गुरुवार, 5 अगस्त 2010

महंगाई के पीछे किस किस के हाथ

      महंगाई  को लेकर बहुत सी पार्टियों के नेता लोग अपनी छाती पीट रहे हैं. महंगाई के मसले पर महंगी से महंगी रैलियां निकाल रहे हैं. हर रैली के बाद बड़े-बड़े प्रेस कन्फेरेंसे कर रहे हैं, ताकि उनका मुखड़ा छपे और उनका वक्तब्य भी. पर सवाल है कि महंगाई किसने बढाई है ? अमेरिका की मंदी ने या फिर पिछले साल की कम वर्षा ने ? शायद, दोनों ने या सचमुच  दोनों ने?  क्या विश्वभर में फैली मंदी का कुछ असर भारत पर भी पडा है?  प्रश्नों के जवाब जो भी हों, यह बात तय है कि  इन पार्टियों को जब कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं मिल रहा था, तब इन पार्टियों ने   महंगाई के नाम पर राजनीतिक रोटियां  सेंकिनी शुरू कर दी.
      लेकिन, काम करने वाले प्रधानमंत्री ने इन पार्टियों के नेताओं को महंगाई के मुद्दे पर, इससे निजात पाने के लिए उपाय सुझाने का निवेदन किया तो, ये अगल-बगल झाँकने लग गए! आलोचना करना आसान है, लेकिन कुछ कर के दिखाना आसान नहीं.
      भाजपा के शासन काल में  एक वित्तमंत्री जी थे, यशवंत सिन्हा जी. ये महोदय चंद्रशेखर सरकार में भी वित्त मंत्री थे. और ये जनाब जब भी वित्त मंत्री बने देश को कंगाल बनाने का काम किया. तब  वाजपेयी  जी  ने इनको देश का अहित करने वाला वित्त मंत्री कहा. बाद में, जब सिन्हा जी भाजपा की शरण में आ गए तो बाजपाई जी ने इनमें न जाने कौन सा गुण देख लिया कि  इनको देश का एक बार फिर से वित्त मंत्री बना दिया. लेकिंग जल्दी ही,  इनके काम काज  की देश भर में इतनी तीखी आलोचना हुई कि बाजपेयी जी ने उनको वित्त मंत्री के पद से हटा दिया और अपने चहेते और जिन्ना समर्थक  जसवंत सिंह को वित्त मंत्री बना दिया. दोनों के नाम में ज्यादा का अंतर नहीं था और काम करने के अंदाज में भी. जब बाजपेयी जी का शासन शाइनिंग इंडिया के स्लोगन के साथ डाई आउट कर गया तो, मनमोहन सरकार ने देश की वित्तीय  स्थिति को सम्हाला. लेकिन, मजे की बात है आज यशवंत सिन्हा जी भी महँगाई पर भाषण झाड़ रहे हैं. वित्त व्यवस्था के वे इतने बड़े जानकार हैं  तो, उनको यह बताना चाहिए  कि किन किन गलत नीतियों के कारण आज भारत में महंगाई है. इस महंगाई के पीछे पूर्व की सरकारों की किन किन गलत नीतियों का हाथ है और उसमे एक असफल वित्त मंत्री के रूप में उनका कितना हाथ है ? महंगाई की प्रक्रिया एक दिन या  दो चार वर्षों कि वित्त व्यवस्था  से ही नहीं प्रभावित  होती है, उसके पीछे लम्बे अतीत की वित्त ब्यवस्था और कुछ अन्य तथ्य भी शामिल होते हैं.
       विपक्ष का काम है, तथ्य के आधार पर  आलोचना करना लेकिन,  कुतर्क करना और लगातार कुतर्क करते रहना, विपक्ष का काम नहीं है. विपक्ष ने महँगाई के नाम पर देशव्यापी  बंद कराया, उससे देश की जनता को इस महँगाई में १३ हजार करोड़ की हानि उठानी पड़ी. हजारों दैनिक मजदूरों और फेरीवालों के घर में बंदी के दिन चूल्हे नहीं जले. उन ग़रीबों का क्या कसूर था जो आज कमाते हैं और आज खाते हैं. बंदबाज नेताओं के लिए तो उनके  भारत बंद ने, उनको समाचार पत्रों में लीड स्टोरी बनाने की ख़ुशी दी. ग़रीबों को एक रात भूखे सोने से उनको  क्या फर्क पड़ता है. उनको तो जनता की भावना को भड़काना था. अपना भाव जमाना था. उनको जमीनी हकीकतों से क्या लेना देना.  आखिर ऐसे विपक्ष को क्या कहा जा सकता है ? गैरजिम्मेदार? नाकाबिल ?  शायद, वे इन टिप्पणियों के भी काबिल नहीं हैं.
