रविवार, 26 दिसंबर 2010

एक और साल बीत गया, मस्ती में, फकीरी में, विवादों में!

        


 मैं पहली तारिख को बहुत खुश  रहता हूँ. इस दिन मुझको पंद्रह दिन के लिए वेतन मिलता है.शेष के पंद्रह दिन तो मैं अपने दिलेर दिल के साथ रहता हूँ,फकीरी में मस्त-"बदन से कबा सिर से चादर ले गई/जिन्दगी हम फकीरों से क्या ले गई."लेकिन, मैं एक तारीख़ तो पीछे मुड़ कर देखता हूँ कि देश दुनिया में क्या हो रहा है, अपने आप से बेफिक्र.
         देखा, पाया और  महसूस किया कि   मेरे जैसे पुराने कार सेवक को यह पता ही नहीं चला कि कब राडिया देवी जी ने भाजपा नीत   एनडीए शासन में मंदिर बनवाने के लिए जमीन हासिल कर ली,और दिब्य मंदिर का निर्माण कर लिया और २ स्पेक्ट्रम  डील में भयानक सफलता भी हासिल कर ली. खैर, इस मंदिर के निर्माण में तो मैं कार सेवा करने का पुण्य  नहीं उठा पाया लेकिन, जब मैं   अपनी गरीबी दूर करने के लिए उस मंदिर में  प्रार्थना  करने का मन बना कर पहुंचा, तो गार्ड ने यह धमकी दे कर भगा दिया कि यहाँ सिर्फ २जी वाले ही प्रार्थना या पूजा कर सकते हैं. अब मैं दीन-हीन क्या करता, जब मेरे सामने ही बहुत से पत्रकारों को भी मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया.
         मैं बहुत परेशान हूँ . मेरी बेटर  हाफ ने मुझको अल्टीमेटम दे दिया है कि या तो पड़ोस  के श्याम जी दलाल की तरह या फिर घनश्याम  जी अधिकारी की तरह कोई बड़ा स्कैंडल  करो या फिर चाय-काफी मांगना या सन्डे के दिन अद्धा के लिए रुपए मांगना बन्द कर दो. मैं गया था घनश्याम जी के द्वारे.लेकिन वहां तो काल की तरह सीबीआई के लोग उनका मकान घेर कर पता नहीं क्या कुछ कर रहे थे. बाद में पता चला कि घनश्याम जी को सीबीआई. वाले बड़े सम्मान के साथ कार में बैठा  कर कहीं ले गए. यह जानने के बाद भी बेटर हाफ ने मुझको सुनाया,"देखा कि नहीं देखा,घनश्याम जी की शानदार फोटो  आज के हर अख़बार में छपी है.उनकी बेटर हाफ कितनी खुश हैं.कह रहीं थीं कि अब साहेब को जेल में कितने दिन भी आराम करना पड़े, परिवार को तो उन्होंने सुपर ग्रेड  का बना ही दिया. हसबैंड हो तो ऐसा."
        यह साल अच्छा  बीता. अखबार की कीमत वसूल हो गई. स्कैंडलों ने मुझे दफ्तर में टाइम पास के लिए अच्छे-अच्छे टापिक दिए. लेकिन दुःख इस बात का है कि हमारे  देश के प्रधानमंत्री जी ने  स्कैंडल पर हुई  डिस्कशन में भाग ही नहीं लिया. सो डिस्कशन थोड़ी फीकी रह गई.आंकड़ों से सज नहीं पाई.फिर भी  स्कैंडलों पर तो डिस्कशन नुक्कड़ वाली चाय की दूकान से ले कर उच्चतम   स्तर तक चलती रही. डिस्कशन का स्तर,लोअर स्तर पर  हाई  रहा और हाई स्तर पर जरूर लो ग्रेड  का रहा.फ़िर भी इस कड़ाके की ठण्ड में काफी गर्मी रही. दिल को बहुत ऊर्जा मिली, बहुत सुकून मिला.
         एक और साल बीत गया, मस्ती में, फकीरी में, विवादों में, सपनों में टाईम पास करते हुए. मैं समय का शुक्रगुजार हूँ जो कभी रुकता नहीं, फिर भी कभी-कभी समय ठहर जाता है, जब रसोई घर खाली होकर मेरी जेब को ललकारता  है. जब प्याज को देखने मात्र के लिए बाज़ार जाता हूँ और रो पड़ता हूँ.जब दाल की बोरी पर नज़र टिक जाती है और हटाने पर भी हटती नहीं है.और जब मुकेश अम्बानी जी के निवास  महल को सिर उठा कर देखता हूँ,अपनी गरीबी के कद को जान लेता हूँ. समय तब भी रुका-सा लगता है जब, बिजली का बिल अँधेरे में पढ़ कर एक और एक नया  कर्ज लेने का ख्याल आ जाता है. 
          पता नहीं, जब भी कोई स्कैंडल भाजपा  जी उछलवाते  हैं, वे खुद  उसमें एक पार्टी बनते नजर आते हैं. बोफोर्स उछला तो हिंदुजा फंसता नजर आया. अब इधर राडिया देवी जी ने राजा और भाजपा के अनेक नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस  की नींद हराम कर दी है.राडिया देवी को शत शत नमन जिन्होंने विश्व  के सबसे बड़े लोकतंत्र को अकेले ही लोक कर अनूठा करिश्मा कर दिया.उनका नाम फोर्ब्स पत्रिका की पावरफुल लोगों की सूची में सबसे ऊपर अंकित किया जाना चाहिए.         

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

इस वर्ष मैं राडिया मंदिर के निर्माण में कार सेवा करूंगा !

                     
       मैं जब भी महीना का अंतिम दिन पार करता हूँ सभी धर्मों  के ईश्वर को याद करता हूँ और कहता हूँ कि हे भगवान् आपने एक और महीना पार कर दिया. और जब कभी दिसम्बर का महीना पार कर जनवरी में पहुँचाना  होता है, तो महीना और साल दोनों  पार करना होता है. यह और भी कठिन होता है. बीता हुआ पूरा साल याद आने लगता है. भूत काल में जाते हुए मैं तो कांप-कांप जाता हूँ. लगता है कि एक साथ अनेक भूत मेरे चारों ओर खड़े  हो गए हैं और मेरी बची  हुई लंगोटी  ले कर भाग जाना चाहते हैं. फिर भी मैं सबको मुस्कुराता हुआ  हैप्पी न्यू ईयर, कहता हूँ ताकि वे भी मुझे हैप्पी न्यू ईयर कह सकें.   
        नेता सेवक लाल  मुझसे सेवा मांगता नजर आता है. अधिकारी मुझे अधिकार   दिखाता नजर आता है. जज साहब मेरे खिलाफ फैसला देते नजर आते हैं-इस कंगाल ने सौ रुपए  की लूट की है. मेरा ही वकील मेरे खिलाफ दलील देता नजर आता है. नरेगा की रसीद पर मेरा अंगूठा ब्लौकाधिकारी जबरन ले जाता है और मैं मजदूर के रूप में ट्रेन से  दूसर राज्य में रोजी-रोटी कि तलाश में जाता हुआ नजर आता हूँ. मुझे ट्रेन में जब भी झपकी  आती है, मुझे बाल ठाकरे और राज ठाकरे की लाठियां और मेरी घायल पीठ नजर आती है. 
         क्या करूँ,  मैं तो भूत काल में जाते हुए डरता हूँ. जेल में आराम फरमा रहे हमारे कुछ महान नेता लोगों से मुझे ईर्ष्या होने लगती है.काश मैं भी बस एक बार नेता बनता और लूट मचाता और जेल में आराम फरमाता. वहीँ चैन से नववर्ष मनाता. लेकिन अपनी किस्मत में तो रोज खटो  और रोज खाओ वाली नौबत है.  
       मेरी पत्नी  ने कई दिनों से शोर मचा रखा है कि एक मोबाईल कर्ज ले कर भी खरीद लाओ और  राडिया देवी से गपियाओ, दुःख के दिन बीत जायेंगे. बारहवाँ कर्ज लिया और मोबाईल ले आया, लेकिन क्या बताऊँ, जब भी राडिया  देवी  को फोन लगता हूँ जवाब आता है-नीरा मैया  का मोबाईल ऑफ है, उनसे अभी आपका संपर्क  नहीं हो सकता. उस शक्तिरूपेण राडिया  देवी  ने फोन क्यों बन्द कर रखा है, जो पक्ष और विपक्ष, सबको खरीद कर विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को बौना कर सकती हैं, मेरी समझ में नहीं आ रहा है. हमारे यहाँ तो जेल के साधारण कैदी भी जेल में मोबाईल रखते हैं और सुरक्षित   जेल से रंगदारी  उगाही  कर लेते हैं. उनका मोबाईल कभी ऑफ होता नहीं है, फिर राडिया देवी  का मोबाईल क्यों ऑफ हो गया? इसके पीछे जरूर किसी जाँच एजेंसी  की साजिश है, जो हम जैसे ग़रीबों को उनसे दूर रखना चाहती है, ताकि कोई गरीब कभी अमीर  न बन पाए. बहुत नाइंसाफी है. 
        सो नव वर्ष पर मैंने राडिया देवी को  बड़ी मेहनत से चिट्ठी लिखी   है. साथ में भूतहा  बाबा से दस रुपए का ताबीज भी खरीद कर डाल दिया है- भूतहा  बाबा बचाएँ राडिया देवी को सीबीआई की काली नजर से. मैंने उनको बहुत दिल छूने वाली चिट्ठी  लिखी है- हे राडिया देवी! सादर प्रणाम. मेरे गाँव में  हम मजदूरों की दलाली कर हमें दूसर राज्यों में मजदूरी दिलाने वाला फेमस  दलाल पिंटू ,आपका मंदिर बनवा रहा है....मैंने दलाल पिंटू से खुद जा कर कहा है कि मैं उस राडिया मंदिर के निर्माण में कार सेवा करूंगा. मैं जानता हूँ कि आप अपने परम भक्त दलाल  पिंटू को दर्शन देंगी  और तब हे देवी मुझे बस अपनी एक झलक ही दिखला देना.  आपको लड्डू चढ़ाऊंगा . कवि हूँ सो आपके नाम पर राडिया चालीसा लिख डालूँगा,  ताकि सारे ग़रीबों का आपकी कृपा से उद्धार हो सके. जय, जय राडिया देवी! 
        

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

टेपवा झूठ बोले कौवा काटे...

             
          न्यूज जब प्राइवेट टीवी  चैनेल पर आना शुरू हुआ  तो बड़े घराने के लाडले-लाडलियां अचानक पत्रकार हो गए और लगे चैनलों  पर भौकियाने और पत्रकारिता  के सारे उसूलों को तार-तार कर दिया. अब तो समाचार ज्यादातर स्क्रोल में तेजी से भागते नजर आते हैं,  जबकि मेन स्क्रीन पर दूसर चैनलों से उधार लिया गया बासी माल दौड़ता रहता है, विशेष कमेन्ट के साथ. फ़िल्मी गोससिपबाजी भी खूब चलती है. ये जिससे चाहते हैं, उसीसे किसी हीरो या हिरोइन का टांका भिड़ा देते हैं. ये अच्छे जोड़ी मेकर हैं. ये अच्छे जोड़ी ब्रेकर भी हैं.
         बेवजह हर न्यूज को ब्रेक करने का दावा करने वाले न्यूज चैनलों पर नीरा राडिया के टेप लीक ने ब्रेक लगा दिया है. अब वे न्यूज ब्रेक करते हैं कि देखिए बरखा का खुलाशा, पहली बार आपके इस चहेते भंडाफोड़  चैनेल पर.....सारा का सारा टेप जाली है...सारा का सारा टेप बकवास है...ज़रा गौर से देखिए, बरखा की आँखों में, बरखा की बूँदें झलक रहीं हैं. इन घड़ियाली बूंदों में हैं सच्चाई, ईमानदारी, पत्रकारिता के उसूल.....बरखा पवित्र है...बरखा बरखा है....टेपवा  झूठ बोले कौवा काटे...काली नीरा से ना डरियो...मैं कोर्ट चली जाऊँगी तुम देखते रहियो...टेपवा  झूठ बोले कौवा काटे...
           फिर एक चैनेल ने प्रोग्राम सेट किया ताकि तीस तीसमारखाओं का दुग्धाभिषेक  किया जा सके..... सो लाइव के पहले नाटकबाजों  की तरह रीहर्सल कर लिया गया. फिर टेक वन, टेक टू....शुरू हो गया राग दुग्धाभिषेक.....बेचारी बरखा  बहुत खूबसूरत हैं सो सभी उनके पीछे ही पड़ गए हैं, जबकि नीरा जी ने तो तीस को सेट किया था....देखिए, बरखा का मासूम चेहरा... ..जानिए इनकी शराफत...सुनिए इनका सफाईनामा....देखिए इनका पत्रकारिता में सफ़रनामा....उन्होंने अपनी कलम से कितने तूफ़ान खड़े किए....और एक छोटा सा नामुराद टेप उनके पूरे कृतित्व पर कैसे भारी पड़ सकता है...बरखा नारी हैं और किसी अन्य नारी से उनका बातचीत करने का अधिकार कोई नहीं छीन सकता है- जो बरखा से टकराएगा वह चूर-चूर हो जाएगा....ऊंचे स्वर में सब उनकी जय बोल, जो कलम जला-जला लिखते हैं, चटपटा-मसालेदार...... ऊंचे स्वर में सब उनकी जय बोल.....!!! 
         बरखा जी बरखा जी, जरा बताएंगी  कि नीरा जी ने आपसे  क्या बात की? यह प्रश्न करते ही महोदय प्रश्नकर्ता जी ने स्वयं जवाब भी दे दिया-दुनिया जानती है कि आपने क्या बात की, लेकिन बात में ऎसी कोई बात नहीं थी कि यह साबित हो की आपने कोई खोता-पेटी लेने की बात की हो. आपने घरेलु बात की. चाय-कॉफ़ी पर बात की. मौसम की बात की. तीज-त्योहार की बात की...मुकेश अम्बानी और रतन टाटा जी के स्वास्थ्य की बात की...उनके इम्पायर की हलचलों पर बात की. यह सब बातचीत तो चलती ही रहती है....अगर आपने न्यूज फिक्सिंग की बात की होती या फिर संसद के फिक्सिंग की बात की होती  तो कोई अपनी ऊँगली उठा सकता था...आपको, बरखा जी, किसी बात की चिंता करने की क्या जरूरत है....         
       
