के लिए अब अपने ही दल के शीर्ष नेताओं को धमकी दे रहे हैं कि अगर उनको गद्दी से उतारा गया तो वे भाजपा को समुद्र में डुबा देंगे. वे भी जमीन के मामले में फंस गए हैं. अब यह बात तो जग जाहिर है कि जमीन के कारण दुनिया में हर युग में बवाल मचता ही रहा है. पांच गाँव देने बे बदले कौरवों ने महाभारत के युद्ध को आमंत्रित किया और उनका सर्वनाश हो गया.
लेकिन, यह तो मानव की नीयति है कि वह जमीन के पीछे भागते हुए हमेशा जमीन से कट जाता रहा है. जमीन परिवार को बांटता-काटता है. भाई-भाई के बीच खून खराबे का कारण बनता है. और यही कारण है कि जब बड़े बड़े मॉल बनाने का धंधा मुंबई में शुरू हुआ तो जो महान हस्तियां इस धंधे से जुड़ीं उनको भाई कह कर संबोधित किया गया. जमीन का धंधा यानी बिग बौस का धंधा. बिग बौस यानी जिनको लोग प्यार से भाई कह कर सिर झुका लेते हैं और अपनी जमीन उनके नाम औने-पौने दाम पर कर देते हैं. लेकिन अब उन महान भाइयों का जमाना लद गया है, जमीन अब राजनीतिक स्तर पर ही सलटा ली जाती है.
कारण बहुत स्पष्ट है कि हमारे बहुत से नेता या तो डैरेक्ट भाईगिरी स्कूल से आते हैं या फिर राजनीती में आकर भाईगिरी का होम ट्यूशन कर लेते हैं. ऐसे नेताओं के भाषणों में जोरदार तेवर होता है, ऊंचा स्वर होता है, मसल पावर भी झलता है, मनी पावर भी उबलता है और वे मनमोहन जी की तरह हमेशा काम या आंकड़ों का पाठ संयत स्वर में या एक ही धीमी पिच में नहीं करते हैं. वे जब बोलते हैं तो सैकड़ों मील दूर बैठे लोग बिना किसी माध्यम के सुन लेते हैं. वे जब बोलते हैं तो विरोधी तो विरोधी, आम लोगों की भी नींद उड़ जाती है. वे अपने क्षेत्र में वैसे प्रभावी और भौकने वाले होते हैं, जिस प्रकार स्वान स्वामी अपने क्षेत्र में अपनी पूँछ ऊंची कर भौंक लगाते हैं. ऐसे महान नेता गण अपने क्षेत्र की रक्षा भी उसी प्रकार करते हैं, जिस प्रकार अपनी गली के शासक स्वान स्वामी जी करते हैं. ऐसे सभी महान नेताओं को शत-शत कोटि प्रणाम, करने की जरूरत है. ध्यान रहे कि तुलसी दास जी ने भी रामचरित मानस लेखन शुरू करते हुए हर प्रकार के लोगों की स्तुति की, जिनमें खल, कामी, चोर, बेईमान सभी शामिल थे. तब भी उनको रामचरित मानस के लोकार्पण के बाद बहुत उत्पातियों का सामना करना पड़ा था. हम तो आम लोग हैं, बस अपनी सलामती की दुआ ही कर सकते हैं, जिसका निश्चित होना असं नहीं है.
मेरा बैड लक मेरे फेवर में हो रहा है- मुझको बिग बौस से निमंत्रण मिल गया है.और मैं अब एक गाली-गुरु से गालियाँ सीख रहा हूँ. उनके उपयोग की मुकम्मल जानकारी ले रहा हूँ. जैसे कोई गायक रागों का अभ्यास सुबह- शाम करता है, मैं भी लगातार गालियाँ बकने का और उसमें अपने स्टाइल भरने की भी कोशिश कर रहा हूँ. मां, बाप, भाई, बहन तथा अन्य नातों से सम्बंधित गालियाँ तो मैंने कंठस्थ कर लिए हैं.
