मेरा बैड लक मेरे फेवर में हो रहा है- मुझको बिग बौस से निमंत्रण मिल गया है.और मैं अब एक गाली-गुरु से गालियाँ सीख रहा हूँ. उनके उपयोग की मुकम्मल जानकारी ले रहा हूँ. जैसे कोई गायक रागों का अभ्यास सुबह- शाम करता है, मैं भी लगातार गालियाँ बकने का और उसमें अपने स्टाइल भरने की भी कोशिश कर रहा हूँ. मां, बाप, भाई, बहन तथा अन्य नातों से सम्बंधित गालियाँ तो मैंने कंठस्थ कर लिए हैं.
लेकिन, क्या बताएं यह समाज किसी की तरक्की देखना ही नहीं चाहता है. गालियों के स-स्वर रियाज से मेरे पडोसी बड़े बौखलाए हैं. कल तो सतीश जी ने तो हद ही कर दी. उन्होंने सपत्नी मेरे फ्लैट में आ कर मुझे चेतावनी देते हुए कहा कि उसके बेटे ने मेरे रियाज का लाभ उठाते हुए तेरह गालियां सीख ली हैं, जिनका वह अपने साथियों पर प्रयोग करते हुए पार्क में पिट चुका है. इतना ही नहीं वे मेरे फ्लैट से जाते-जाते मुझे कुछ स्पेशल बिहारी गालियां दे गए. लेकिन, मैंने उन गालियों को उनका फ्री उपहार मान कर स्वीकार कर लिया है.
पड़ोसियों की बेवजह नुक्ताचीनी के बाद, मैंने गालियों की प्रैक्टिस के लिए एक खंडहर पड़े मकान में जगह दूंढ ली है. मैंने शपथ ले ली है कि बिग बौस में मैं तहलका मचा कर ही दम लूँगा. लेकिन, मेरी राह में सिर्फ पडोसी ही नहीं, बल्कि घर के लोग भी बाधक बन रहे हैं. कल मेरे बड़े भाई ने मेरे फ्लैट में आ कर मेरी धर्मपत्नी से पूछा,' क्या बब्लुआ आज कल गालियां बकने की प्रैक्टिस कर रहा है ? क्या उसका दिमाग गड़बड़ा गया है ? क्या किसी दिमाग के डाक्टर से उसकी जाँच करवाई ? मैं बाथरूम में छिप कर दोनों की बातें गौर से सुन रहा था- धर्मपत्नी जी ने अधर्म के रास्ते पर चलते हुए बड़े भाई जी को बताया, " मैं पहले उनको किसी शैकोलोजिस्ट से दिखलाने की बात सोच रहीं हूँ , फिर बाद में कांके के मानसिक आरोग्यशाला में उनको भरती करवाने पर विचार करूंगी."
अब देखिये जनाब, मेरी धर्मपत्नी के कितने खतरनाक विचार हैं. अरे, हम तो बिग बौस में चमकने-दमकने जा रहे हैं, हरे-हरे नोट की माला पहनने जा रहे हैं, और यहाँ मुझको पागल समझा जा रहा है. बड़े भाई जी के जाने के बाद , मैंने अपनी धर्म पत्नी जी को बताया कि बिग बौस में सफलता और मालामाल होने के लिए गालियों का कितना विशाल महत्त्व है.
मेरी धर्मपत्नी जी हत्थे से उखड़ गयीं और बोलीं,' मैं बिग बौस देखती हूँ. बिग बौस में जाने के लिए गालियों के रियाज की क्या आवश्यकता है ?
मैंने उनको बताया,' देखो, जब बिग बौस के घर में कोई गाली बकता है तो उसके गाली-युक्त संवाद की रेकार्डिंग कर ली जाती है, लेकिन, बाद में गाली की जगह "पीं" की आवाज भर दी जाती है. अगर कोई प्रतियोगी गाली ही न बके तो उसके संवाद में "पीं" की आवाज नहीं होगी. लेकिन, क्या तुमने बिग बौस के किसी प्रतिभागी का संवाद बिना "पीं" की आवाज के सुना है ? जानती हो बिग बौस देखने वाले तो इन दिनों एक प्रतियोगिता करते हैं-पहचानो कौन सी गाली "पीं" की आवाज के नीचे दबी है. यह गेम बहुत पोपुलर हो गया है."