                        

सोमवार, 29 नवंबर 2010

कांच के घर से पत्थरबाजी

        
         
     रतन टाटा हों या फिर भाजपा नेता अरुण शौरी, दोनों को मौका मिल गया स्पेक्ट्रम घोटाले पर बोलने का. रतन टाटा भ्रष्टाचार पर बड़ी बड़ी बातें करने लगे थे. लेकिन उसी समय राडिया से उनकी हुई बातों के लीक हो जाने के कारण उनकी और भाजपा की हालत गड़बड़ा गई है .अब भाजपा को शायद जेपीसी जाँच की मांग करते हुए अपने ऊपर भी खतरा नजर आता होगा.



             उधर, महोदय अरुण शौरी ने राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और नायडू पर हमला बोल दिया है. लेकिन, इस हमले के लिए शौरी को बहुत देर इन्तजार करना पड़ा है. चलिए, स्पेक्ट्रम घोटाले के कारण दूध का छीका तो टूटा. बिल्ली का भाग जगा. जब शौरी जी संसद में मुकेश अम्बानी के खिलाफ आग उगलने की पूरी तयारी में थे, तभी राजनाथ जी और अडवाणी जी के इशारे पर उनकी जगह नायडू को खड़ा कर दिया गया. आखिर पूंजीपतियों की पार्टी है भाजपा और उसके नेता लोग अगर किसी पूंजीपति के खिलाफ शोध वक्तव्य देने लगेंगे तो भाजपा के चरित्र पर दाग नहीं लगेगा क्या? अवश्य लगेगा. यह बात अरुण शौरी को समझना चाहिए. लेकिन, क्या किया जाए अरुण शौरी को लगता है की वे पत्रकार हैं. जब कि पत्रकारिता के आदर्शों का उन्होंने शायद ही कभी पालन किया हो. लगता है, अडवाणी जी जब रथ ले कर पूरे देश में साम्प्रदाइकता का ताण्डव कर रहे थे, तब शौरी जी की कलम सूख गई थी. शौरी जी को कभी आरएसएस से प्यार हो जाता है तो कभी उसकी राजनीतिक शाखा पर गुस्सा आ जाता है. बात असल में यह है कि इनदिनों भाजपा में उनकी पूछ घट गई है. गडकरी जी तो उनके नाम से बिदक जाते हैं.

             पता नहीं, रतन टाटाजी को क्या जरूरत पड़ गई थी क़ि कांच के महल में बैठ कर भ्रष्टाचार पर प्रवचन देने लगे. कांच को आदत नहीं होती है, भ्रष्टाचार पर भाषण सुनने की. सो, उसका दरकना लाजिमी था और टेप के रूप में दरका गया. और टूटा हुआ कांच और टूटा हुआ हीरा जुड़ता नहीं है. अब टेप के प्रसारण पर रोक लगे या टेप लीक करने वाले को सजा मिले, उससे टाटाजी के माथे पर से बोली गयी बातों का बोझ तो उतरेगा नहीं. यह लीक भोपाल गैस लीक जैसा है. लेकिन, इस लीक से अडवाणी जी परेशान हैं. उनको बड़ी शर्म आ रही है. गजब हैं जनाब अडवाणी जी, उनको जिन्ना की जय करने में या गुजरात में नरसंहार होने पर शर्म नहीं लगी थी, लेकिन राजनीतिक फिक्सिंग के मामले में बड़ी शर्म लग रही है. दिल के किस कोने में उन्होंने अपनी प्यारी शर्म छिपा कर रखी थी? इस पर भी जेपीसी जाँच होनी चाहिए. अरे अडवाणी जी आपको जिन बातों पर शर्म करनी चाहिए उसकी सूची तो बड़ी लम्बी है, विश्वास न होतो अरुण शौरी ही आपको गिनवा देंगे.

























सोमवार, 22 नवंबर 2010

राजनीती में आकर भाईगिरी का होम ट्यूशन

        राजनीति के क्षेत्र में इन दिनों बड़ा उलटफेर हो रहा है, भ्रष्टाचार पर बवाल मच रहा है. बेचारे अशोक चौहान तीन हजार वर्ग   फीट के फ्लैट पर फ़्लैट हो गए. बेचारे येदुरप्पा अपने ही दल के अनेक विधायकों के विरोध के बाद  अपनी कुर्सी बचाने के लिए अब अपने ही दल के शीर्ष नेताओं को धमकी दे रहे हैं कि अगर उनको गद्दी से उतारा गया तो वे भाजपा को समुद्र में डुबा देंगे. वे भी जमीन के मामले में फंस गए हैं. अब यह बात तो जग जाहिर है कि जमीन के कारण दुनिया में हर युग में बवाल मचता ही रहा है. पांच गाँव देने बे बदले कौरवों ने महाभारत के युद्ध को आमंत्रित किया और उनका सर्वनाश हो गया. 
      लेकिन, यह  तो मानव की नीयति  है कि वह जमीन के पीछे भागते  हुए हमेशा जमीन से कट जाता रहा है. जमीन परिवार को बांटता-काटता है. भाई-भाई के बीच खून खराबे का कारण बनता है. और यही कारण है कि जब बड़े बड़े मॉल बनाने का धंधा मुंबई में शुरू हुआ तो जो महान हस्तियां  इस धंधे से जुड़ीं उनको भाई कह कर संबोधित किया गया. जमीन का धंधा यानी बिग बौस का धंधा. बिग बौस यानी  जिनको लोग प्यार से भाई कह कर सिर झुका लेते हैं और अपनी जमीन उनके  नाम औने-पौने दाम पर कर देते हैं. लेकिन अब उन महान भाइयों का जमाना लद गया है, जमीन अब राजनीतिक स्तर पर ही सलटा ली जाती है.       
           कारण बहुत स्पष्ट है कि हमारे बहुत से नेता या तो डैरेक्ट  भाईगिरी स्कूल से आते हैं या फिर राजनीती में आकर भाईगिरी का होम ट्यूशन कर लेते हैं. ऐसे नेताओं के भाषणों में जोरदार तेवर होता है, ऊंचा स्वर होता है, मसल पावर भी झलता है, मनी पावर भी उबलता है और वे मनमोहन जी की तरह हमेशा काम या आंकड़ों का पाठ संयत स्वर में या एक ही धीमी पिच में नहीं करते हैं. वे जब बोलते हैं तो सैकड़ों मील दूर बैठे लोग बिना किसी माध्यम के सुन लेते हैं. वे जब बोलते हैं तो विरोधी तो विरोधी, आम लोगों की भी नींद उड़ जाती है. वे अपने क्षेत्र में वैसे प्रभावी और भौकने वाले होते हैं, जिस प्रकार स्वान स्वामी अपने क्षेत्र में अपनी पूँछ  ऊंची कर भौंक  लगाते हैं. ऐसे महान नेता गण अपने क्षेत्र की रक्षा भी उसी प्रकार करते हैं, जिस प्रकार अपनी   गली के शासक स्वान स्वामी जी करते हैं. ऐसे सभी महान नेताओं को शत-शत कोटि प्रणाम, करने की जरूरत है. ध्यान  रहे कि तुलसी दास जी ने भी रामचरित मानस लेखन शुरू करते हुए हर प्रकार के लोगों की स्तुति की, जिनमें खल, कामी, चोर, बेईमान सभी शामिल थे. तब भी उनको रामचरित मानस के लोकार्पण के बाद बहुत उत्पातियों का सामना करना पड़ा था. हम तो आम लोग हैं, बस अपनी सलामती की दुआ ही कर सकते हैं, जिसका निश्चित होना असं नहीं है.
       

शनिवार, 20 नवंबर 2010

मुझको बिग बौस से निमंत्रण मिला है:गालियाँ बकने की कोशिश कर रहा हूँ!

          मेरा बैड लक मेरे फेवर  में हो रहा है- मुझको बिग बौस से निमंत्रण मिल गया है.और मैं अब एक गाली-गुरु से गालियाँ सीख रहा हूँ. उनके उपयोग की मुकम्मल जानकारी ले रहा हूँ. जैसे कोई गायक रागों का अभ्यास सुबह- शाम करता है, मैं भी लगातार गालियाँ बकने का और उसमें अपने स्टाइल भरने की भी कोशिश  कर रहा हूँ. मां, बाप, भाई, बहन तथा अन्य नातों से सम्बंधित गालियाँ तो मैंने कंठस्थ कर लिए हैं.
        लेकिन, क्या बताएं यह समाज किसी की तरक्की देखना ही नहीं चाहता है. गालियों के स-स्वर रियाज से मेरे पडोसी बड़े बौखलाए हैं. कल तो सतीश  जी ने तो हद ही कर दी. उन्होंने सपत्नी मेरे फ्लैट में आ कर मुझे चेतावनी देते हुए कहा कि उसके बेटे ने मेरे रियाज का लाभ उठाते हुए तेरह गालियां सीख ली हैं, जिनका वह  अपने साथियों पर प्रयोग करते हुए पार्क में  पिट चुका है. इतना ही नहीं वे मेरे फ्लैट से जाते-जाते मुझे कुछ  स्पेशल बिहारी गालियां दे गए. लेकिन, मैंने उन गालियों को उनका फ्री उपहार मान कर स्वीकार कर लिया है.
        पड़ोसियों की बेवजह  नुक्ताचीनी के बाद,  मैंने  गालियों की प्रैक्टिस के लिए एक खंडहर पड़े मकान में जगह दूंढ ली है. मैंने शपथ ले ली है कि बिग बौस में मैं तहलका मचा  कर ही दम लूँगा. लेकिन, मेरी राह में सिर्फ पडोसी ही नहीं, बल्कि घर के लोग भी बाधक बन रहे हैं. कल मेरे बड़े भाई ने मेरे फ्लैट में आ कर मेरी धर्मपत्नी से पूछा,' क्या बब्लुआ आज कल गालियां बकने की प्रैक्टिस कर रहा है ?  क्या उसका दिमाग गड़बड़ा गया है ? क्या किसी दिमाग के डाक्टर से उसकी जाँच करवाई ? मैं बाथरूम में छिप कर दोनों की बातें गौर से सुन रहा था- धर्मपत्नी जी ने अधर्म के रास्ते पर चलते हुए बड़े भाई जी को बताया, " मैं पहले उनको किसी शैकोलोजिस्ट से दिखलाने की बात सोच रहीं हूँ , फिर बाद में कांके के मानसिक आरोग्यशाला में उनको भरती करवाने पर विचार करूंगी." 
           अब देखिये जनाब, मेरी धर्मपत्नी के कितने खतरनाक विचार हैं. अरे, हम तो बिग बौस में चमकने-दमकने जा रहे हैं, हरे-हरे नोट की माला पहनने जा रहे हैं, और यहाँ मुझको पागल समझा जा रहा है. बड़े भाई जी के जाने के बाद , मैंने अपनी धर्म पत्नी जी को बताया कि बिग बौस में सफलता और मालामाल होने के लिए गालियों का कितना विशाल महत्त्व  है.          
          मेरी धर्मपत्नी जी हत्थे से उखड़ गयीं और बोलीं,' मैं बिग बौस देखती हूँ. बिग बौस में जाने के लिए गालियों के रियाज की  क्या आवश्यकता है ?
          मैंने उनको बताया,' देखो, जब बिग बौस के घर में कोई गाली बकता है तो उसके गाली-युक्त संवाद की  रेकार्डिंग कर ली जाती है, लेकिन, बाद में गाली की जगह "पीं" की आवाज भर दी जाती है. अगर कोई प्रतियोगी गाली ही न बके तो उसके संवाद में "पीं" की आवाज नहीं होगी. लेकिन, क्या तुमने बिग बौस के किसी प्रतिभागी का संवाद बिना "पीं" की आवाज के सुना है ? जानती हो बिग बौस देखने वाले तो इन दिनों एक प्रतियोगिता करते हैं-पहचानो  कौन सी गाली "पीं" की आवाज के नीचे दबी है. यह गेम बहुत पोपुलर हो गया है."
         पत्नी जी ने और तेज आवाज में अपनी बात पेश की," देखो जी, आप कल सुबह तैयार हो जाईगा. आपको मैं शैकोलोजिस्ट के पास ले जाउंगी."
        मुझे भी तेवर आ गया, " यह क्या बकवास है ? अरे तुम तो जानती हो कि मैं कभी गालियां नहीं निकाला करता हूँ. इन दिनों गालियों की प्रैक्टिस  तो मैं बिग बौस में तहलका मचाने और माला-माल होने के लिए कर रहा हूँ. मेरा प्रोगाम है कि मैं बिग बौस प्रतियोगिता जीत कर तुम्हारे लिए सुन्दर और कीमती साड़ियों का जुगाड़ करूँगा."
            मेरी पत्नी मेरे पास से उठ कर चली गई. और मैं सोचने लगा कि बिग बौस में जीत दर्ज करने का मेरा  सपना क्या सपना ही रह जायेगा? क्या मेरे सपनों को वे लोग तोड़ देंगे, जिनके लिए मैंने पूरी जिन्दगी खट कर काम किया, कभी एक पेग शराब नहीं पी, कभी किसी को गाली नहीं दी और अपने दफ्तर के बौस  की गालियां अनसुनी करता रहा ताकि मेरी नौकरी पर खतरा न आ  जाए. और आज जब माला-माल होने के लिए मैं जीवन में पहली बार गालियों का रियाज कर रहा हूँ तो मेरे परिवार के लोग ही मुझको पागल समझ रहे हैं. 
         लेकिन, मेरे दोस्तो, आप जानते ही हैं कि बिना गालियों के बिग बौस का तो वजूद ही समाप्त हो जाएगा. अरे, गालियां हमारी संस्कृति  के अंग हैं. शादी-ब्याह के अवसर पर हमारी घर की महिलाएं कितनी गालियां गीतों के माध्यम से सुनाती हैं. बाराती के सभी श्रेष्ठजनों को चुन-चुन कर गरमा-गरम गालियों से स्वागत करतीं हैं और बाराती के श्रेष्ट जन  उन गालियों का लुफ्त उठाते हैं. बिग बौस कार्यक्रम भी हमारी संस्कृति के अनुसार गाली आधारित कार्यक्रम है. पर पता नहीं, सरकार भी  भारतीय संस्कृति और इंटरनेश्नल गालियों से ओत-प्रोत बिग बौस कार्यक्रम को देर रात के समय शिफ्ट करना चाहती है. अरे, गालियां दिन में दो या फिर देर रात, उसके टेस्ट में कोई फर्क नहीं पड़ता है. गाली देना और सुनाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.   अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार से हमें कोई वंचित नहीं कर सकता है.         









