लेकिन, क्या बताएं यह समाज किसी की तरक्की देखना ही नहीं चाहता है. गालियों के स-स्वर रियाज से मेरे पडोसी बड़े बौखलाए हैं. कल तो सतीश जी ने तो हद ही कर दी. उन्होंने सपत्नी मेरे फ्लैट में आ कर मुझे चेतावनी देते हुए कहा कि उसके बेटे ने मेरे रियाज का लाभ उठाते हुए तेरह गालियां सीख ली हैं, जिनका वह अपने साथियों पर प्रयोग करते हुए पार्क में पिट चुका है. इतना ही नहीं वे मेरे फ्लैट से जाते-जाते मुझे कुछ स्पेशल बिहारी गालियां दे गए. लेकिन, मैंने उन गालियों को उनका फ्री उपहार मान कर स्वीकार कर लिया है.
पड़ोसियों की बेवजह नुक्ताचीनी के बाद, मैंने गालियों की प्रैक्टिस के लिए एक खंडहर पड़े मकान में जगह दूंढ ली है. मैंने शपथ ले ली है कि बिग बौस में मैं तहलका मचा कर ही दम लूँगा. लेकिन, मेरी राह में सिर्फ पडोसी ही नहीं, बल्कि घर के लोग भी बाधक बन रहे हैं. कल मेरे बड़े भाई ने मेरे फ्लैट में आ कर मेरी धर्मपत्नी से पूछा,' क्या बब्लुआ आज कल गालियां बकने की प्रैक्टिस कर रहा है ? क्या उसका दिमाग गड़बड़ा गया है ? क्या किसी दिमाग के डाक्टर से उसकी जाँच करवाई ? मैं बाथरूम में छिप कर दोनों की बातें गौर से सुन रहा था- धर्मपत्नी जी ने अधर्म के रास्ते पर चलते हुए बड़े भाई जी को बताया, " मैं पहले उनको किसी शैकोलोजिस्ट से दिखलाने की बात सोच रहीं हूँ , फिर बाद में कांके के मानसिक आरोग्यशाला में उनको भरती करवाने पर विचार करूंगी."
अब देखिये जनाब, मेरी धर्मपत्नी के कितने खतरनाक विचार हैं. अरे, हम तो बिग बौस में चमकने-दमकने जा रहे हैं, हरे-हरे नोट की माला पहनने जा रहे हैं, और यहाँ मुझको पागल समझा जा रहा है. बड़े भाई जी के जाने के बाद , मैंने अपनी धर्म पत्नी जी को बताया कि बिग बौस में सफलता और मालामाल होने के लिए गालियों का कितना विशाल महत्त्व है.
मेरी धर्मपत्नी जी हत्थे से उखड़ गयीं और बोलीं,' मैं बिग बौस देखती हूँ. बिग बौस में जाने के लिए गालियों के रियाज की क्या आवश्यकता है ?
मैंने उनको बताया,' देखो, जब बिग बौस के घर में कोई गाली बकता है तो उसके गाली-युक्त संवाद की रेकार्डिंग कर ली जाती है, लेकिन, बाद में गाली की जगह "पीं" की आवाज भर दी जाती है. अगर कोई प्रतियोगी गाली ही न बके तो उसके संवाद में "पीं" की आवाज नहीं होगी. लेकिन, क्या तुमने बिग बौस के किसी प्रतिभागी का संवाद बिना "पीं" की आवाज के सुना है ? जानती हो बिग बौस देखने वाले तो इन दिनों एक प्रतियोगिता करते हैं-पहचानो कौन सी गाली "पीं" की आवाज के नीचे दबी है. यह गेम बहुत पोपुलर हो गया है."
पत्नी जी ने और तेज आवाज में अपनी बात पेश की," देखो जी, आप कल सुबह तैयार हो जाईगा. आपको मैं शैकोलोजिस्ट के पास ले जाउंगी."
मुझे भी तेवर आ गया, " यह क्या बकवास है ? अरे तुम तो जानती हो कि मैं कभी गालियां नहीं निकाला करता हूँ. इन दिनों गालियों की प्रैक्टिस तो मैं बिग बौस में तहलका मचाने और माला-माल होने के लिए कर रहा हूँ. मेरा प्रोगाम है कि मैं बिग बौस प्रतियोगिता जीत कर तुम्हारे लिए सुन्दर और कीमती साड़ियों का जुगाड़ करूँगा."
