तिवारी जी रुष्ट हो कर बोले," देखिये, राहुल बिहार में अकेले चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा रहे हैं, तो हम इन साम्प्रदायिक तत्वों से अलग हो कर चुनाव क्यों नहीं लड़ सकते हैं ? १९77 से हम लोग कई पार्टियों में आते जाते रहे हैं. सो हमारा अनुभव है राजनीति डील करने का. अगर हमें पूर्ण बहुमत न भी आते तो हम कांग्रेस से सहयोग ले सकते हैं. लालू से नहीं लेते तो कम से कम हम लोजपा का दरवाजा तो खटखटा सकतेहैं. हम कब तक मोदी एंड पार्टी का दबाव झेलते रहेंगे?
नेता जी कहिन, अरे तिवारीजी, ई तो हम भी जानते हैं कि समझदार मतदाता समझता है कि हम लोग घुमा फिरा के आरएसएस के साथ हैं, लेकिन जाहिल वोटरलोग ई बतवा नहीं न जानता है. मोदी को बिहार आने से रोक के सब जाहिल वोटरों का हमने मन जीत लिया है, समझे? इतना ही नहीं, हमने तो प्रथम चरण के चुनाव में रथवाले अडवाणी को भी बिहार आने से रोक दिया है. उ यहाँ आता और फिर से राम मंदिर, राम मंदिर रटने लगता....गडकरी भी उस बुढवा को नहीं देखना चाहता है. सो गडकरी मेरी बात मान कर अडवाणी जी का कार्यक्रम बदल दिए हैं.
तिवारी जी का क्रोध फिर भी कम नहीं हो रहा था-अरे जब हम लालू के साथ थे, तब उसके 'माई' से परेशान थे और अब भाजपा के भगवाधारियों से. पता नहीं ये कौन ब्रांड के हिन्दू हैं. कभी जिन्ना की जय करते हैं तो कभी राम की. अडवाणी और जशवंत ने जिन्ना को कितना हाईलाईट किया, लेकिन लोहिया के बारे में कुछ भी नहीं लिखा और किताब पाकिस्तान में बेच के पैसा भी खूब टान लिया. सोचते हैं क़ि हम भी एगो किताब लोहिया पर लिखिए दें- लोहिया के लोग भाजपा की गोद में.
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