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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

राजा स्वयं को थ्री डी स्पेक्ट्रम में देख रहे होंगे!

         राजा की राजगद्दी छिन गई. अब कोर्ट का चक्कर लगायेंगे. लेकिन एक बात है राजा जी लम्बे समय तक चर्चे में रहेंगे. और राजनीति की मान्यता है की गुमनामी से बदनामी बेहतर होती है. सो राजा तो बल्ले-बल्ले होंगें ही. स्वयं को  थ्री डी स्पेक्ट्रम में देख रहे होंगे. अब टू जी स्पेक्ट्रम पीछे रह जायेगा और राजा का थ्री डी स्पेक्ट्रम हर दिन समाचार में छाया रहेगा. कुल मिला कर वे एक उम्दा इतिहास बनायेंगे. उनके बाल-बच्चे अपने बच्चों को राजा जी के कारनामों के किस्से सुनायेंगे और कहेंगे कि यह वही व्यक्ति थे जो मनमोहन जी की पैनी नजरों के नीचे कितना ऊँचा-नीचा काम कर के दिखा दिया.
       यह राजा जी का ही कमाल है कि वे सारे घोटालों को मात देने कि स्थिति में आ गए हैं. पता नहीं उनके घोटाले की पूरी राशि का व्योरा कब तक मेलेगा या फिर सारा व्योरा किसी फ़ाइल में कैद हो कर रह जाएगा? आशा है कि हमारे जीवन काल में किसी दिन वह घड़ी आएगी, जब हमें राशि का डीटेल मिलेगा  और गिनीज बुक ऑफ़ रिकार्ड में वह दर्ज होगा. हे ईश्वर! उसके पहले कोई और बड़ा घोटाला न कर दे, मैं इसकी प्रार्थना करता रहूँगा . यह घोटाला मील का पत्थर बनेगा. लोग इसकी कहानियां  सदियों-सदियों तक सुनाएंगे.
            लेकिन, राजा जी से कुछ प्रश्न करने की जुर्रत कर रहा हूँ-यह सब अकेले किया या किसी और का भी सहयोग लिया ? क्या कभी आप लालू जी से भी मिले और उनको अपना गुरु तो नहीं बनाया ? क्या आगे चल कर घोटाला-कला को और विकसित करने के लिए कोई संसथान खोलने का तो इरादा नहीं रखते हैं ?
           इधर सोनिया जी ने लेन-देन और लालच-वालच पर मनमोहन जी को सामने  बैठा कर पुरजोर लेक्चर जड़ दिया है. राजा के कारण अर्थशास्त्री  जी  बड़ी मायूस दिखे. वे कोई सीबीआई तो हैं नहीं कि किसी मंत्री की साजिश को पहले से ही भांप लें. 
         अरे, सीबीआई भी तो घोटाला-घटना संपन्न हो जाने के बाद ही छानबीन करती है. और अधिकांश केसों का अंत सीबीआई की विफलता से संपन्न हो जाता है और शेष रह जाता है घोटाले का जिन्न. यह जिन्न देश भर में मंडराता रहता है और सत्ताधारी दल के सिर पर चढ़ कर बोलता है. कभी यह एमपी साहबों  को प्रश्न के बदले घूस लेना सिखलाता है, कभी किसी दल के अध्यक्ष को डिफेंस सप्लाई के मामले में घूस लेने के लिए मजबूर कर देता है, कभी किसी नेता को जानवर का चारा तो कभी आदमी का अनाज चट करने लिए तैयार कर लेता है, कभी किसी को लाइबेरिया में खदान खरीदने के लिए उकसा देता  है और वह अपने राज्य को लूट लेता है, कभी ताबूत खरीद में बड़े साहब से घोटाला करवा देता है......आदि-आदि....
             यह ज़माना बहुत ही खराब है, कोई कमाने लगता है तो उसे देख कर कोई जलने लगता है. कोई किसी को खाकपति से अरबपति बनते देखना ही नहीं चाहता है. अब टाटा या बाबा रामदेव से कोई घूस मांगता है तो सालों बाद उसका प्रकटीकरण मुहूर्त देख कर करते हैं. पता नहीं, जब घूस की याचना होती है तब उनकी जुबान पर ताला क्यों लग जाता है.    इसके पीछे है  घोटालों  का जिन्न  जो, समय पर ईमानदार लोगों  के मुह पर चुप्पी देवी को  बैठा देता है. समय बुरे लोगों के पक्ष में है और जो अच्छे लोग हैं उनको बुरे लोग पोंगा पंडित कहने से चूकते नहीं हैं.   
                   
             

बुधवार, 17 नवंबर 2010

पुतले के पक्ष में उठीं संघी लाठियां: काश! गुजरात में आदमी की रक्षा में भी उठतीं ये लाठियां

          रांची में संघ से स्वयंसेवकों ने बहुत दिनों के बाद अपने तेल सेवित लाठियों का कांग्रेसियों पर संचालन किया.बेचारे कांग्रेसी निहत्थे ही सुरदर्शन जी का पुतला जलाने के लिए रांची के अलबर्ट एक्का चौक पर जा रहे थे और दूसरी ओर पुतले के संरक्षक संघियों ने, अपनी- अपनी लाठियों के साथ लैस, उनपर हमला कर दिया. सुदर्शन जी का पुतला जलने से बच गया. काश यही बहादुरी गुजरात के संघियों ने दिखलायी होती, तो कितने ही ईश्वर निर्मित आदमी की जानें बच जातीं. कितनी ही गर्ववती महिलाओं के पेट नहीं चीरे जाते.
             लेकिन, चलिए संघियों को जीवित आदमी की परवाह हो न हो, उनको एक निर्जीव पुतले पर तो तरस आया! लगता है कि उनके पास अभी भी दिल शेष है, जिसने भले लोगों और निर्दोषों की जगह अपनों के प्रतिकृति-पुतलों पर तो प्यार बरसाया और उसके दुश्मनों पर खुले दिल से लाठियां तो भांजी. लगता है कि वे अब संघी मानसिकता से भटक रहे हैं. इनको जरूर नागपुर के बूढ़े बाबा की जोरदार फटकार लगनेवाली है.

              कुछ संघियों के मालेगांव और अन्य जगहों पर हुए बम विस्फोटों में अंतर्लिप्ततता के कारण सीबीआई के द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद राहुल गाँधी ने संघ को आतंकी कह दिया, तो आरएसएस के लोगों का भी अपनी गोएबेल वाली नीति पर आरोप गढ़ने का पक्का हक़ बनता है. सो, उसी हक़ के आधार पर सुदर्शन जी ने कुछ निराधार कह दिया तो ये कांग्रेसी सुदर्शन जी का पुतला जलायेंगे ? उनका काम वे करेंगे? हिंसा उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. और इस अधिकार की रक्षा के लिए ही वे अपने दफ्तर में अपने कार्यकर्ताओं का कोई लेखा-जोखा नहीं रखते ताकि किसी कांड में पकड़े जाने पर संघ उनको अपने से असम्बद्ध बता सके.

        संघ के द्वारा बदनामी से बचने का पुख्ता इन्तेजाम रखा जाता है. लेकिन, जबसे अफवाह फ़ैलाने के लिए जिन्ना के नाम का इस्तेमाल कर महात्मा गाँधी को नीचा दिखने की नीति के लिए, जसवंत सिंह का प्रयोग सफल हुआ, तबसे संघ इस तरह का रिस्क लेने लगा है. उसी का प्रतिफल है सुदर्शन जी की असुदर्शन वाणी में सोनिया जी की बेबुनियाद तकरीर.

                बेबुनियाद तकरीर ही तो उनका हथियार है. कोई अपने आप को अपने हथियार से कैसे अलग कर सकता है? सवाल है पहचान की रक्षा की. और संघी अपनी पहचान कभी मिटते हुए नहीं देख सकते हैं. हाथ में तेल पिजायी लाठी, सिर पर काली टोपी, हाफ पैंट आदि और फिर वे शान से कहते हैं -हम गणवेशधारी हिन्दू हैं. और जो ऐसा वेश धारण नहीं करता, वेद देख लो, वह हिन्दू कहलाने लायक ही नहीं है. उनके वेद में हिन्दुओं का यही ड्रेस कोड लिखा है तो लिखा है, और यह ड्रेस कोड सभी हिन्दुओं को मानना होगा, अन्यथा उन्हें गैर हिन्दू या धर्मनिरपेक्ष भ्रष्ट हिन्दू की संज्ञा दे दी जायेगी. उनके लिए स्वर्ग के द्वार बन्द करवा दिए जायेंगे. वही हिन्दू स्वर्ग जाने का अधिकारी माना जा सकता है जो संघी ड्रेस कोड को फौलो करता है.

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

सुदर्शन जी रियाज कर रहे थे-अजी मैंने ऐसा तो नहीं कहा था....