मेरी पत्नी मेरे पास से उठ कर चली गई. और मैं सोचने लगा कि बिग बौस में जीत दर्ज करने का मेरा सपना क्या सपना ही रह जायेगा? क्या मेरे सपनों को वे लोग तोड़ देंगे, जिनके लिए मैंने पूरी जिन्दगी खट कर काम किया, कभी एक पेग शराब नहीं पी, कभी किसी को गाली नहीं दी और अपने दफ्तर के बौस की गालियां अनसुनी करता रहा ताकि मेरी नौकरी पर खतरा न आ जाए. और आज जब माला-माल होने के लिए मैं जीवन में पहली बार गालियों का रियाज कर रहा हूँ तो मेरे परिवार के लोग ही मुझको पागल समझ रहे हैं.
लेकिन, मेरे दोस्तो, आप जानते ही हैं कि बिना गालियों के बिग बौस का तो वजूद ही समाप्त हो जाएगा. अरे, गालियां हमारी संस्कृति के अंग हैं. शादी-ब्याह के अवसर पर हमारी घर की महिलाएं कितनी गालियां गीतों के माध्यम से सुनाती हैं. बाराती के सभी श्रेष्ठजनों को चुन-चुन कर गरमा-गरम गालियों से स्वागत करतीं हैं और बाराती के श्रेष्ट जन उन गालियों का लुफ्त उठाते हैं. बिग बौस कार्यक्रम भी हमारी संस्कृति के अनुसार गाली आधारित कार्यक्रम है. पर पता नहीं, सरकार भी भारतीय संस्कृति और इंटरनेश्नल गालियों से ओत-प्रोत बिग बौस कार्यक्रम को देर रात के समय शिफ्ट करना चाहती है. अरे, गालियां दिन में दो या फिर देर रात, उसके टेस्ट में कोई फर्क नहीं पड़ता है. गाली देना और सुनाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार से हमें कोई वंचित नहीं कर सकता है.
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राजा की राजगद्दी छिन गई. अब कोर्ट का चक्कर लगायेंगे. लेकिन एक बात है राजा जी लम्बे समय तक चर्चे में रहेंगे. और राजनीति की मान्यता है की गुमनामी से बदनामी बेहतर होती है. सो राजा तो बल्ले-बल्ले होंगें ही. स्वयं को थ्री डी स्पेक्ट्रम में देख रहे होंगे. अब टू जी स्पेक्ट्रम पीछे रह जायेगा और राजा का थ्री डी स्पेक्ट्रम हर दिन समाचार में छाया रहेगा. कुल मिला कर वे एक उम्दा इतिहास बनायेंगे. उनके बाल-बच्चे अपने बच्चों को राजा जी के कारनामों के किस्से सुनायेंगे और कहेंगे कि यह वही व्यक्ति थे जो मनमोहन जी की पैनी नजरों के नीचे कितना ऊँचा-नीचा काम कर के दिखा दिया.
यह राजा जी का ही कमाल है कि वे सारे घोटालों को मात देने कि स्थिति में आ गए हैं. पता नहीं उनके घोटाले की पूरी राशि का व्योरा कब तक मेलेगा या फिर सारा व्योरा किसी फ़ाइल में कैद हो कर रह जाएगा? आशा है कि हमारे जीवन काल में किसी दिन वह घड़ी आएगी, जब हमें राशि का डीटेल मिलेगा और गिनीज बुक ऑफ़ रिकार्ड में वह दर्ज होगा. हे ईश्वर! उसके पहले कोई और बड़ा घोटाला न कर दे, मैं इसकी प्रार्थना करता रहूँगा . यह घोटाला मील का पत्थर बनेगा. लोग इसकी कहानियां सदियों-सदियों तक सुनाएंगे.
लेकिन, राजा जी से कुछ प्रश्न करने की जुर्रत कर रहा हूँ-यह सब अकेले किया या किसी और का भी सहयोग लिया ? क्या कभी आप लालू जी से भी मिले और उनको अपना गुरु तो नहीं बनाया ? क्या आगे चल कर घोटाला-कला को और विकसित करने के लिए कोई संसथान खोलने का तो इरादा नहीं रखते हैं ?
