राजनीति के क्षेत्र में इन दिनों बड़ा उलटफेर हो रहा है, भ्रष्टाचार पर बवाल मच रहा है. बेचारे अशोक चौहान तीन हजार वर्ग फीट के फ्लैट पर फ़्लैट हो गए. बेचारे येदुरप्पा अपने ही दल के अनेक विधायकों के विरोध के बाद अपनी कुर्सी बचाने के लिए अब अपने ही दल के शीर्ष नेताओं को धमकी दे रहे हैं कि अगर उनको गद्दी से उतारा गया तो वे भाजपा को समुद्र में डुबा देंगे. वे भी जमीन के मामले में फंस गए हैं. अब यह बात तो जग जाहिर है कि जमीन के कारण दुनिया में हर युग में बवाल मचता ही रहा है. पांच गाँव देने बे बदले कौरवों ने महाभारत के युद्ध को आमंत्रित किया और उनका सर्वनाश हो गया.
लेकिन, यह तो मानव की नीयति है कि वह जमीन के पीछे भागते हुए हमेशा जमीन से कट जाता रहा है. जमीन परिवार को बांटता-काटता है. भाई-भाई के बीच खून खराबे का कारण बनता है. और यही कारण है कि जब बड़े बड़े मॉल बनाने का धंधा मुंबई में शुरू हुआ तो जो महान हस्तियां इस धंधे से जुड़ीं उनको भाई कह कर संबोधित किया गया. जमीन का धंधा यानी बिग बौस का धंधा. बिग बौस यानी जिनको लोग प्यार से भाई कह कर सिर झुका लेते हैं और अपनी जमीन उनके नाम औने-पौने दाम पर कर देते हैं. लेकिन अब उन महान भाइयों का जमाना लद गया है, जमीन अब राजनीतिक स्तर पर ही सलटा ली जाती है.
कारण बहुत स्पष्ट है कि हमारे बहुत से नेता या तो डैरेक्ट भाईगिरी स्कूल से आते हैं या फिर राजनीती में आकर भाईगिरी का होम ट्यूशन कर लेते हैं. ऐसे नेताओं के भाषणों में जोरदार तेवर होता है, ऊंचा स्वर होता है, मसल पावर भी झलता है, मनी पावर भी उबलता है और वे मनमोहन जी की तरह हमेशा काम या आंकड़ों का पाठ संयत स्वर में या एक ही धीमी पिच में नहीं करते हैं. वे जब बोलते हैं तो सैकड़ों मील दूर बैठे लोग बिना किसी माध्यम के सुन लेते हैं. वे जब बोलते हैं तो विरोधी तो विरोधी, आम लोगों की भी नींद उड़ जाती है. वे अपने क्षेत्र में वैसे प्रभावी और भौकने वाले होते हैं, जिस प्रकार स्वान स्वामी अपने क्षेत्र में अपनी पूँछ ऊंची कर भौंक लगाते हैं. ऐसे महान नेता गण अपने क्षेत्र की रक्षा भी उसी प्रकार करते हैं, जिस प्रकार अपनी गली के शासक स्वान स्वामी जी करते हैं. ऐसे सभी महान नेताओं को शत-शत कोटि प्रणाम, करने की जरूरत है. ध्यान रहे कि तुलसी दास जी ने भी रामचरित मानस लेखन शुरू करते हुए हर प्रकार के लोगों की स्तुति की, जिनमें खल, कामी, चोर, बेईमान सभी शामिल थे. तब भी उनको रामचरित मानस के लोकार्पण के बाद बहुत उत्पातियों का सामना करना पड़ा था. हम तो आम लोग हैं, बस अपनी सलामती की दुआ ही कर सकते हैं, जिसका निश्चित होना असं नहीं है.

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