             आम तौर से जब नेताओं, खास कर गोएबेल्स के चेलों को कुछ उलटी-सीधी बात को जनता में फैलाना होता है, तो वे किसी अपने खाश आदमी को बलि का बकरा बना कर, उससे अपनी बात मेमिया देते हैं. आरएसएस के पास बकरों की कमी नहीं हैं. जिन्ना का नाम लेकर गाँधी और नेहरू को नीचा दिखलाना था, तो आडवाणी जी को और जसवंत सिंह जी को बकरा बनाया और उनकी  कलम से दो विष-युक्त किताबें लिखवा दीँ . एक ने  तो अपनी किताबें पाकिस्तान में भी बेचीं . किताब बेचते हुए  जसवंत जी को पाकिस्तान में  'प्यारे जसवंत भैया' वाली गज़ल भी बहुत अच्छी लगी. उन्होंने उस गज़ल को पकिस्तान में बार बार सुना और सुनते समय  उनके मुखमंडल पर जो चमक दिखती थी, उससे यह नहीं लगता था कि वे कभी किसी धार्मिक समुदाय के विरुद्ध आग उगलने वाले आरएसएसवादी नेता रहे हों. वे तब विशुद्ध जिन्ना समर्थक लगे, जैसा कि उनके दल के वे नेता दीखते हैं जो आजादी के समय से लेकर आज भी सक्रिय हैं.
        हाँ तो, बात चल रही थी कि आरएसएस के पास बकरों की कमी नहीं है. उसी बात को जारी रखते हुए बता दें  कि उनका लैटेस्ट  बकरा हैं, महामना सुदर्शन जी महाराज.        
           अब  कांग्रेस, सरदार  बल्लभ  भाई पटेल की कमी को दूर करने की कोशिश करते हुए, उनके बताए रास्ते का अनुशरण किया और आरएसएस के कई लोगों पर आतंकी वारदात करने के इल्जाम में अंदर करवा दिया. अगर बल्लभ भाई पटेल कुछ वर्ष और जीवित रह पाते तो शायद देश के प्रधानमंत्री बन जाते और आरएसएस इतिहास बन जाता. लेकिन, देश के दुर्भाग्य से पटेल जी के जीवन का असामयिक अंत हो गया और आरएसएस को पनपने का मौका मिल गया, कभी जेपी के इस विश्वास के कारण कि क्रांति की अग्नि में तप कर एक दिन वे सोना बन कर निखरेंगे, तो कभी रामजन्म भूमि विवाद पर देशवासियों और श्रीराम को एक साथ धोखा दे कर. लेकिन इस संकट की घड़ी में बेचारा बना आरएसएस क्या करता ? सो सुदर्शन जी को कहा कि बोलो जो मैं तुम्हारे कान में कहता हूँ और वे बोल गए, सोनिया सीआईए की एजेंट  हैं और राजीव गाँधी की हत्या के पीछे भी वे ही थीं. ऐसी अमर्यादित और  काल्पनिक बातें ही तो गोएबेल्स के हथियार हुआ करते थे. 
          सो सुदर्शन जी ने मेमिया दिया और जैसा कि बकरों के मेमिया जाने के बाद होता है, आरएसएस ने अपने पूर्व के बकरों से सम्बंधित  उसी पुराने वक्तव्य को दुहरा दिया, सिर्फ नाम बदलते हुए- यह सुदर्शन जी का व्यक्तिगत बयान है, आरएसएस का नहीं. ऐसा ही बयान तब भी दिया गया था जब बीजेपी के एक राष्ट्रीय अध्यक्ष को पूरी दुनिया ने घूस लेते हुए देखा था, वह भी प्रतिरक्षा के सौदा हेतु.  लेकिन इसी फार्मूला पर कांग्रेस कहे कि आदर्श घोटाला अशोक चाहवान का व्यक्तिगत मामला है, या करुणा निधि जी कहें कि राजा के मंत्रालय का कथित घोटाला राजा का व्यक्तिगत मामला है, तो इसे आरएसएस या बीजेपी के नेता कतई नहीं मानेंगे मानेंगे. वे तो एक सुर में पूरी 'कांग्रेस चोर है, चोर है' का नारा हुआं-हुआं करते रहेंगे हैं. 
       तीन हजार वर्ग फीट के फ्लैट पर कथित रूप से अशोक चाहवान के सगों के कब्जे के मामले पर अशोक चौहान को कांग्रेस मुख्यमंत्री के पद से हटा देती है, लेकिन जिस नरेंद्र मोदी  के शासन काल में हजार से अधिक लोगों को मौत के घात उतार दिया गया, गर्ववती महिलाओं के पेट चीर दिए गए, कितनो को जिन्दा जला दिया गया और उसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी के चाहने पर भी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हटाया नहीं गया  क्योंकि वह तो बीजीपी के असली चेहरा बन चुके थे, कहीं कोई अपने असली चेहरे को हटा सकता है?
       लेकिन, सुदर्शन जी ही शायद बंद कमरे में रियाज कर रहे थे- अजी मैंने ऐसा तो नहीं कहा था.... ये प्रेस वाले कुछ का कुछ लिखते-दिखाते रहते हैं, कभी वरुण को हाथ काटने की धमकी देते दिखा-सुना देते हैं, तो कभी बीजेपी के अनेक सांसदों को प्रश्न के बदले पैसे लेते दिखा देते हैं.....इन प्रेस वालों पर कोई कैसे विश्वास कर सकता है....सब के सब कांग्रेसी सीबीआई हैं....एक हमारे ज़माने  में सीबीआई थी, वह हमारे गढ़े बोफोर्स कांड की जाँच पर घोटाले से चौगुनी रकम खर्च कर भी किसी को दोषी नहीं ठहरा पाई और इधर हमारे लोगों ने जैसे ही एक दो धमाके कर दिए तो सबूत के साथ हाजिर हो गई कांग्रेसी सीबीआई...... उधर कान में एक आवाज आई- सो फाइनली सुदर्शन जी  बोलेंगे कि मेरे वक्तव्य के तोड़-मरोड़ के पीछे कांग्रेस का पंजा है,  सीबीआई का हाथ है, प्रेस का हाथ है!
          

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

अरुन्धत्ती:कोई आगे बढ़ कर उनको चीन का मिनरल वाटर तो पिलाओ भाई....

         अरुन्धत्ती राय ने अपने देश विरोधी बयानों से मेरी रांची की धरती को दागदार कर दिया, जिस धरती पर अनेक स्वतंत्रता  सेनानिओयों ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी. लेकिन,  नक्सलियों से बेइन्तहां  प्रेम और सहयोग रखनेवाली महाश्वेता देवी भी कुछ कम नहीं हैं. उन्होंने भगवान् बिरसा पर लिखे अपने एक उपन्यास में बिरसा को बाल चोर की पदवी दे दी है. दोनों ने झारखण्ड की धरती को अपवित्र किया है.
        लेकिन, ये दोनों महिलाएं ऐसा क्यों करती हैं ? वस्तुतः दोनों बहुत भूखी हैं. बहुत दिनों से अखबारों में हेड लाईन  नहीं बटोर पा रहीं हैं. अरुन्धत्ति तो कुछ-कुछ सफल रहीं, लेकिन महाश्वेता देवी को ज्यादा सफलता नहीं मिली, क्योंकि वह नक्सलियों के मामले में ढुलमुल हो गयीं. परन्तु, अरुंधती तो शर्म जैसी नाचीज से नाता ही नहीं रखतीं हैं, सो अभी तक कश्मीर सम्बन्धी अपने मूर्खतापूर्ण बयान पर अडिग रह कर, नाम कमाने के रास्ते पर चल निकली हैं. एक कहावत है कि गुमनामी से बदनामी बेहतर होती है.
        एक और महान हैं, अडिगाजी, उनको हनुमान राम के पेड सर्वेंट नजर आते हैं. उनको भारत में सभी दिशाओं में अन्धेरा और चोर टाईप के लोग नजर आते हैं, सिर्फ एक वे ही शरीफ और अच्छे हिन्दुतानी शेष रह गए हैं. अगर वे हिंदुस्तान से चीन चले जायें, जहाँ उनके  आका विराजते हैं,  तो हिन्दुस्तान, चोरों  और उचक्कों का देश शेष रह जायेगा. 
          पता नहीं, इस वेला में हमारे माओ प्रेमी कम्युनिस्ट लोग कहाँ छुपे बैठे हैं ? किस बिल में समा गए हैं ? वे एक भी शब्द अपने प्रिय विचारक, प्रबुद्ध और प्रगतिशील अरुन्धत्ती की सेवा में मुह से नहीं निकाल रहे हैं. लगता है कि उनका गला ममता के खिलाफ बोलते-बोलते सूख गया है. कोई आगे बढ़ कर उनको चीन का मिनरल वाटर तो पिलाओ भाई....अगर कम्यूनिस्टों का हलक सूख गया है तो चीन का मिनरल वाटर अरुंधती को ही पिलाओ, ताकि वे अब अरुणाचल, असम, मेघालय, नगालैंड,सिक्किम, भूटान  आदि पर भी अपनी माओवादी टिपण्णी से देश को अनुगृहीत कर सकें.
         एक थीं महारानी लक्ष्मी बाई, जिन्होंने देश कि अस्मिता के लिए तलवार उठा कर बंदूकधारी अंग्रेजों के सामने खड़ी हो गयीं और अंतिम सांस तक अंग्रेजो से लोहा लिया. एक हैं माओ की वीरांगना अरुन्धत्ती, बहुत मोडर्न हैं, और कभी  हाथ  की कलम तो कभी अपनी जुबान को तलवार की तरह इस्तेमाल कर भारत माता को लहूलुहान करती रहती हैं. वह चीन का साल्ट खातीं हैं, सो हम उनको भारतीय नमकहराम तो कतई नहीं कह सकते हैं. सो, अब यह आम लोगों  पर छोड़ता हूँ कि वे इस क्रांतिकारी महिला को किस श्रेणी में रखना चाहेंगे. यह माओ प्रिया या भक्तिनी, सचमुच आदरणीया हैं, देश के लिए कोहिनूर हैं. जांबाज हैं. चीन के लिए भारतीय संस्करण की  देश भक्तिनी हैं. जो भी हैं, गजब की हैं. अजब की हैं. पता नहीं उनको अपने  बयानों पर कब बुकर-सूकर टाईप का पुरस्कार  न मिल जाये, जैसे भारत की झुग्गी  झोंपड़ियों  में रहने वालों को कुत्ता   कहने के कारण आस्कर अवार्ड मिल गया था. सो मैं अडवांस में अरुन्धत्ती को संभावित किसी बड़े पुरस्कार के लिए लाल सलाम कहते हैं और बधाइयाँ भी देते हैं.
           
        

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

राहुल गाँधी को गंगा में फेंक देना चाहिए: शरद यादव

               शरद यादव ऊपर से   बहुत घबराहट में  हैं, लेकिन अंदर से मुस्कुरा रहे हैं. उन्होंने अपने अटपटे भाषण से राहुल और नीतीश दोनों पर निशाना साधा है. उन्होंने राहुल  और उनके स्वतंत्रता  सेनानी परिवार की कटु आलोचना करते हुए कहा है कि भाषण देते हुए अपने कुरते की आस्तीन चढ़ाने वाले राहुल को गंगा में फेंक देना चाहिए. 
            उनको  जो बोलना था, वे पूरी चालाकी के साथ  बोल गए लेकिन, इससे नीतीश के लिए चुनावी  रास्ता कठिन हो गया, क्योंकि शरद ने चुनावी मुद्दा ही बदल दिया और जो मुद्दा बढ़ाया है, वह घनघोर आलोचनों का शिकार होगा ही. अब शरद यादव की पार्टी जदयू भाजपा के साथ है, जो आरएसएस की एक इकाई है और आरएसएस ने तो कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन तक नहीं किया, उलटे उसने उस अभिनव भारत का साथ दिया जिसके एक सदस्य ने महात्मा गाँधी की ह्त्या कर दी थी. इस प्रकार शरद यादव ने जदयू के एक  तीर(छाप)  से दो-दो निशाने साधे और नीतीश को बता दिया कि वे उसके सामने दादागिरी न दिखाया करें.
          इधर नीतीश, जदयू को अपनी जागीर की तरह देखने लग गए हैं. शरद जी को चटनी समझने लग गए हैं, सो शरद जी ने उनको समाजवादी दांव दिखला दिया है.
        चाहे कुछ भी हो, शरद जी को भाजपाई लोगों के साथ रहते-रहते स्वतंत्र सेनानिओं के खिलाफ बोलने की भाजपाई-बीमारी लग गई है. भाजपाई लोग महात्मा  गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, डा. राजेंद्र  प्रसाद आदि  की आलोचना किया करते थे, लेकिन वे मोती लाल नेहरू की आलोचना नहीं किया करते थे, परन्तु शरद जी ने मोती लाल नेहरू  से लेकर  राहुल गाँधी तक की आलोचना कर और व्यक्तिगत आक्षेप कर, एक नया रिकार्ड बना दिया है. लेकिन, यह  रिकार्ड नीतीश का भी रिकार्ड ख़राब कर देगा. पर शरद जी  को क्या गम कि नीतीश की सरकार बिहार में फिर बने न बने.....नीतीश को पार्टी पर हावी होने की सजा तो मिलनी ही चाहिए. सो उन्होंने सजा दे दी है और अपने चुनावी भाषण का स्वयं लाभ उठा गए हैं.
         अगर नीतीश को पता होता की शरद जी ऐसा गुल खिलायेंगे तो, वे उनको भी नरेंद्र मोदी की श्रेणी में रख देते. वरुण गाँधी की श्रेणी में रख देते- कट्टर सांप्रदाइक श्रेणी  में रख देते. 
         अपने को  असली और श्रेष्ठ सेक्यूलर मानने वाले  नीतीश जी का मानना है कि भाजपा घटाव नरेन्द्र मोदी, घटाव वरुण गाँधी, एक विशुद्ध सेक्यूलर पार्टी है और अगर लोहिया जी जीवित होते तो वे आरएसएस और भाजपा की दोहरी सदस्यता ले लेते. आचार्य नरेंद्र देव जीवित होते तो वे समाजवाद में भाजपा के योगदान पर नीतीश के चश्मे से एक कीताब लिख डालते और उसे बुकर पुरस्कार मिलता.     