इधर सोनिया जी ने लेन-देन और लालच-वालच पर मनमोहन जी को सामने बैठा कर पुरजोर लेक्चर जड़ दिया है. राजा के कारण अर्थशास्त्री जी बड़ी मायूस दिखे. वे कोई सीबीआई तो हैं नहीं कि किसी मंत्री की साजिश को पहले से ही भांप लें.
अरे, सीबीआई भी तो घोटाला-घटना संपन्न हो जाने के बाद ही छानबीन करती है. और अधिकांश केसों का अंत सीबीआई की विफलता से संपन्न हो जाता है और शेष रह जाता है घोटाले का जिन्न. यह जिन्न देश भर में मंडराता रहता है और सत्ताधारी दल के सिर पर चढ़ कर बोलता है. कभी यह एमपी साहबों को प्रश्न के बदले घूस लेना सिखलाता है, कभी किसी दल के अध्यक्ष को डिफेंस सप्लाई के मामले में घूस लेने के लिए मजबूर कर देता है, कभी किसी नेता को जानवर का चारा तो कभी आदमी का अनाज चट करने लिए तैयार कर लेता है, कभी किसी को लाइबेरिया में खदान खरीदने के लिए उकसा देता है और वह अपने राज्य को लूट लेता है, कभी ताबूत खरीद में बड़े साहब से घोटाला करवा देता है......आदि-आदि....
यह ज़माना बहुत ही खराब है, कोई कमाने लगता है तो उसे देख कर कोई जलने लगता है. कोई किसी को खाकपति से अरबपति बनते देखना ही नहीं चाहता है. अब टाटा या बाबा रामदेव से कोई घूस मांगता है तो सालों बाद उसका प्रकटीकरण मुहूर्त देख कर करते हैं. पता नहीं, जब घूस की याचना होती है तब उनकी जुबान पर ताला क्यों लग जाता है. इसके पीछे है घोटालों का जिन्न जो, समय पर ईमानदार लोगों के मुह पर चुप्पी देवी को बैठा देता है. समय बुरे लोगों के पक्ष में है और जो अच्छे लोग हैं उनको बुरे लोग पोंगा पंडित कहने से चूकते नहीं हैं.
रांची में संघ से स्वयंसेवकों ने बहुत दिनों के बाद अपने तेल सेवित लाठियों का कांग्रेसियों पर संचालन किया.बेचारे कांग्रेसी निहत्थे ही सुरदर्शन जी का पुतला जलाने के लिए रांची के अलबर्ट एक्का चौक पर जा रहे थे और दूसरी ओर पुतले के संरक्षक संघियों ने, अपनी- अपनी लाठियों के साथ लैस, उनपर हमला कर दिया. सुदर्शन जी का पुतला जलने से बच गया. काश यही बहादुरी गुजरात के संघियों ने दिखलायी होती, तो कितने ही ईश्वर निर्मित आदमी की जानें बच जातीं. कितनी ही गर्ववती महिलाओं के पेट नहीं चीरे जाते.
लेकिन, चलिए संघियों को जीवित आदमी की परवाह हो न हो, उनको एक निर्जीव पुतले पर तो तरस आया! लगता है कि उनके पास अभी भी दिल शेष है, जिसने भले लोगों और निर्दोषों की जगह अपनों के प्रतिकृति-पुतलों पर तो प्यार बरसाया और उसके दुश्मनों पर खुले दिल से लाठियां तो भांजी. लगता है कि वे अब संघी मानसिकता से भटक रहे हैं. इनको जरूर नागपुर के बूढ़े बाबा की जोरदार फटकार लगनेवाली है.
कुछ संघियों के मालेगांव और अन्य जगहों पर हुए बम विस्फोटों में अंतर्लिप्ततता के कारण सीबीआई के द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद राहुल गाँधी ने संघ को आतंकी कह दिया, तो आरएसएस के लोगों का भी अपनी गोएबेल वाली नीति पर आरोप गढ़ने का पक्का हक़ बनता है. सो, उसी हक़ के आधार पर सुदर्शन जी ने कुछ निराधार कह दिया तो ये कांग्रेसी सुदर्शन जी का पुतला जलायेंगे ? उनका काम वे करेंगे? हिंसा उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. और इस अधिकार की रक्षा के लिए ही वे अपने दफ्तर में अपने कार्यकर्ताओं का कोई लेखा-जोखा नहीं रखते ताकि किसी कांड में पकड़े जाने पर संघ उनको अपने से असम्बद्ध बता सके.
