शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

लोहिया के लोग भाजपा की गोद में

               नेता  जी बहुत सावधान हैं, एक भी अल्पसंख्यक का वोट हाथ से निकलना नहीं चाहिए....मोदी आ जाते तो गजब हो जाता. अगर सांप्रदायिक भाजपा मोदी को बिहार बुला लेती तो, मैं तो अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लेता ही तिवारी जी, लेकिन क्या करें, अकेले चुनाव जीतना आसान नहीं न है, सो भाजपा के साथ अभी कुछ दिनों तक तो चलना ही पडेगा. लेकिन ध्यान रहे, कोई भाजपा का नेता हमारे उम्मीदवारों के क्षेत्र  में पैर न धरे, खाश कर मुस्लिम इलाकों में.जब देखो राम नाम जपते रहते हैं, जब कि चुनाव के समय में उनको वोट-वोट जपना चाहिए . ये हाफ  पैंट और खाकी  टोपी वाले एक नए टाईप के हिन्दू हैं. हम तो ठहरे खांटी लोहियावादी समाजवादी, सो कैसे इनको बर्दाश्त कर सकते हैं. अगर अभी कर रहे हैं, तो मतलब साफ़ है कि सत्ता  के लिए जहर पीना ही पड़ता है. अब लोहिया जी आत्मा नाराज हो या जो हो, इतने वर्षों से तो हम इन बवालियों  के साथ ही चल रहे हैं. लेकिन  बड़ी सावधानी की जरूरत  है...एक  दो ऐसे भी पाजी हैं, जो रोज दिन बोल रहे हैं कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं....जिस दिस ऐसा हो गया तो हम क्या मुह ले कर स्वर्ग में लोहिया जी के सामने जायेंगे?

               तिवारी जी रुष्ट हो कर बोले," देखिये, राहुल बिहार में अकेले चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा रहे हैं, तो हम इन साम्प्रदायिक तत्वों से अलग हो कर चुनाव क्यों  नहीं लड़ सकते हैं ? १९77  से हम लोग कई पार्टियों में  आते जाते रहे हैं. सो हमारा अनुभव है राजनीति  डील करने का. अगर हमें पूर्ण बहुमत न भी आते  तो हम कांग्रेस से  सहयोग ले सकते हैं. लालू से नहीं लेते तो कम से कम हम लोजपा का दरवाजा तो खटखटा सकतेहैं. हम कब तक मोदी एंड पार्टी का दबाव झेलते रहेंगे?
          नेता जी कहिन, अरे तिवारीजी,  ई तो हम भी जानते हैं कि समझदार मतदाता समझता है कि हम लोग घुमा फिरा के आरएसएस के साथ हैं, लेकिन जाहिल वोटरलोग  ई बतवा  नहीं न जानता है. मोदी को बिहार आने से रोक के सब जाहिल वोटरों का हमने मन जीत लिया है, समझे? इतना ही नहीं, हमने तो प्रथम चरण के चुनाव में रथवाले अडवाणी को भी बिहार आने से रोक दिया है. उ यहाँ आता और फिर से राम मंदिर, राम मंदिर  रटने लगता....गडकरी भी उस बुढवा को नहीं  देखना चाहता है. सो गडकरी मेरी बात मान कर अडवाणी जी का कार्यक्रम बदल दिए हैं.
         तिवारी जी का क्रोध फिर भी कम नहीं हो रहा था-अरे जब हम लालू के साथ थे, तब उसके 'माई' से परेशान थे और अब भाजपा के भगवाधारियों से. पता नहीं ये कौन ब्रांड के हिन्दू हैं. कभी जिन्ना की जय करते  हैं  तो कभी राम की. अडवाणी और जशवंत ने जिन्ना  को कितना हाईलाईट किया, लेकिन  लोहिया के बारे में कुछ भी नहीं  लिखा और किताब  पाकिस्तान में बेच के पैसा भी खूब  टान लिया. सोचते हैं क़ि हम भी एगो किताब लोहिया पर लिखिए दें- लोहिया के लोग भाजपा की गोद में.
         
            

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