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

सबके सब एक दूसर को नंगा-अधनंगा कर रहे हैं

          बिहार में  चुनावी राजनीति का पारा सातवें  आसमान  पर है. नेतालोग एक दूसर पर बेरहमी से आरोपों की बरसात  कर रहे हैं. जनता बहुत खुश है कि  सबके सब एक दूसर को नंगा-अधनंगा कर रहे हैं. लेकिन, लालू जी को बड़ी चिंता चिंता यह है कि नीतीश को रोकें कि राहुल को. बेचारे छटपटा रहे हैं.  उनका दिमागे नहीं काम कर रहा है. पहले से  उनको राहुल फैक्टर  के बारे में कोई खाश अंदाज नहीं था. लेकिन, जो पहले चरण के चुनाव में दिखा वह चिंताजनक है.
          वैसे, नीतीश जी कम परेशान नहीं हैं. उनको भाजपा के नेताओं के भाषणों से परेशानी है, क्योंकि  वे घुमाफिरा कर साम्प्रदाइक बात परोस रहे हैं. दूसरी ओर, कांग्रेस सेंधमारी  कर रही है.
           राहुल सेन्ट्रल फंड  का हिसाब मांग रहे हैं, और हिसाब-किताब रखने का काम तो बिहार में कब से बंद पड़ा है. उनको तो सिर्फ नरेंद्र मोदी के द्वारा भेजे गए पैसे के हिसाब से मतलब था, जिसको लौटा कर उन्होंने अपने आप को सेक्यूलर साबित करने का प्रयास किया है. यह उनके जीवन का सबसे बड़ा साहसिक कदम था. इस लोहियावादी ने साबित कर दिया कि वह भाजपा के दलदल में रहने के बाद भी बिल्कुल साफसुथरा है. पांच सौ प्रतिशत सेक्यूलर है.
        आज हर कोई अपने आप को सेक्यूलर साबित करने पर तुला है. अब आडवाणी जी बिहार आये और बोले कि हमारे नरेन्द्र मोदी जी आकंठ सेक्यूलर हैं, लेकिन क्या करें उनके खिलाफ प्रचार ज़रा गलत हो गया.
      मोदी जी के प्रचार आइटम  से क्रोधित हो कर नीतीश जी ने भी उनके खिलाफ कुछ गलत प्रचार कर दिया. उनको और उनके कदम चिन्हों पर चल रहे वरुण गाँधी को भी बिहार दौरे से अलग कर कुछ ज्यादा ही गलत प्रचार कर दिया. वर्ना मोदी जी तो सच्चे सेक्यूलर हैं. अब इससे अधिक दुःख कि बात क्या  हो सकती है कि मोदी जी कि  छवि सिर्फ गलत प्रचार के कारण ख़राब हो गई है. ये अखबारवाले भी बड़े वाहियात हैं. जो मन में आता है अखबार में मोदी जी के नाम पर छाप देते हैं. बेचारा सच्चा सेक्यूलर सिपाही साम्प्रदाइक  घोषित हो गाया है.  
             वैसे,आडवाणी जी   भी कुछ कम  सेक्यूलर नहीं हैं और चर्चा है कि इस बार शायद वे मस्जिद बनवाने के लिए रथयात्रा का प्रोग्राम बनायेंगे....उनको किसी  भी हालत में बस एक बार प्रधानमंत्री बनना है. इस दिशा में उन्होंने जिन्ना  साहब की तारीफ़ में क्या क्या नहीं किया. उनके चेले जशवंत जी भी ने जिन्ना भक्ति पर किताब  लिख डाली. जशवंत जी तो पकिस्तान में तो काफी पॉप्यूलर हो गए, लेकिन अब देखना है कि गुरु चेले कि जोड़ी अपने नए इमेज  को  भारत में  कितना भुना पाती  है.  

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

लोहिया के लोग भाजपा की गोद में

               नेता  जी बहुत सावधान हैं, एक भी अल्पसंख्यक का वोट हाथ से निकलना नहीं चाहिए....मोदी आ जाते तो गजब हो जाता. अगर सांप्रदायिक भाजपा मोदी को बिहार बुला लेती तो, मैं तो अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लेता ही तिवारी जी, लेकिन क्या करें, अकेले चुनाव जीतना आसान नहीं न है, सो भाजपा के साथ अभी कुछ दिनों तक तो चलना ही पडेगा. लेकिन ध्यान रहे, कोई भाजपा का नेता हमारे उम्मीदवारों के क्षेत्र  में पैर न धरे, खाश कर मुस्लिम इलाकों में.जब देखो राम नाम जपते रहते हैं, जब कि चुनाव के समय में उनको वोट-वोट जपना चाहिए . ये हाफ  पैंट और खाकी  टोपी वाले एक नए टाईप के हिन्दू हैं. हम तो ठहरे खांटी लोहियावादी समाजवादी, सो कैसे इनको बर्दाश्त कर सकते हैं. अगर अभी कर रहे हैं, तो मतलब साफ़ है कि सत्ता  के लिए जहर पीना ही पड़ता है. अब लोहिया जी आत्मा नाराज हो या जो हो, इतने वर्षों से तो हम इन बवालियों  के साथ ही चल रहे हैं. लेकिन  बड़ी सावधानी की जरूरत  है...एक  दो ऐसे भी पाजी हैं, जो रोज दिन बोल रहे हैं कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं....जिस दिस ऐसा हो गया तो हम क्या मुह ले कर स्वर्ग में लोहिया जी के सामने जायेंगे?

               तिवारी जी रुष्ट हो कर बोले," देखिये, राहुल बिहार में अकेले चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा रहे हैं, तो हम इन साम्प्रदायिक तत्वों से अलग हो कर चुनाव क्यों  नहीं लड़ सकते हैं ? १९77  से हम लोग कई पार्टियों में  आते जाते रहे हैं. सो हमारा अनुभव है राजनीति  डील करने का. अगर हमें पूर्ण बहुमत न भी आते  तो हम कांग्रेस से  सहयोग ले सकते हैं. लालू से नहीं लेते तो कम से कम हम लोजपा का दरवाजा तो खटखटा सकतेहैं. हम कब तक मोदी एंड पार्टी का दबाव झेलते रहेंगे?
          नेता जी कहिन, अरे तिवारीजी,  ई तो हम भी जानते हैं कि समझदार मतदाता समझता है कि हम लोग घुमा फिरा के आरएसएस के साथ हैं, लेकिन जाहिल वोटरलोग  ई बतवा  नहीं न जानता है. मोदी को बिहार आने से रोक के सब जाहिल वोटरों का हमने मन जीत लिया है, समझे? इतना ही नहीं, हमने तो प्रथम चरण के चुनाव में रथवाले अडवाणी को भी बिहार आने से रोक दिया है. उ यहाँ आता और फिर से राम मंदिर, राम मंदिर  रटने लगता....गडकरी भी उस बुढवा को नहीं  देखना चाहता है. सो गडकरी मेरी बात मान कर अडवाणी जी का कार्यक्रम बदल दिए हैं.
         तिवारी जी का क्रोध फिर भी कम नहीं हो रहा था-अरे जब हम लालू के साथ थे, तब उसके 'माई' से परेशान थे और अब भाजपा के भगवाधारियों से. पता नहीं ये कौन ब्रांड के हिन्दू हैं. कभी जिन्ना की जय करते  हैं  तो कभी राम की. अडवाणी और जशवंत ने जिन्ना  को कितना हाईलाईट किया, लेकिन  लोहिया के बारे में कुछ भी नहीं  लिखा और किताब  पाकिस्तान में बेच के पैसा भी खूब  टान लिया. सोचते हैं क़ि हम भी एगो किताब लोहिया पर लिखिए दें- लोहिया के लोग भाजपा की गोद में.
         
            

सोमवार, 20 सितंबर 2010

जब तक राज करेंगे सिर्फ माई के नाम के नाम पर करेंगे

           
लाल साहेब को अचानक भूराबाल की चिंता सताने लगी. चट-पट बोले, "सारी  नौकरिया में भूरा बाल को दस परसेंट देंगे, लेकिन ओ भूरा बाल कभी कुर्सी की ओर नहीं लपकना...लपकने का एकाधिकार सिर्फ मेरे पास है....एक बार गलती से मिस्टेक हो गया ओर "माई' नाराज हो गई और हमरा राज हमरे  पैर के नीचे से खिसक गया...उधर रेल से हम डिरेल हो गए, इधर मैडम soniyaa  के पास से हमरा इनडाईरेक्ट रूलवा ख़तम हो गया. कुल्ले फिनीश हो गया, लेकिन इस बार कौनो हमको हराने की बात सोच रहा है, तो उससे फूलिश और कौन हो सकता है..अरे जब हम अपना दुश्मन नंबर एक पासवान जी को पटा ले सकते हैं, तो वोटर को पाटने में हमको केतना देरी लगेगा ...माना कि हमारे पास सरकारी फंड नहीं है, सरकारी गाडी घोड़ा नहीं है, सरकारी प्रचार तंत्र नहीं है, लेकिन मेरे साथ अब 'माई' है,  समझे कि नहीं समझे...
           अरे, आप क्या समझते हैं कि हम नौसिखुआ खेलाडी हैं, क्या जो भूराबाल को दस परसेंट नौकरी हमरे हाथ से भेंटा जाएगा ?अरे, हम जब तक राज करेंगे सिर्फ 'माई' के नाम पर वैकेंसी निकालेंगे, बूझे कि नहीं? हमरी माई को थोड़ा  भी घबराने की जरूरते नहीं है. बस हमको 'माई' की चोंटी पकड़ के कुर्सी पर बैठना है, फिर खेला शुरू.......
           खेला शुरू का मतलब का मीनिंग समझे कि नहीं? का समझिएगा, कभी राजनीति में आप लोगन पालिटिक्स किये हैं ? हम जनता हूँ राजनीति में पालिटिक्स करना....हम पर आँख, कान और नाक बंद कर के विश्वास कीजिए, आपका कुल्ले चिंता-फिनता हम डाउन लोड कर देंगे. हम जो चालीस परसेंट लेंगे, उसमें दस परसेंट किसका होगा? और किसका होगा, अरे आपका होगा...घी का दिया जलाईयेगा अपने घर-दूरा में, समझे कि नहीं कि अभियो धतुरवा की तरह सोचियेगा.....

जो जो लोगन ई सोच के चला है कि उसकी सरकार का इस बार रीन्यूवल हो जाएगा उ लोगन दिन में सपना देखने वाले लोग हैं. अरे उ लोगन तो आदमी का चारा खा गया है. उनको तो बड़ा पाप लगेगा. जनता के बीच का पब्लिक थोड़े नहीं समझेगा कि बिहार को लूटने के लिए, मेरे खिलाफ केतना केतना षड्यंत्र  किया और केतना केतना आरोप का बरसात किया...लेकिन हुआ क्या? अरे आज भी हम पासवान  जी को छोड़ कर सभी दल के खिलाफ मोर्चा ले रहे हैं और उड़न खटोला में उड़ रहे हैं. 

कुछ लोग कहता है कि मेरे राजद से बहुते नेता लोग भाग रहे हैं जैसे डूबते, जहाज  से चिड़ियाँ लोग फुर्र से उड़ जाते हैं. अरे कौनो नेता हमरे दल से बाहर नहीं निकला है, काहे कि हम ही अपने दल के एक मात्र नेता हैं और बाकि तो चिरकुट  हैं. अब देखिये मेरे सालों को भी लोग नेता मानते हैं. लेकिन मेरे साले को किसने नेता बनाया? अरे, हमने अपनी राबरी को मुख्यमंत्री जरूर बनाये, लेकिन नेता नहीं. फिर अपने साले को हम काहे नेता बनायेंगे? उ कौन होता है मेरे दल में रह कर नेता बनने वाला? हमरे दल में उसी को रहने का खुला अधिकार है, जो नेता नहीं है और बस मेरा फालोवर है, समझे कि नहीं? 

हमको नीतीश जी पर भी हँसी आती है. उ कहते हैं कि हम फिनीश हो जायेंगे. लेकिन भाजपा के नेता नरेंद्र मोदी के बिहार आने के नाम से ही डर के मारे छटपटाए  हुए हैं. यानी मोदी आये,  तो नीतीश फीनीश हो जायेंगे. का बात का इतना डर रहे हैं नीतीश? मोदी कौनो बाघ हैं या कि उ कौनो शिकारी हैं कि  बन्दूक ले के आयेंगे और यहाँ  फटफटा दाग  देंगे? नीतीश दू बार जनता को धोखा  दे चुके हैं और हम रेल मंत्री के रूप  में असली गुरु बन के  सबका मन जीत चुके हैं. हम कहता हूँ इस बार  चुनाव भी हमही जीतेंगे.