संघ के द्वारा बदनामी से बचने का पुख्ता इन्तेजाम रखा जाता है. लेकिन, जबसे अफवाह फ़ैलाने के लिए जिन्ना के नाम का इस्तेमाल कर महात्मा गाँधी को नीचा दिखने की नीति के लिए, जसवंत सिंह का प्रयोग सफल हुआ, तबसे संघ इस तरह का रिस्क लेने लगा है. उसी का प्रतिफल है सुदर्शन जी की असुदर्शन वाणी में सोनिया जी की बेबुनियाद तकरीर.
बेबुनियाद तकरीर ही तो उनका हथियार है. कोई अपने आप को अपने हथियार से कैसे अलग कर सकता है? सवाल है पहचान की रक्षा की. और संघी अपनी पहचान कभी मिटते हुए नहीं देख सकते हैं. हाथ में तेल पिजायी लाठी, सिर पर काली टोपी, हाफ पैंट आदि और फिर वे शान से कहते हैं -हम गणवेशधारी हिन्दू हैं. और जो ऐसा वेश धारण नहीं करता, वेद देख लो, वह हिन्दू कहलाने लायक ही नहीं है. उनके वेद में हिन्दुओं का यही ड्रेस कोड लिखा है तो लिखा है, और यह ड्रेस कोड सभी हिन्दुओं को मानना होगा, अन्यथा उन्हें गैर हिन्दू या धर्मनिरपेक्ष भ्रष्ट हिन्दू की संज्ञा दे दी जायेगी. उनके लिए स्वर्ग के द्वार बन्द करवा दिए जायेंगे. वही हिन्दू स्वर्ग जाने का अधिकारी माना जा सकता है जो संघी ड्रेस कोड को फौलो करता है.
आम तौर से जब नेताओं, खास कर गोएबेल्स के चेलों को कुछ उलटी-सीधी बात को जनता में फैलाना होता है, तो वे किसी अपने खाश आदमी को बलि का बकरा बना कर, उससे अपनी बात मेमिया देते हैं. आरएसएस के पास बकरों की कमी नहीं हैं. जिन्ना का नाम लेकर गाँधी और नेहरू को नीचा दिखलाना था, तो आडवाणी जी को और जसवंत सिंह जी को बकरा बनाया और उनकी कलम से दो विष-युक्त किताबें लिखवा दीँ . एक ने तो अपनी किताबें पाकिस्तान में भी बेचीं . किताब बेचते हुए जसवंत जी को पाकिस्तान में 'प्यारे जसवंत भैया' वाली गज़ल भी बहुत अच्छी लगी. उन्होंने उस गज़ल को पकिस्तान में बार बार सुना और सुनते समय उनके मुखमंडल पर जो चमक दिखती थी, उससे यह नहीं लगता था कि वे कभी किसी धार्मिक समुदाय के विरुद्ध आग उगलने वाले आरएसएसवादी नेता रहे हों. वे तब विशुद्ध जिन्ना समर्थक लगे, जैसा कि उनके दल के वे नेता दीखते हैं जो आजादी के समय से लेकर आज भी सक्रिय हैं.
हाँ तो, बात चल रही थी कि आरएसएस के पास बकरों की कमी नहीं है. उसी बात को जारी रखते हुए बता दें कि उनका लैटेस्ट बकरा हैं, महामना सुदर्शन जी महाराज.