पत्नी जी ने और तेज आवाज में अपनी बात पेश की," देखो जी, आप कल सुबह तैयार हो जाईगा. आपको मैं शैकोलोजिस्ट के पास ले जाउंगी."
मुझे भी तेवर आ गया, " यह क्या बकवास है ? अरे तुम तो जानती हो कि मैं कभी गालियां नहीं निकाला करता हूँ. इन दिनों गालियों की प्रैक्टिस तो मैं बिग बौस में तहलका मचाने और माला-माल होने के लिए कर रहा हूँ. मेरा प्रोगाम है कि मैं बिग बौस प्रतियोगिता जीत कर तुम्हारे लिए सुन्दर और कीमती साड़ियों का जुगाड़ करूँगा."
मेरी पत्नी मेरे पास से उठ कर चली गई. और मैं सोचने लगा कि बिग बौस में जीत दर्ज करने का मेरा सपना क्या सपना ही रह जायेगा? क्या मेरे सपनों को वे लोग तोड़ देंगे, जिनके लिए मैंने पूरी जिन्दगी खट कर काम किया, कभी एक पेग शराब नहीं पी, कभी किसी को गाली नहीं दी और अपने दफ्तर के बौस की गालियां अनसुनी करता रहा ताकि मेरी नौकरी पर खतरा न आ जाए. और आज जब माला-माल होने के लिए मैं जीवन में पहली बार गालियों का रियाज कर रहा हूँ तो मेरे परिवार के लोग ही मुझको पागल समझ रहे हैं.
लेकिन, मेरे दोस्तो, आप जानते ही हैं कि बिना गालियों के बिग बौस का तो वजूद ही समाप्त हो जाएगा. अरे, गालियां हमारी संस्कृति के अंग हैं. शादी-ब्याह के अवसर पर हमारी घर की महिलाएं कितनी गालियां गीतों के माध्यम से सुनाती हैं. बाराती के सभी श्रेष्ठजनों को चुन-चुन कर गरमा-गरम गालियों से स्वागत करतीं हैं और बाराती के श्रेष्ट जन उन गालियों का लुफ्त उठाते हैं. बिग बौस कार्यक्रम भी हमारी संस्कृति के अनुसार गाली आधारित कार्यक्रम है. पर पता नहीं, सरकार भी भारतीय संस्कृति और इंटरनेश्नल गालियों से ओत-प्रोत बिग बौस कार्यक्रम को देर रात के समय शिफ्ट करना चाहती है. अरे, गालियां दिन में दो या फिर देर रात, उसके टेस्ट में कोई फर्क नहीं पड़ता है. गाली देना और सुनाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार से हमें कोई वंचित नहीं कर सकता है.
"
शनिवार, 20 नवंबर 2010
शुक्रवार, 19 नवंबर 2010
राजा स्वयं को थ्री डी स्पेक्ट्रम में देख रहे होंगे!
राजा की राजगद्दी छिन गई. अब कोर्ट का चक्कर लगायेंगे. लेकिन एक बात है राजा जी लम्बे समय तक चर्चे में रहेंगे. और राजनीति की मान्यता है की गुमनामी से बदनामी बेहतर होती है. सो राजा तो बल्ले-बल्ले होंगें ही. स्वयं को थ्री डी स्पेक्ट्रम में देख रहे होंगे. अब टू जी स्पेक्ट्रम पीछे रह जायेगा और राजा का थ्री डी स्पेक्ट्रम हर दिन समाचार में छाया रहेगा. कुल मिला कर वे एक उम्दा इतिहास बनायेंगे. उनके बाल-बच्चे अपने बच्चों को राजा जी के कारनामों के किस्से सुनायेंगे और कहेंगे कि यह वही व्यक्ति थे जो मनमोहन जी की पैनी नजरों के नीचे कितना ऊँचा-नीचा काम कर के दिखा दिया.
यह राजा जी का ही कमाल है कि वे सारे घोटालों को मात देने कि स्थिति में आ गए हैं. पता नहीं उनके घोटाले की पूरी राशि का व्योरा कब तक मेलेगा या फिर सारा व्योरा किसी फ़ाइल में कैद हो कर रह जाएगा? आशा है कि हमारे जीवन काल में किसी दिन वह घड़ी आएगी, जब हमें राशि का डीटेल मिलेगा और गिनीज बुक ऑफ़ रिकार्ड में वह दर्ज होगा. हे ईश्वर! उसके पहले कोई और बड़ा घोटाला न कर दे, मैं इसकी प्रार्थना करता रहूँगा . यह घोटाला मील का पत्थर बनेगा. लोग इसकी कहानियां सदियों-सदियों तक सुनाएंगे.