शनिवार, 18 सितंबर 2010

अर्जुन साहब पहले किसका सूखा दूर करेंगे?

अर्जुन साहब फिर एक बार मुख्यमंत्री बन गए हैं. शपथ ली है कि सूखा राहत कार्य पर पूरा ध्यान देंगे. लोग छटपटाए  हुए हैं, यह जानने के लिए कि वे पहले किसका सूखा दूर करेंगे. अपना, गडकरी जी का कि गाँव के ग़रीबों का. आम तौर से तो झारखण्ड का रिवाज है कि नेता लोग अपना सूखा दूर करने पर ही सारा ध्यान लगा देते हैं.

क्या मुंडा जी झारखण्ड  की परम्परा को तोड़ेगें ? परम्परा को तोड़ना आसान नहीं होता हैं, और फिर मुंडा जी की पार्टी परम्पराओं को  तोड़ने में विश्वास ही नहीं रखती है. देखिये, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का, उनकी पार्टी का वादा हर चुनाव में दुहराने की पार्टी की परम्परा है, और पार्टी  उस ,पर आज भी कायम हैं, और जब तक यह सूरज चाँद रहेगा, उनकी पार्टी इस परम्परा को सदा कायम रखेगी  . राम भी इस बात को समझ गए हैं कि  मुंडा जी की पार्टी उनको सिर्फ मंदिर या मूर्ति के रूप में देखती है. राम  नाम के सिक्के के बिना उनकी पार्टी चल ही नहीं सकती. एक बार इस सिक्के से ज़रा सा डगमगाए कि  सिक्का ही नाकामयाब हो गया. बकौल भाजपाई पत्रकार अरुण जी के अनुसार वह राम नाम का सिक्का नहीं, बन्दूक की गोली थी जो, दो बार फायर नहीं की जा सकती है. खैर, विज्ञानं का युग है और कारतूस को रियूजैब्ल  बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे, ऐसा सबका विश्वास है.

मुंडा जी ने सबसे अच्छा काम यह किया है कि बिना राम या कृष्ण के बारे में विचारे, सर संघ चालक और  गडकरी जी का आशीष लेने के लिए नागपुर उड़ गए हैं. आखिर सरकार का और उनकी पार्टी का संचालन नागपुर वाले बाबा के आदेश निर्देश  से ही तो होने वाला है. गडकरी तो थोपे हुए नेता हैं और सर संघ चालाक तो सर्वोच्च शक्ति के स्वामी हैं. सो वे नागपुर पहुँचते ही आशीष ग्रहण करेंगे और आदेश-निर्देश  पर चलने की शपथ लेंगे. वही शपथ तो फलदायक होगा. नागपुरवाले बाबा खुश तो अर्जुन बाबा खुश.

सबसे तारीफ़ के काबिल तो सोरेन जी के पुत्र जी हैं, जिन्होंने अपने पिताश्री को मुख्यमंत्री पद से विस्थापित कर मुंडा जी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए क्या  कुछ नहीं किया. अर्जुन जी के सुखार में हेमंत ऋतु ला दिया. भगवान करें  सोरेन-जुनिअर के घर आँगन में सुखार ख़त्म हो जाये. सावन भागों बरसे.

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

अर्जुनजी का तीर निशाने पर और बौखलाए यशवंतजी

अर्जुनजी  का तीर निशाने पर और बौखलाए यशवंतजी  
अर्जुनजी  ने सधे हुए हाथों से झारखंडी तीर चलाया और रघुवरजी  को हरिभजन पर लगा दिया....तो यशवंत जी को उनकी औकात बता दी....इसी औकात के लिए कभी यशवंत जी ने सुबोध  जी से तगड़ा फाईट किया था. उन्होंने सुबोध जी से पूछा था "उन  की औकात क्या है  ? सुबोधजी  सीमा में रहे. " सुबोधजी  ने जी ने भी एक पोस्टर छाप बयान जारी कर के उनको लताड़ा था. लेकिन अर्जुन जी ने तो  शब्दों से  बिना चुनौती दिए बिना ही, उनको उनकी औकात बता दी और चढ़ बैठे आला कुर्सी पर.

अर्जुन जी ने सीधे गडकरी को पटाया और नागपुर तक अपनी पकड़ मजबूत कर ली. नागपुर बाबा से आशीर्वाद नागपुर जा कर ले आये. अब वे सरकारी खर्चे से नागपुर गए या कि अपनी मोटी जेब ढीली कर के गए यह तो पत्रकार लोग पाता लगायेंगे.  लेकिन, यहाँ तो परम्परा है कि सरकार  बनाने के लिए सरकारी टूर की व्यवस्था कर ली जाती है. राजस्थान जा कर अपने समर्थकों को खूब राजस्थानी भोजन करवाया  जाता है. खान पान पर तब की रानीजी- सरकार ने खजाना खाली किया था  कर दिया था और आने जाने का खर्च झारखण्ड सरकार ने वहां किया था.

सो अर्जुन जी ने दिखला  दिया की वे कैसे मास्टर गेमर  हैं. यशवंत जी को भी लालू जी की तरह याद नहीं रहता कि वे अब केन्द्रीय  मंत्री नहीं हैं और वे नागपुर वाले बाबा के गुड बुक में भी नहीं हैं. बाबा को यशवंत जी का बिना इजाजत लिए मुह खोलना अच्छा नहीं लगता है. भाजपा में नेताओं को वही भजना पड़ता  है जो नागपुर वाले बाबा कानो-कान सन्देश द्वारा  भेजते हैं. और यशवंत जी को तो राष्ट्रीय स्तर पर बने रहने के लिए बड़े बड़े मसलों पर बोलने की आदत सी हो गई है. अडवानी जी ने जिन्ना से प्रेम दिखलाया तो वे हो गए परेशान और मार दिया एक विरोधी बयान. चाहते तो चुप भी रह सकते थे. इतना भी नहीं सोचा कि नागपुर वाले बाबा टेस्ट कर रहे हैं कि क्या जिन्ना का नाम बड़ा कर गांधीजी का नाम कुछ छोटा किया जा सकता है कि नहीं. वरना अडवानी जी जिन्ना के नाम पर विशेषण पर वशेषण का प्रयोग करते ?

यशवंत जी की फजीहत हुई. लेकिन उनको लगा की उनके बोलने से ही अडवाणी जी पार्टी में कुछ कमजोर पड़े हैं. सो जैसे ही प्रयोग-२ के तहत जशवंत ने जिन्ना की तारीफ़ में किताब लिख डाली तो फिर यशवंत जी जोर से उबले . जोर लगा कर, दम भर  बोले. उनको लगा कि पार्टी से जशवंतजी  के पलायन से पार्टी में उनकी पकड़ बढ़ेगी. लेकिन यह क्या, जशवंत फिर फुल पावर में पार्टी में वापस आ गए . लगता है कि यशवंत जी को अपना समाजवादी दिल चेंज  करना होगा.  "नागपुर वाले बाबा को कैसे खुश करें " वाला क्लास उनको करना होगा. उनको किसी संघ प्रचारक को अपना गुरू बनाना होगा. वरना अडवाणी और जशवंत से हारते हारते उनको प्रखंड स्तर तक के नेताओं से भी टक्कर लेने की नौबत आ जायेगी. 

अब यशवंत जी एक आध पार्टी पदों से इस्तीफा दे दें या पार्टी को ही छोड़ कर चल दें तो इससे नागपुर को हानि होंगी? उनके लिए तो एक बिना इजाजर के बोलने वाले नेता से मुक्ति मिल जायेगी. सो  बिना नागपुर के सेटिंग  के वे दल के  महान नेता बन ही नहीं सकते हैं. नागपुर में तो घुटना तो टेकना ही पड़ता है, चाहे वह कोई भी क्यों न हो. अब जनाब अरुण शौरी जी राजनाथ सिंह को बच्चा  कह रहे  थे, लेकिन जब एक  बच्चा  भाजपा का अध्यक्ष बन गया तो, उनकी भी कलम की स्याही सूख  गई. जब अरुण शौरी जैसा नेता प्लस पत्रकार, इस घटना पर सारी तक नहीं बोल रहा है,  ऐसे में यशवंत जी क्या करेंगे? कुछ नया करिए यशवंत जी, दिल या दल बदलिए, और इसके लिए मौसम भी अनुकूल है. बिहार में ज़रा दम लगाइए, शायद कोई दूसरा रास्ता मिल जाये.   

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

नीतीश: गुड खायेंगे लेकिन गुलगुल्ला नहीं?

नीतीश: गुड खायेंगे लेकिन  गुलगुल्ला नहीं?
बिहार में चुनाव सर पर है और हमारे नेता नीतीश जी परेशान हैं. कहीं भाजपा अपने असली चेहरों, नरेन्द्र मोदी और वरुण गांधी को चुनाव प्रचार में न उतार दें. लुटिया ही डूब जायेगी. सत्तर प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट का कबाड़ा बोल जाएगा. नीतीश जी गुड खाने में एक्सपर्ट हैं, लेकिन उनको गुलगुल्ला नहीं पचता है. संविधान में  लिखा है कि इस देश में हर नागरिक को अपनी बात किसी भी शहर गाँव में जा कर व्यक्त करने की छूट है. लेकिन अब चुनाव पर हमरे नेता जी संविधान की  फ़िक्र करने लगेंगें तो हो गया चुनाव.बस  चुनाव के कारण ही   नीतीश जी मोदी जी और वरुण जी को उनके संवैधानिक अधिकार से जुदा कर रहे हैं. अमेरिका ने भी मोदी जी को अमेरिका जाने का वीसा नहीं दिया था. नीतीश जी अमेरिकी वाला  चल रहे हैं. वैसे, बाद में, अगर उनका हाथ किसी मंच पर मोदी जी धर कर हवा में लहराने लगेंगे तो उ अपना हाथ क्यों पीछे खींचेंगे? उस समय बिहार चुनाव समाप्त हो चुका होगा और अल्पसंख्यकों के वोट कौन्त हो चुके होंगें. 

लेकिन, नीतीश जी की सहयोगी भाजपा सोचती है कि अगर उनके असली चेहरे सामने आ जायें तो कमाल हो जाएगा....." फिर से राममंदिर का मसला गर्म हो जाएगा और लोग अडवानी के जिन्ना प्रेम को भूल जायेंगे. भाजपा के शिव सेना प्रेम को भूल जायेंगे. बिहारी लोग बाल ठाकरे की लाठियों को भूल जायेंगे.  अगर इस  चुनाव में भाजपाजदयू गंठजोड़ की सरकार नहीं बनी, फिर भी भाजपा अगले चुनाव में, बिना जदयू की बैसाखी के दौड़ सकेगी. कुल मिला कर कमाल हो जाएगा."

सो मेरे प्रिय नेता नीतीश जी परेशान हैं. इधर उनके प्रिय बाहुबली लोग भी बिदक रहे हैं. पिछले चुनावों  में गुंडाराज ख़तम करेंगे के नारे के साथ नीतीश जी ने कितना कितना गुंडों का काया कल्प कर दिया. उनको नेता बना दिया. इस बार तो लालू और पासवान तो हद किये हुए हैं. झटा झट  कुल्ले फोर्सवन  पर कब्जियाते चले जा रहे हैं. हम कौनो राहुल जी तो हैं नहीं न कि सोचेंगे कि कालेज के  पढ़ाकू लड़कों को अपनी पार्टी के लिए न्योता  दें और अपना लुटिया डूबा दें. हमको राजनीती में कोई प्रैक्टिकल  नहीं न करनी  है, बल्कि हमको प्रक्टिकल राजनीती करनी है. और उसके लिए ढेर फोर्सवन चाहिए. राजनीती फ्लोज  फ्राम द  बैरेल  आफ फोर्सवन!

 नीतीश जी को चिंता रामानंद तिवारी को लेकर भी हो रही है. अरे नीतीश भाई तो भाजपा को घुड़का रहे हैं ताकि वह अपने असली चेहरों को बिहार चुनाव में नहीं उतारे  और ई तिवारी जी तड़ाक से बोल दिए कि भाजपा से गठबंधन पर फिर से विचार किया जाये. अरे, तिवारी जी नीतीश जी से दू कदम आगे काहे भागने की कोशिश कर रहे हैं? कहीं फिर से लालू जी की शरण में जानना पड़ जाये. इधर आप फ्रंटियर  मेल बने और उधर नीतीश जी बिजली का कनेक्सने काट देंगे. फिर लारी लप्पा करते रह जाईयेगा.