       क्या कारण है की विपक्ष के पास आज कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है ? वस्तुतः भाजपा हो या लेफ्ट पार्टियाँ, जदयू हो या सपा, बसपा हो या राजद, सभी पार्टियाँ अपने अन्दर के झमेलों से परेशान हैं. भाजपा एक अनुभवहीन, आर.एस.एस. द्वारा थोपे गए नेता नितीन गडकरी  के हाथ में है. उनको पता  ही नहीं  है कि उनको करना क्या है और क्या नहीं करना  है. वे एक कस्बाई नेता की तरह व्यवहार  कर रहे हैं.
        जदयू में अध्यक्ष शरद पावर और बिहार के मुख्यमंत्री तथा जदयू के नेता नीतीश जी में  नहीं पट नहीं  रहा है. नीतीश शरद के चहेते और भाजपा के पोस्टर नेता मोदी जी के खिलाफ अभियान  चलाये हुए हैं. नीतीश को बिहार चुनाव में मुस्लिम वोट बचाने की फ़िक्र है तो शरद को अपने क्षेत्र के लिए हिन्दू वोट बचाने की फ़िक्र है.
राजद और लोजपा के सामने अस्तित्व का संकट बना हुआ है.
         राजद को मिला राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा, चुनाव आयोग ने समाप्त कर दिया है, लेकिन लालू जी इंटरनॅशनल गुरु हैं, उनको इसेसे  क्या फर्क पड़ता है? वे जमे हुआ हैं और एक साथ सभी दलों को झटका देने के फ़िराक में हैं, केवल लोजपा को छोड़ कर. लालू जी ने अपने कल के दुश्मन नंबर वन पासवान  जी को अपना हमदम बना कर, कल को भुला दिया है.
          दूसरी ओर,  नीतीश जी तो  चुनाव में उन  दोनों की दुश्मनी की कहानियों और उनके द्वारा एक  दूसरे के खिलाफ  दिए गए पुराने बयानों  को फिर से हरा तो करेंग ही. कल के साथी और तीनतिलंगे के नाम से मशहूर नीतीश, लालू और पासवान, एक दूसरे की  मजबूतियों  और कमजोरियों को बखूबी जानते हैं. सो चुनाव संग्राम शुरू होते ही वे एक दूसरे के खिलाफ पोल खोलो अभियान  शुरू कर देंगे. कोई लोकलिहाज़ की वे परवाह नहीं करेंग. और चुनाव अभियान पूरी तरह से सच्चे-झूठे आरोप अभियान में तब्दील हो जायेगा.
       लालू और पासवान तो नीतीश राज के  ग्यारह हज़ार करोड़ के घोटाले पर अपनी हवा बनाने की कोशिश करेंगे और मतदाताओं के सामने  नीतीश की मुस्लिम नीति की धज्जियाँ उड़ायेंगे. नीतीश चारा घोटाले  की जिक्र करेंगे तो लालू और पासवान कहेंगे कि नीतीश तो इंसानों का चारा हजम कर गए, बाढ़ और सुखाड़ के धन को भी लूटा. यानी सभी एक दूसरे की खूब बखिया उधेरेंगे. एक दूसरे पर कीचड़ के गोले दागेंगे. काफी गंदगी फैलेगी. काफी मनोरंजन भी होगा. झूठ बोलने की एक लम्बी प्रतियोगिता शुरू हो जायेगी. छुटभैये नेता लोग भी चक-चक कपड़े पहन कर वक्तव्यों  की बाँग लगाने लगेंगे.
       शब्द सस्ते हो जायेंगे और लोकतंत्र कुछ और बदनुमा हो जायेगा. फिर एक नई सरकार बनेगी...फिर लूट का एक नया खेल, नयी लूट के लिए शुरू हो जाएगा. फिर कुछ नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण देंगें और नए तरीके से भ्रष्टाचार  शुरू कर देंगे. लेकिन कब तक चलेगा यह सिलसिला? शायद, तब तक जब तक जनता जाति, धर्म,भाषा, क्षेत्र, आदि से ऊपर उठ कर, अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करेंगे.

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