लेकिन, राजा जी से कुछ प्रश्न करने की जुर्रत कर रहा हूँ-यह सब अकेले किया या किसी और का भी सहयोग लिया ? क्या कभी आप लालू जी से भी मिले और उनको अपना गुरु तो नहीं बनाया ? क्या आगे चल कर घोटाला-कला को और विकसित करने के लिए कोई संसथान खोलने का तो इरादा नहीं रखते हैं ?
इधर सोनिया जी ने लेन-देन और लालच-वालच पर मनमोहन जी को सामने बैठा कर पुरजोर लेक्चर जड़ दिया है. राजा के कारण अर्थशास्त्री जी बड़ी मायूस दिखे. वे कोई सीबीआई तो हैं नहीं कि किसी मंत्री की साजिश को पहले से ही भांप लें.
अरे, सीबीआई भी तो घोटाला-घटना संपन्न हो जाने के बाद ही छानबीन करती है. और अधिकांश केसों का अंत सीबीआई की विफलता से संपन्न हो जाता है और शेष रह जाता है घोटाले का जिन्न. यह जिन्न देश भर में मंडराता रहता है और सत्ताधारी दल के सिर पर चढ़ कर बोलता है. कभी यह एमपी साहबों को प्रश्न के बदले घूस लेना सिखलाता है, कभी किसी दल के अध्यक्ष को डिफेंस सप्लाई के मामले में घूस लेने के लिए मजबूर कर देता है, कभी किसी नेता को जानवर का चारा तो कभी आदमी का अनाज चट करने लिए तैयार कर लेता है, कभी किसी को लाइबेरिया में खदान खरीदने के लिए उकसा देता है और वह अपने राज्य को लूट लेता है, कभी ताबूत खरीद में बड़े साहब से घोटाला करवा देता है......आदि-आदि....
यह ज़माना बहुत ही खराब है, कोई कमाने लगता है तो उसे देख कर कोई जलने लगता है. कोई किसी को खाकपति से अरबपति बनते देखना ही नहीं चाहता है. अब टाटा या बाबा रामदेव से कोई घूस मांगता है तो सालों बाद उसका प्रकटीकरण मुहूर्त देख कर करते हैं. पता नहीं, जब घूस की याचना होती है तब उनकी जुबान पर ताला क्यों लग जाता है. इसके पीछे है घोटालों का जिन्न जो, समय पर ईमानदार लोगों के मुह पर चुप्पी देवी को बैठा देता है. समय बुरे लोगों के पक्ष में है और जो अच्छे लोग हैं उनको बुरे लोग पोंगा पंडित कहने से चूकते नहीं हैं.
यह राजा जी का ही कमाल है कि वे सारे घोटालों को मात देने कि स्थिति में आ गए हैं. पता नहीं उनके घोटाले की पूरी राशि का व्योरा कब तक मेलेगा या फिर सारा व्योरा किसी फ़ाइल में कैद हो कर रह जाएगा? आशा है कि हमारे जीवन काल में किसी दिन वह घड़ी आएगी, जब हमें राशि का डीटेल मिलेगा और गिनीज बुक ऑफ़ रिकार्ड में वह दर्ज होगा. हे ईश्वर! उसके पहले कोई और बड़ा घोटाला न कर दे, मैं इसकी प्रार्थना करता रहूँगा . यह घोटाला मील का पत्थर बनेगा. लोग इसकी कहानियां सदियों-सदियों तक सुनाएंगे.
लेकिन, राजा जी से कुछ प्रश्न करने की जुर्रत कर रहा हूँ-यह सब अकेले किया या किसी और का भी सहयोग लिया ? क्या कभी आप लालू जी से भी मिले और उनको अपना गुरु तो नहीं बनाया ? क्या आगे चल कर घोटाला-कला को और विकसित करने के लिए कोई संसथान खोलने का तो इरादा नहीं रखते हैं ?