अब बिहार चुनाव है, कौन दही चूडा  का खेल  नहीं न है. ईहाँ भीषण खेला चलता है. ढेरे रंग का टाकिंग होता है. झूठ पर ऐसा मुलम्मा चढाते हैं कि का कहें. सच तो यहाँ पर बेचारा बना, जनता के पास खड़ा रहता है. और  जनता का वोट भी चोरी हो जाता है और सत्ता बनाने का अधिकार भी. बाद में बल गुलामी करना रह जाता. विकास सिर्फ अखबारी बयान में, सुन्दर सुन्दर अक्षर  में झलकता है. अब अखबार में नेता जी का बयान कहता है कि बिहार तरक्की कर गया है, तो मानना ही पडेगा लेकिन क्या करें अनपढ़ वाईफ जी नहीं न मान रही हैं कि हमलोगन की असल में तरक्की हो गई है.

खैर, तरक्की  की हकीकत कुछ भी हो, चुनाव तक मोदी जी और वरुण जी धैर्य से काम लें और चुनाव के बाद हमरे प्रिय नेता जी उनको  फटाफट  पटना बुला कर चूड़ा  दही खिलायेंगे.  
 


 






































  


































 

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

अर्जुन बनेगें कि रघुवर......कि सिन्हा जी कब्जियायेंगे कुर्सी ?

अर्जुन बनेगें कि रघुवर......कि सिन्हा जी कब्जियायेंगे कुर्सी ?

            सगरो बड़ा छटपटाहट  है...कौन होगा अगला मुख्मंत्री ? इसी पर करते हैं आपसे दस हजार के लिए  सवाल नंबर वन.....अर्जुन का निशाना बेहतर था कि रामचंद्र जी(रघुवर) का? आपके लिए आप्शन है-(ए) दोनों में से किसी का नहीं. (बी) अर्जुन का, अगर निशाना कुर्सी पर साधना हो.(सी)रामचंद्र का, अगर निशाना थैली पर साधना हो (डी)अर्जुन का, अगर निशाना गडकरी पर साधना हो.
            सर, मेरा जवाब साफ़ है कि मैं आप्शन (डी) को मानूंगा क्योंकि इस आप्शन एक साथ दो काम करेगा..अर्जुन की तीरंदाजी भीई पास हो जायेगी और गडकरी का bhii .......

           अरे आप यह क्या कह रहे हैं.....आप सिर्फ आप्शन बोलिए उसे चुनने का कारण मत बताइए....अगर आप कारण बताना शुरू कर देंगे तो सब उल्टा-पुल्टा हो जाएगा...हमारा खेल हंगामे में बदल जाएगा....कुर्सी फिक्सिंग शुरू हो जायेगी. सी.बी.आई. बुला ली जायेगी...लम्बी जाँच चलेगी और सभी अभियुक्त छूट जायेंगे और इस बीच बिना  पैसा लगाये रोज पब्लिसिटी पा लेंगें. राजनीति में उनकी तरक्की  हो जायेगी. सो आप सिर्फ आप्शन बोलिए....

            सर मैं आप्शन (डी) पर अडिग हूँ...मैं कोई लफड़ा मोल नहीं लेना चाहता और आप भी लफडा मोल लेना नहीं चाहते, यह बात मुझे पसंद आई, लेकिन आपने राजनीति से सम्बंधित प्रश्न क्यों  उठाये...

           अरे, अरे आप तो मेरे काम करने की कोशिश कर रहे हैं...प्रश्न करना मेरा काम है और आपका काम सिर्फ जवाब देना है. और मै यंहां का लालू हूँ और जहाँ लालू होते हैं वहां दूरा अगर बोलता है तो उसकी फजीहर निश्चित है, समझे कि नहीं.

          लेकिन एक लघु शंका है....

         अरे, अरे आप हाट कुर्सी पर बैठ कर क्या बोल रहे हैं? आपको फारिग हो कर ही हाट कुर्सी पर आना चाहिए था. फिर भी आप  क्या कहना चाहते हैं जल्दी कहिये....

         सर जी, आपने महामना सिन्हा जी को चीफ मिनिस्टर के आप्शन में क्यों नहीं रखा? वे भी थो कुर्सी पाने के लिए चत्पताये हुआ हैं...

         मै ज्यादा पालिटिक्स नहीं जनता.... एक बार अक्तिव पालिटिक्स में कूदा था और एक अच्छे दोस्त को खो बैठा...यूपी का ब्रांड अम्बेसडर बना और फिर से विवादों में घिर गया...फिर पर्लती मरी और गुजरात का ब्रांड अम्बस्दर बन गया. पता नहीं अब क्या होगा, लेकिन जब अपर्णा सर ऊखल में डाल ही दिया है तो मूसल से क्या डरना...

         खैर, पचास हजार के लिए यह रहा अगला प्रश्न - क्या नीत्तीश जी ने बिहार को सेंटर के पैसे से तरक्की दी या या फिर कोई और ट्रीक  अपनाया?

         सर जी, आपने फिर से राजनीतिक प्रश्न ही परोस दिया है...मैं फिर बोलूँगा तो आप कहेंगे की मेरा बोलने का काम नहीं है, यश काम सिर्फ और  सिर्फ आपके और नेताओं का काम है...आप जनता हो और नीतीश जी को सुन कर जाँ लो कि आपकी कितनी तरक्की हुई है....उनकी इस्पीच से पता चलता है की बिहार और उसकी जनता की तरकी इतनी हुई है, इतनी हुई है कि लोगों की आँखें चौंधिया गई हैं और लोग कुछ देख और सुन नहीं पा रहे हैं...मैं तो सदमे में  हूँ यह जाँ कर कि मेरे बेजोर तरक्की हो गई है...अरे सर जी मैं तो यहाँ आने से पहले अपनी का गहना बेच कर आया हूँ और अगर फेल कर गया तो फिर किसी दूसर राज्य में जा कर रोजी रोटी तलाशनी होगी और अगर मुंबई जाने की नौबत आई तो नीतीश जी के गठबंधन के शिव सैनिको के जूते खाने के लियेया सम्मान के साथ तैयार रहना होगा......


         




























          

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

अमिताभ बच्चन झारखण्ड पुलिस के मुखबिर!

ओपरेशन डिवाइड:एक अफसाना मुखबिरी पर!



"मैं गोपनीय सेवा राशि हूं…मैं किसी की सेवा नहीं कर सकती हू्…आला अधिकारी मुखबिर की मुखबिरी को तौल कर मेरा एक छोटा सा टुकड़ा दे देते है…मुखबिर आम तौर से एक गरीब, दबा-कुचला आदमी होता है, जो अपनी जान पर खेल कर अपराधियों की सूचना अधिकारियों को देता है। आम तौर से मुखबिरी के बाद, अगर वह जिन्दा बच गया तो, एक लाख की प्राप्ति रसीद पर अपना दस्तखत कर दस हजार रुपए भी जेब में डालते हुए, अपने आप को भाग्यवान मानता है।"

          "एक बार मैं एक्सपायरी डेट के निकट थी और मेरे आला अधकारी भी! सो उनको टुकड़े-टुकड़े कर मेरा
हिसाब बैठाना था। आला अधिकारी जी मुझको देखते और खूब गालियां निकालते-मनहूस, तुमको बंटते हुए अपनी
थैली भरने के लिए कोई मुखबिर नहीं मिल रहा…वैसे, एक मुखबिर को बुलाया है और उसके अनेक शुभ नाम तय
करने के लिए नाम बाबा को भी आमंत्रित किया है। नाम बाबा कुछ ले दे कर उस मुखबिर के एक दर्जन शुभ नाम घोषित कर देंगे…फ़िर वह प्राप्ति रसीद पर, कभी अमिताभ तो कभी हेमामालिनी के नाम पर धन प्राप्ति की बहुत सी
रसीदों पर दस्तखत मार देगा और धन की थैली मेरे ही हाथ में रह जायेगी! अरे, पहले के मुखबिर बड़े भोले-भाले
होते थे…उनको हम जहां हुक्म देते थे, वे वहीं दस्तखत या अंगूठा ठोंक देते थे…और ये अब के मुखबिर, बड़े चंट होते हैं, आडिटरों से भी अक्खड़ होते हैं…क्या मजाल की बिना रसीद ठीक से पढे रसीद पर गुग्गी या अंगूठा ठोंक दें…।"

         "खैर एक भयावह रात को जब बिजलियां कड़क रही थीं …चमगादर पर फड़फड़ा रहे थे…तभी मेरे आला
अधिकारी आये और मुझे कई टुकड़ों में बांट कर अलग-अलग पैकेटों में डाल दिया। सबसे छोटे पैकट पर लिखा गोलू मुखबिर ! साथ ही शुरू हो गई ओपरेशन डिवाइड!"

        "गोलू मुखबिर के सामने आला अधिकारी का बिगड़ैल हाउंड रह रह कर भौंकता और गोलू की और खूंखार
इरादे से झपटता। दो सिपाही बंदूक ताने ख्ड़े थे…एक सिपाही अपने हाथ में अलग-अलग किस्म की कलम रखे हुए
था…आला जी ने कड़कती आवाज में गोलू से पूछा-तुमने अपने बारहों नाम के दस्तखत करने की प्रैक्टिस कर ली है? बेचारा गोलू अपना सिर हिला कर रह गया…ऐसी परिस्थिति में मुखबिर की बोलती बंद हो जाती है।"

         "खैर, गोलू गवाह ने सबसे अंत में अपने असली नाम की रसीद पर दस्तखत किया और पूरी ईमानदारी के साथ आला जी ने गोलू को सबसे हेल्दी पैकेट पकड़ा दी…वैसे, गोलू को राशि का दस प्रतिशत दो सिपाहियों के लिए
ढीले करने पड़े।"
        "खैर, मैं टुकड़े- टुकड़े बंट गयी और मेरे टुकड़े के टुकड़े नीचे तक के अधिकारियों तक पहुंचे…वे लोग बहुत
कर्तव्यनिष्ठ थे-ठीक 10 बजे तुम्हारे ठिकाने पर छापा पड़ेगा…समझे कि नहीं?"

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

ओके.....हिंदी जब हम लोगों का मदर टंग है तो

राष्ट्रीय दल का कार्यालय....और लोकल समस्या पर छुटभैये नेता टाकिंग कर रहे थे...एक ने कहा ए गो समस्या का प्राब्लम रहे तो बात है, यहाँ तो केतना केतना साल गुजर गया एक बार भी लारिलप्पा नहीं किये...बिना एम टानिक के अब एक्को दिन नहीं चलेगा....बीच में थोड़े दिनों के लिए इनडैरेक्ट  मौको मिला तो बड़कन नेता लोग टकसाल ऊपरे-ऊपरे ले उड़े...यहाँ  वर्कर का तो कोई महत्व का इम्पोर्टेंस  नहीं है....

            दूसर छुटभैये ने कहा," अरे का बतियाते हो तुम...हम नहीं जानते हैं कि  'के  राज' में तुम केतना लारीलप्पा किए हो ? उ जे तुमारा बसवा चल रहा है उ का तुमरे कमाई का है? का उ ऊपरे से सड़कवा  पर टपक गया ?'

         तभी एक लल्लू जी आये और अखबार दिखलाते हुए पूरी बौद्धिकता के साथ बोले,'अरे तुम लोगन सिर्फ अपनी समस्या के प्राब्लेम पर टाकिंग पर टाकिंग कर रहे हो...ज़रा ई खबरवा तो पढ़ो...केंद्र में हमरा राज है और केंद्र का परतीनिधी हमरे नेतवा का सुनबे नहीं  करता है. उ जो सुनता है तो सिर्फ मंत्री भैया का ही सुनता है...लेकिन अब नया रिप्लेसमेंट आयेगा...जो सिर्फ हिन्दी जानेगा और कुच्छो  नहीं और हमरे नेता जी को सुनेगा... और मंत्री भैया जी को घासे नहीं डालेगा....समझे... इसको कहते हैं राष्ट्रभाषा का राजनीतिक यूज ....देखो,  मंत्री  भैया जी भी अंग्रेजी नहीं जानते हैं और फिर भी जब बोलते हैं तो हमरे अंग्रेजी के टीचर जी हँसते हैं.. लेकिन उनका दिल्लीवाली  हिंदी का  स्पोकेन केतना अच्छा है...अभियो जा के तुम लोगन हिंदी फ्लूएंट स्पीकिंग  के लिए दिल्ली वाली हिंदी का स्पोकेन क्लास करो...और नहीं सीखोगे तो खेतवा में ग्रेज़िंग  करते रह जाओगे...बूझे कि नहीं बूझे ?'
       मुरली जी ने अपनी मुरली बजाई," हाँ ई तो सेंटे परसेंट ओके है कि हिंदी जब हम लोगों का मदर टंग है तो सीखना ही होगा. मेरे को भी सीखने का मन है, उ भी दिल्ली वाला हिंदिये...थोड़ा डिफीकल्ट है लेकिन  इंगलिश जेतना डिफीकल्ट नहीं....हम तो देल्लीए वाला  हिंदी का प्रैक्टिस करबे करते हैं....प्रैक्टिस  विल मेक योर हिंदी परफेक्ट...अंडरस्टैंड  किये कि नहीं?"