अब कांग्रेस, सरदार बल्लभ भाई पटेल की कमी को दूर करने की कोशिश करते हुए, उनके बताए रास्ते का अनुशरण किया और आरएसएस के कई लोगों पर आतंकी वारदात करने के इल्जाम में अंदर करवा दिया. अगर बल्लभ भाई पटेल कुछ वर्ष और जीवित रह पाते तो शायद देश के प्रधानमंत्री बन जाते और आरएसएस इतिहास बन जाता. लेकिन, देश के दुर्भाग्य से पटेल जी के जीवन का असामयिक अंत हो गया और आरएसएस को पनपने का मौका मिल गया, कभी जेपी के इस विश्वास के कारण कि क्रांति की अग्नि में तप कर एक दिन वे सोना बन कर निखरेंगे, तो कभी रामजन्म भूमि विवाद पर देशवासियों और श्रीराम को एक साथ धोखा दे कर. लेकिन इस संकट की घड़ी में बेचारा बना आरएसएस क्या करता ? सो सुदर्शन जी को कहा कि बोलो जो मैं तुम्हारे कान में कहता हूँ और वे बोल गए, सोनिया सीआईए की एजेंट हैं और राजीव गाँधी की हत्या के पीछे भी वे ही थीं. ऐसी अमर्यादित और काल्पनिक बातें ही तो गोएबेल्स के हथियार हुआ करते थे.
सो सुदर्शन जी ने मेमिया दिया और जैसा कि बकरों के मेमिया जाने के बाद होता है, आरएसएस ने अपने पूर्व के बकरों से सम्बंधित उसी पुराने वक्तव्य को दुहरा दिया, सिर्फ नाम बदलते हुए- यह सुदर्शन जी का व्यक्तिगत बयान है, आरएसएस का नहीं. ऐसा ही बयान तब भी दिया गया था जब बीजेपी के एक राष्ट्रीय अध्यक्ष को पूरी दुनिया ने घूस लेते हुए देखा था, वह भी प्रतिरक्षा के सौदा हेतु. लेकिन इसी फार्मूला पर कांग्रेस कहे कि आदर्श घोटाला अशोक चाहवान का व्यक्तिगत मामला है, या करुणा निधि जी कहें कि राजा के मंत्रालय का कथित घोटाला राजा का व्यक्तिगत मामला है, तो इसे आरएसएस या बीजेपी के नेता कतई नहीं मानेंगे मानेंगे. वे तो एक सुर में पूरी 'कांग्रेस चोर है, चोर है' का नारा हुआं-हुआं करते रहेंगे हैं.
तीन हजार वर्ग फीट के फ्लैट पर कथित रूप से अशोक चाहवान के सगों के कब्जे के मामले पर अशोक चौहान को कांग्रेस मुख्यमंत्री के पद से हटा देती है, लेकिन जिस नरेंद्र मोदी के शासन काल में हजार से अधिक लोगों को मौत के घात उतार दिया गया, गर्ववती महिलाओं के पेट चीर दिए गए, कितनो को जिन्दा जला दिया गया और उसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी के चाहने पर भी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हटाया नहीं गया क्योंकि वह तो बीजीपी के असली चेहरा बन चुके थे, कहीं कोई अपने असली चेहरे को हटा सकता है?
लेकिन, सुदर्शन जी ही शायद बंद कमरे में रियाज कर रहे थे- अजी मैंने ऐसा तो नहीं कहा था.... ये प्रेस वाले कुछ का कुछ लिखते-दिखाते रहते हैं, कभी वरुण को हाथ काटने की धमकी देते दिखा-सुना देते हैं, तो कभी बीजेपी के अनेक सांसदों को प्रश्न के बदले पैसे लेते दिखा देते हैं.....इन प्रेस वालों पर कोई कैसे विश्वास कर सकता है....सब के सब कांग्रेसी सीबीआई हैं....एक हमारे ज़माने में सीबीआई थी, वह हमारे गढ़े बोफोर्स कांड की जाँच पर घोटाले से चौगुनी रकम खर्च कर भी किसी को दोषी नहीं ठहरा पाई और इधर हमारे लोगों ने जैसे ही एक दो धमाके कर दिए तो सबूत के साथ हाजिर हो गई कांग्रेसी सीबीआई...... उधर कान में एक आवाज आई- सो फाइनली सुदर्शन जी बोलेंगे कि मेरे वक्तव्य के तोड़-मरोड़ के पीछे कांग्रेस का पंजा है, सीबीआई का हाथ है, प्रेस का हाथ है!