इधर सोनिया जी ने लेन-देन और लालच-वालच पर मनमोहन जी को सामने बैठा कर पुरजोर लेक्चर जड़ दिया है. राजा के कारण अर्थशास्त्री जी बड़ी मायूस दिखे. वे कोई सीबीआई तो हैं नहीं कि किसी मंत्री की साजिश को पहले से ही भांप लें.
अरे, सीबीआई भी तो घोटाला-घटना संपन्न हो जाने के बाद ही छानबीन करती है. और अधिकांश केसों का अंत सीबीआई की विफलता से संपन्न हो जाता है और शेष रह जाता है घोटाले का जिन्न. यह जिन्न देश भर में मंडराता रहता है और सत्ताधारी दल के सिर पर चढ़ कर बोलता है. कभी यह एमपी साहबों को प्रश्न के बदले घूस लेना सिखलाता है, कभी किसी दल के अध्यक्ष को डिफेंस सप्लाई के मामले में घूस लेने के लिए मजबूर कर देता है, कभी किसी नेता को जानवर का चारा तो कभी आदमी का अनाज चट करने लिए तैयार कर लेता है, कभी किसी को लाइबेरिया में खदान खरीदने के लिए उकसा देता है और वह अपने राज्य को लूट लेता है, कभी ताबूत खरीद में बड़े साहब से घोटाला करवा देता है......आदि-आदि....
यह ज़माना बहुत ही खराब है, कोई कमाने लगता है तो उसे देख कर कोई जलने लगता है. कोई किसी को खाकपति से अरबपति बनते देखना ही नहीं चाहता है. अब टाटा या बाबा रामदेव से कोई घूस मांगता है तो सालों बाद उसका प्रकटीकरण मुहूर्त देख कर करते हैं. पता नहीं, जब घूस की याचना होती है तब उनकी जुबान पर ताला क्यों लग जाता है. इसके पीछे है घोटालों का जिन्न जो, समय पर ईमानदार लोगों के मुह पर चुप्पी देवी को बैठा देता है. समय बुरे लोगों के पक्ष में है और जो अच्छे लोग हैं उनको बुरे लोग पोंगा पंडित कहने से चूकते नहीं हैं.
बुधवार, 17 नवंबर 2010
पुतले के पक्ष में उठीं संघी लाठियां: काश! गुजरात में आदमी की रक्षा में भी उठतीं ये लाठियां
रांची में संघ से स्वयंसेवकों ने बहुत दिनों के बाद अपने तेल सेवित लाठियों का कांग्रेसियों पर संचालन किया.बेचारे कांग्रेसी निहत्थे ही सुरदर्शन जी का पुतला जलाने के लिए रांची के अलबर्ट एक्का चौक पर जा रहे थे और दूसरी ओर पुतले के संरक्षक संघियों ने, अपनी- अपनी लाठियों के साथ लैस, उनपर हमला कर दिया. सुदर्शन जी का पुतला जलने से बच गया. काश यही बहादुरी गुजरात के संघियों ने दिखलायी होती, तो कितने ही ईश्वर निर्मित आदमी की जानें बच जातीं. कितनी ही गर्ववती महिलाओं के पेट नहीं चीरे जाते.
लेकिन, चलिए संघियों को जीवित आदमी की परवाह हो न हो, उनको एक निर्जीव पुतले पर तो तरस आया! लगता है कि उनके पास अभी भी दिल शेष है, जिसने भले लोगों और निर्दोषों की जगह अपनों के प्रतिकृति-पुतलों पर तो प्यार बरसाया और उसके दुश्मनों पर खुले दिल से लाठियां तो भांजी. लगता है कि वे अब संघी मानसिकता से भटक रहे हैं. इनको जरूर नागपुर के बूढ़े बाबा की जोरदार फटकार लगनेवाली है.
कुछ संघियों के मालेगांव और अन्य जगहों पर हुए बम विस्फोटों में अंतर्लिप्ततता के कारण सीबीआई के द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद राहुल गाँधी ने संघ को आतंकी कह दिया, तो आरएसएस के लोगों का भी अपनी गोएबेल वाली नीति पर आरोप गढ़ने का पक्का हक़ बनता है. सो, उसी हक़ के आधार पर सुदर्शन जी ने कुछ निराधार कह दिया तो ये कांग्रेसी सुदर्शन जी का पुतला जलायेंगे ? उनका काम वे करेंगे? हिंसा उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. और इस अधिकार की रक्षा के लिए ही वे अपने दफ्तर में अपने कार्यकर्ताओं का कोई लेखा-जोखा नहीं रखते ताकि किसी कांड में पकड़े जाने पर संघ उनको अपने से असम्बद्ध बता सके.