         एक छुटभैया जी से रहा नहीं गया,"देखो बस स्टैंड के एजेंट जी, यहाँ आला जी हिंदी जानते हैं कि नहीं, इसका कौनो सवाले में क्वेश्चने  नहीं उठाता है. सवाल में क्वेश्चंवा  ई है कि 'के -कांड' का  सी बी आई से जाँच काहे हो रहा है...ई जांच का फंदवा तो सभ्भे पार्टिया के बड़कन नेतवन   पर परबे  करेगा...चार पार्टी  का सिंडीकेट बना है ताकि "के कांड" की जाँच से बचने का रस्तवा तलाशा जाये....अंडरस्टैंड कि नहीं अंडरस्टैंड?

सोमवार, 23 अगस्त 2010

लेकिन जो कुछ हुआ अच्छा ही हुआ !




रांची में "भास्कर" के उदय होने से पहले मुझे जिसकी आशंका थी वही हुआ-अन्य हाफ रेट पर स्वयं उतर गये!  वे पहले ग्राहकों से ज्यादा पैसा क्यों लेते थे, यह नहीं पूछ्ना चाहता हूं क्योंकि, मैं दिये गए पैसे वापस नहीं मांगता। खैर, रांची में जिस रणनीति के साथ नये समाचार पत्र का स्वागत होता है, उसी रणनीति के साथ "भास्कर" का स्वागत हुआ। लेकिन, जो कुछ हुआ, अच्छा ही हुआ! किन्तु, एक बात सोचने की है-ऐसी रणनीति वे भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए क्यों नहीं बनाते है? कहां चली जाती है उनकी आन्दोलनकारिता जब झारखड में भ्रष्टाचार की गंगा
बहने लगती है? अरबों रुपयों की लूट के बाद जब कोई भ्रष्टाचार दूसरे माध्यम से उजागर हो जाता है तो, कलमची अचानक आंदोलन करने लगते हैं…लगता है कि वे गंगा स्नान कर लेने के बाद, कुछ दान करने के मूड में आ जा जाते हैं!


           रांची में पत्रकारिता को अनेक तरह से प्रदूषित किया गया है-वैचारिक प्रदूषण के साथ-साथ प्रदूषणकर्ताओं ने कश्य्प काउंटर या कोडा काउंटर से भी बहुत कचरा उठा कर पत्रकाफ़िता में डाला है! यहां नक्सली फूले फले, आम आदमी सूखते गये…यहां साम्प्रदायिकता पनपा और उसमें खाद-बीज डाल कर माननीय भी कहला गए। हर पांच पदस्थापन में से, दो पर तो उनका ही हक बनता रहा। जनता के नाम पर आंदोलन करते-करते वे बड़े रईश हो गये…बड़े उद्योगपति हो गये…और जनता ठगी का शिकार हो गयी!


          गरीब चोर चोरी करे तो खूब शोर किया और पावर हाउसों ने लूट की तो उनकी मलाई मारी चाय पीते रहे। सिपाहियों को ट्रक ड्राइवरों से बीस रुपये सड़क-टैक्स वसूलने की तसवीरें छापी गईं और अरबों की लूट पर खबर आम होने तक मौन व्रत में रहते रहे और जैसे ही उनके बिना प्रयास के कोई समाचार या कोई दबाया गया सच सामने आया तो, वे ब्रेकिंग न्यूज देने लगे ! जैसे पुलिस से विधिवत जारी समाचार को कोई ब्रेकिंग न्यूज की संज्ञा दे रहा हो!


           एक बार शहर के लोग डर गये-धारावाहिक समाचार आ रहा था कि रांचीवासियों को प्रदूषित पानी नल के द्वारा पिलाया जा रहा है। समर्थन में जांच रिपोर्ट भी छापी गई। पंद्रह दिनों तक रांची के लोग हैजा और अन्य खतरनाक बीमारियों के संभावित खतरे के बीच परेशान रहे। किसी ने हेमामालिनी द्वारा प्रचारित वाटर प्यूरिफायर खरीदा तो किसी ने और ब्रांडों के। यहां वाटर प्यूरिफायर खूब बिके…कुछ लोगों ने तो अपने बच्चों की किताबें नहीं खरीदीं, लेकिन वाटर प्यूरिफायर जरूर खरीद लिया! पर रांची के लोग तब अचंभित रह गये, जब जांच रिपोर्ट छापने
वाले ने ही कह दिया की जांच की रिपोर्ट ही प्रदूषित थी! नल से तो शुद्ध मिनरल वाटर सप्लाई हो रहा था! वह बड़ी हेल्दी रिपोर्टिंग थी और रिपोर्ट लिखने वाले का हेल्थ भी खूब सालिड देखा गया!


          एक बार ज्ञानरंजन चुनाव लड़ रहे थे। तभी उर्दू में एक पर्चा वितरित किया गया। उसमें कहा गया था कि ज्ञानरंजन का असली नाम विजयरंजन है, जिसे एक बार दंगा कराने के कारण के आरोप में पुलीस ने गिरफ्तार किया था। जब उस झूठे पर्चे का सच एक ने सामने ला कर रख दिया तो उसे नौकरी से हाथ गंवानी पड़ी और अपनी नवजात बच्ची को दूध के बिना बिलखते देखना पड़ा। किसने लिखा और छापा था यह पर्चा? क्या झूठे पर्चे का प्रकाशन जनहित या लोकतंत्र के हित में है?


          महोदय, यहां स्वहित की नहीं जनहित वाली पत्रकारिता की जरूरत है…पत्रकारिता के नाम पर कथित आंदोलन चलाने की नहीं। समाचार पत्र को अगर समाचार पत्र ही रहने दिया जाए तो अच्छा होगा।








रविवार, 22 अगस्त 2010

कामन वेल्थ गेम का घोटाला हमारे लिए पर्सनल एंड पालिटिकल वेल्थ साबित होगा

भ्रष्टाचार पर एक महामानव भाषण दे रहे थे- सोनिया जी देखें, कलमाडी जी ने कितना लूटा है और कितना लुटाया है. देखिये, हम तो इस मामले में ज़रा जोर दे कर बोल नहीं रहे हैं. मामला बड़ा सीरीअस है. इस कामन वेल्थ गेम से हमारे देश की प्रतिष्ठा जुडी है. आप जानते ही हैं कि हमारी पार्टी पूरी तरह दूध से धोई है.

          देखिये, यह बात सच है कि  मेरे तीस पैंतीस सांसद प्रश्न के बदले घूस लेते हुए पकडे गए थे. पूरी दुनिया ने उनको टीवी पर घूस लेते देखा था. लेकिन, यह मामला ज्यादा दिनों तक पब्लिक के बीच में नहीं टिका. हम खुश नसीब हैं कि हमारे विरोधियों  को किसी  मामले को लंबा खींचने का टेक्नीक  मालूम ही नहीं है. वे गोएबोल्स जी को कभी अपना भगवान् या गुरू मानते ही नहीं. खैर, हमारे उन सांसदों के खिलाफ घूस लेने का  मामला प्रमाणित था, सो हम लोगों ने उन सांसदों के खोने का गम नहीं मनाया. एक दम से गुमसुम रह गए.

          हाँ, मैं आज जिस कुर्सी पर बैठा हूँ, उसी कुर्सी पर बैठे, मेरे एक पूर्वर्ती  राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी पूरी दुनिया ने घूस लेते हुआ देखा. उनका भी बोरिया बिस्तर हमने बांध कर नागपुर पार्सल कर दिया. उस समय भी हमने कुछ नहीं कहा. लेकिन, कलमाडी के मामले में तो हम ने साफ़ साफ़ कहा है कि दोषी के खिलाफ ठोस कार्यवाही  हो. अब सोनिया जी पर डिपेंड  करता है  कि वे कब घोटाले  की जाँच करवाती हैं और कब कलमाडी को कमंडल पकड़ाती  हैं. जाँच-वांच  का काम हमारे मुताबिक़ ही सोनिया जी गेम हो जाने तक रोके रखना चाहती हैं. यह तो हमारे हक़ में है. इस कामन वेल्थ गेम का घोटाला हमारे लिए पर्सनल  एंड पालिटिकल वेल्थ साबित होगा.

          हाँ, हम इस मामले को बिहार चुनाव में जोर दे कर उठाएँगे, क्योंकि अभी इस पर ज्यादा जोर  मारने से एक बड़ा मामला चुनाव के पहले ही हवा में गुम हो जायेगा. सो,  अभी हम इस मामले को हल्का हल्का सुलगाये  रखेंगे. जिन्दा रखेंगे. ठीक बिहार चुनाव के समय हम इस मामले को तोप के आगे रख कर, बिहार में उछाल देंगे. यह सालिड मामला है. जब हम बोफोर्स तोप पर एक चुनाव जीते थे,  तभी हम समझ गए थे कि पब्लिक आरोप में विश्वास करती है, अफवाह में विश्वास करती है, वह कोर्ट के फैसले से पहले हमारे फैसले को तरजीह देती है. विश्व के किसी भी लोकतंत्र में ऎसी जनता नहीं मिलेगी. हम खुश नसीब हैं.

       देखिये, हम जानते थे कि बोफोर्स मामले में कोई नहीं फंसेगा, लेकिन  हमने उस मामले को सच साबित करने के लिए भ्रष्टाचार के  अमाउंट से चार गुना ज्यादा पब्लिक का पैसा खर्च कर दिया, तो कर दिया. जब तक मामले पर जाँच चलती रही मामला गर्म रहा और बेचारे राजीव जी पर लोग शंका करते रहे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बोफोर्स मामले में राजीव जी को दोषी नहीं ठहराया और न क्वाचेत्री को. जब हमारे हाथ में सी बी आई थी, तब भी हम प्रमाण खड़ा या पैदा नहीं कर पाए.  लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी हम जब चाहते हैं, बोफोर्स की बात करते हुए  थकते नहीं हैं.

          हाँ,  उस समय जरा जी घबराया था, जब एक विदेशी कोर्ट ने बोफोर्स केस के एक  अभियुक्त को बिना सबूत के गिरफ्तार करने की हमारी सरकारी एजेन्सी की मांग पर जुर्माना लगा दिया था. हम तब भी ज़रा घबराये थे जब इसी मामले में अजीताभ बच्चन ने इंग्लॅण्ड के एक कोर्ट में  कुछ समाचार पत्रों पर केस कर दिया था और समाचार पत्रों ने फटा-फट मान हानि का जुर्माना भर के छुट्टी पा ली थी. लेकिन, पब्लिक मेमोरी पर हमको पूरा भरोसा था. पब्लिक की मेमोरी बड़ी शार्ट होती है. और हमारा अनुमान ठीक ही निकला. लोगों ने इस फैसले पर ध्यान ही नहीं दिया. सो आज भी हम बोफोर्स पर बोलते हैं.

          हाँ, इसी मामले को उठाते हुए एक दलबदलू  नेता ने जोश में बड़ी गड़बड़ी कर दी थी- कह दिया था,"हमारी सरकार बनी तो मै बोफोर्स घोटाले से जुड़े सारे नामों को सरकार बनने के सात दिन के अन्दर जारी कर दूंगा. घोटालेबाजों की लिस्ट मेरी जेब में है." लेकिन, कोई लिस्ट उनके पास नहीं थी.  पब्लिक की मेमोरी बड़ी शार्ट होती है, सो किसीने नेता जी के वादे को ज्यादा याद नहीं किया. 

         देखिये, भ्रष्टाचार कई तरह के होते हैं. सिर्फ पैसों की लूट को आप भ्रष्टाचार क्यों मानने की गलती करते  हैं ?. राजनीतिक भ्रष्टाचार पर भी मेरे विचार और नीति बहुत ही स्पष्ट है. ज़रा सुनिए,  अयोध्या मामले पर हमने  कितना शोर मचाया. उससे अधिक हमारे विरोधियों ने शोर मचाया.  हम चाहते थे कि हमारे विरोधी इस मामले में सच बोलते हुए हमारे खिलाफ खूब बोलें, खूब शोर मचाएं और सभी विरोधियों ने वैसा ही किया.  वे खूब बोले. बस हमारा काम बन गया. इस मामले पर हमने खूब वोट काटा. ऐसे राजनीतिक भ्रष्टाचार को  आज की राजनीति कहते हैं. सो सिर्फ भावना भड़का कर वोट लेने की जो हमारी तरकीब थी, जो नीति थी, वह गोएबेल्स महोदय की कृपा से पूर्ण हो गयी.

        अब आपको बता दें कि हमारी सफलता का राज है, प्रचार पर ध्यान देना और थेथरोलाजी से काम लेना। जब नेता थेथरोलाजी से काम लेता है तो जनता पर बार बार दबाव पड़ता है। हम जितनी बार अपनी बात को दुहराते हैं उतनी ही बार जनता भ्रम में पड़ जाती है और सोचने लगती है कि जब कोई इतने दम के साथ कुछ बोल रहा है तो कुछ न कुछ तो जरूर सच है। और यही हमारा फंडा है।