गुरुवार, 16 सितंबर 2010

नीतीश: गुड खायेंगे लेकिन गुलगुल्ला नहीं?

नीतीश: गुड खायेंगे लेकिन  गुलगुल्ला नहीं?
बिहार में चुनाव सर पर है और हमारे नेता नीतीश जी परेशान हैं. कहीं भाजपा अपने असली चेहरों, नरेन्द्र मोदी और वरुण गांधी को चुनाव प्रचार में न उतार दें. लुटिया ही डूब जायेगी. सत्तर प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट का कबाड़ा बोल जाएगा. नीतीश जी गुड खाने में एक्सपर्ट हैं, लेकिन उनको गुलगुल्ला नहीं पचता है. संविधान में  लिखा है कि इस देश में हर नागरिक को अपनी बात किसी भी शहर गाँव में जा कर व्यक्त करने की छूट है. लेकिन अब चुनाव पर हमरे नेता जी संविधान की  फ़िक्र करने लगेंगें तो हो गया चुनाव.बस  चुनाव के कारण ही   नीतीश जी मोदी जी और वरुण जी को उनके संवैधानिक अधिकार से जुदा कर रहे हैं. अमेरिका ने भी मोदी जी को अमेरिका जाने का वीसा नहीं दिया था. नीतीश जी अमेरिकी वाला  चल रहे हैं. वैसे, बाद में, अगर उनका हाथ किसी मंच पर मोदी जी धर कर हवा में लहराने लगेंगे तो उ अपना हाथ क्यों पीछे खींचेंगे? उस समय बिहार चुनाव समाप्त हो चुका होगा और अल्पसंख्यकों के वोट कौन्त हो चुके होंगें. 

लेकिन, नीतीश जी की सहयोगी भाजपा सोचती है कि अगर उनके असली चेहरे सामने आ जायें तो कमाल हो जाएगा....." फिर से राममंदिर का मसला गर्म हो जाएगा और लोग अडवानी के जिन्ना प्रेम को भूल जायेंगे. भाजपा के शिव सेना प्रेम को भूल जायेंगे. बिहारी लोग बाल ठाकरे की लाठियों को भूल जायेंगे.  अगर इस  चुनाव में भाजपाजदयू गंठजोड़ की सरकार नहीं बनी, फिर भी भाजपा अगले चुनाव में, बिना जदयू की बैसाखी के दौड़ सकेगी. कुल मिला कर कमाल हो जाएगा."

सो मेरे प्रिय नेता नीतीश जी परेशान हैं. इधर उनके प्रिय बाहुबली लोग भी बिदक रहे हैं. पिछले चुनावों  में गुंडाराज ख़तम करेंगे के नारे के साथ नीतीश जी ने कितना कितना गुंडों का काया कल्प कर दिया. उनको नेता बना दिया. इस बार तो लालू और पासवान तो हद किये हुए हैं. झटा झट  कुल्ले फोर्सवन  पर कब्जियाते चले जा रहे हैं. हम कौनो राहुल जी तो हैं नहीं न कि सोचेंगे कि कालेज के  पढ़ाकू लड़कों को अपनी पार्टी के लिए न्योता  दें और अपना लुटिया डूबा दें. हमको राजनीती में कोई प्रैक्टिकल  नहीं न करनी  है, बल्कि हमको प्रक्टिकल राजनीती करनी है. और उसके लिए ढेर फोर्सवन चाहिए. राजनीती फ्लोज  फ्राम द  बैरेल  आफ फोर्सवन!

 नीतीश जी को चिंता रामानंद तिवारी को लेकर भी हो रही है. अरे नीतीश भाई तो भाजपा को घुड़का रहे हैं ताकि वह अपने असली चेहरों को बिहार चुनाव में नहीं उतारे  और ई तिवारी जी तड़ाक से बोल दिए कि भाजपा से गठबंधन पर फिर से विचार किया जाये. अरे, तिवारी जी नीतीश जी से दू कदम आगे काहे भागने की कोशिश कर रहे हैं? कहीं फिर से लालू जी की शरण में जानना पड़ जाये. इधर आप फ्रंटियर  मेल बने और उधर नीतीश जी बिजली का कनेक्सने काट देंगे. फिर लारी लप्पा करते रह जाईयेगा.

अब बिहार चुनाव है, कौन दही चूडा  का खेल  नहीं न है. ईहाँ भीषण खेला चलता है. ढेरे रंग का टाकिंग होता है. झूठ पर ऐसा मुलम्मा चढाते हैं कि का कहें. सच तो यहाँ पर बेचारा बना, जनता के पास खड़ा रहता है. और  जनता का वोट भी चोरी हो जाता है और सत्ता बनाने का अधिकार भी. बाद में बल गुलामी करना रह जाता. विकास सिर्फ अखबारी बयान में, सुन्दर सुन्दर अक्षर  में झलकता है. अब अखबार में नेता जी का बयान कहता है कि बिहार तरक्की कर गया है, तो मानना ही पडेगा लेकिन क्या करें अनपढ़ वाईफ जी नहीं न मान रही हैं कि हमलोगन की असल में तरक्की हो गई है.

खैर, तरक्की  की हकीकत कुछ भी हो, चुनाव तक मोदी जी और वरुण जी धैर्य से काम लें और चुनाव के बाद हमरे प्रिय नेता जी उनको  फटाफट  पटना बुला कर चूड़ा  दही खिलायेंगे.  
 


 






































  


































 

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