संघ के द्वारा बदनामी से बचने का पुख्ता इन्तेजाम रखा जाता है. लेकिन, जबसे अफवाह फ़ैलाने के लिए जिन्ना के नाम का इस्तेमाल कर महात्मा गाँधी को नीचा दिखने की नीति के लिए, जसवंत सिंह का प्रयोग सफल हुआ, तबसे संघ इस तरह का रिस्क लेने लगा है. उसी का प्रतिफल है सुदर्शन जी की असुदर्शन वाणी में सोनिया जी की बेबुनियाद तकरीर.
बेबुनियाद तकरीर ही तो उनका हथियार है. कोई अपने आप को अपने हथियार से कैसे अलग कर सकता है? सवाल है पहचान की रक्षा की. और संघी अपनी पहचान कभी मिटते हुए नहीं देख सकते हैं. हाथ में तेल पिजायी लाठी, सिर पर काली टोपी, हाफ पैंट आदि और फिर वे शान से कहते हैं -हम गणवेशधारी हिन्दू हैं. और जो ऐसा वेश धारण नहीं करता, वेद देख लो, वह हिन्दू कहलाने लायक ही नहीं है. उनके वेद में हिन्दुओं का यही ड्रेस कोड लिखा है तो लिखा है, और यह ड्रेस कोड सभी हिन्दुओं को मानना होगा, अन्यथा उन्हें गैर हिन्दू या धर्मनिरपेक्ष भ्रष्ट हिन्दू की संज्ञा दे दी जायेगी. उनके लिए स्वर्ग के द्वार बन्द करवा दिए जायेंगे. वही हिन्दू स्वर्ग जाने का अधिकारी माना जा सकता है जो संघी ड्रेस कोड को फौलो करता है.
लेकिन, चलिए संघियों को जीवित आदमी की परवाह हो न हो, उनको एक निर्जीव पुतले पर तो तरस आया! लगता है कि उनके पास अभी भी दिल शेष है, जिसने भले लोगों और निर्दोषों की जगह अपनों के प्रतिकृति-पुतलों पर तो प्यार बरसाया और उसके दुश्मनों पर खुले दिल से लाठियां तो भांजी. लगता है कि वे अब संघी मानसिकता से भटक रहे हैं. इनको जरूर नागपुर के बूढ़े बाबा की जोरदार फटकार लगनेवाली है.
कुछ संघियों के मालेगांव और अन्य जगहों पर हुए बम विस्फोटों में अंतर्लिप्ततता के कारण सीबीआई के द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद राहुल गाँधी ने संघ को आतंकी कह दिया, तो आरएसएस के लोगों का भी अपनी गोएबेल वाली नीति पर आरोप गढ़ने का पक्का हक़ बनता है. सो, उसी हक़ के आधार पर सुदर्शन जी ने कुछ निराधार कह दिया तो ये कांग्रेसी सुदर्शन जी का पुतला जलायेंगे ? उनका काम वे करेंगे? हिंसा उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. और इस अधिकार की रक्षा के लिए ही वे अपने दफ्तर में अपने कार्यकर्ताओं का कोई लेखा-जोखा नहीं रखते ताकि किसी कांड में पकड़े जाने पर संघ उनको अपने से असम्बद्ध बता सके.
संघ के द्वारा बदनामी से बचने का पुख्ता इन्तेजाम रखा जाता है. लेकिन, जबसे अफवाह फ़ैलाने के लिए जिन्ना के नाम का इस्तेमाल कर महात्मा गाँधी को नीचा दिखने की नीति के लिए, जसवंत सिंह का प्रयोग सफल हुआ, तबसे संघ इस तरह का रिस्क लेने लगा है. उसी का प्रतिफल है सुदर्शन जी की असुदर्शन वाणी में सोनिया जी की बेबुनियाद तकरीर.
बेबुनियाद तकरीर ही तो उनका हथियार है. कोई अपने आप को अपने हथियार से कैसे अलग कर सकता है? सवाल है पहचान की रक्षा की. और संघी अपनी पहचान कभी मिटते हुए नहीं देख सकते हैं. हाथ में तेल पिजायी लाठी, सिर पर काली टोपी, हाफ पैंट आदि और फिर वे शान से कहते हैं -हम गणवेशधारी हिन्दू हैं. और जो ऐसा वेश धारण नहीं करता, वेद देख लो, वह हिन्दू कहलाने लायक ही नहीं है. उनके वेद में हिन्दुओं का यही ड्रेस कोड लिखा है तो लिखा है, और यह ड्रेस कोड सभी हिन्दुओं को मानना होगा, अन्यथा उन्हें गैर हिन्दू या धर्मनिरपेक्ष भ्रष्ट हिन्दू की संज्ञा दे दी जायेगी. उनके लिए स्वर्ग के द्वार बन्द करवा दिए जायेंगे. वही हिन्दू स्वर्ग जाने का अधिकारी माना जा सकता है जो संघी ड्रेस कोड को फौलो करता है.
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
सुदर्शन जी रियाज कर रहे थे-अजी मैंने ऐसा तो नहीं कहा था....
आम तौर से जब नेताओं, खास कर गोएबेल्स के चेलों को कुछ उलटी-सीधी बात को जनता में फैलाना होता है, तो वे किसी अपने खाश आदमी को बलि का बकरा बना कर, उससे अपनी बात मेमिया देते हैं. आरएसएस के पास बकरों की कमी नहीं हैं. जिन्ना का नाम लेकर गाँधी और नेहरू को नीचा दिखलाना था, तो आडवाणी जी को और जसवंत सिंह जी को बकरा बनाया और उनकी कलम से दो विष-युक्त किताबें लिखवा दीँ . एक ने तो अपनी किताबें पाकिस्तान में भी बेचीं . किताब बेचते हुए जसवंत जी को पाकिस्तान में 'प्यारे जसवंत भैया' वाली गज़ल भी बहुत अच्छी लगी. उन्होंने उस गज़ल को पकिस्तान में बार बार सुना और सुनते समय उनके मुखमंडल पर जो चमक दिखती थी, उससे यह नहीं लगता था कि वे कभी किसी धार्मिक समुदाय के विरुद्ध आग उगलने वाले आरएसएसवादी नेता रहे हों. वे तब विशुद्ध जिन्ना समर्थक लगे, जैसा कि उनके दल के वे नेता दीखते हैं जो आजादी के समय से लेकर आज भी सक्रिय हैं.
हाँ तो, बात चल रही थी कि आरएसएस के पास बकरों की कमी नहीं है. उसी बात को जारी रखते हुए बता दें कि उनका लैटेस्ट बकरा हैं, महामना सुदर्शन जी महाराज.
अब कांग्रेस, सरदार बल्लभ भाई पटेल की कमी को दूर करने की कोशिश करते हुए, उनके बताए रास्ते का अनुशरण किया और आरएसएस के कई लोगों पर आतंकी वारदात करने के इल्जाम में अंदर करवा दिया. अगर बल्लभ भाई पटेल कुछ वर्ष और जीवित रह पाते तो शायद देश के प्रधानमंत्री बन जाते और आरएसएस इतिहास बन जाता. लेकिन, देश के दुर्भाग्य से पटेल जी के जीवन का असामयिक अंत हो गया और आरएसएस को पनपने का मौका मिल गया, कभी जेपी के इस विश्वास के कारण कि क्रांति की अग्नि में तप कर एक दिन वे सोना बन कर निखरेंगे, तो कभी रामजन्म भूमि विवाद पर देशवासियों और श्रीराम को एक साथ धोखा दे कर. लेकिन इस संकट की घड़ी में बेचारा बना आरएसएस क्या करता ? सो सुदर्शन जी को कहा कि बोलो जो मैं तुम्हारे कान में कहता हूँ और वे बोल गए, सोनिया सीआईए की एजेंट हैं और राजीव गाँधी की हत्या के पीछे भी वे ही थीं. ऐसी अमर्यादित और काल्पनिक बातें ही तो गोएबेल्स के हथियार हुआ करते थे.
सो सुदर्शन जी ने मेमिया दिया और जैसा कि बकरों के मेमिया जाने के बाद होता है, आरएसएस ने अपने पूर्व के बकरों से सम्बंधित उसी पुराने वक्तव्य को दुहरा दिया, सिर्फ नाम बदलते हुए- यह सुदर्शन जी का व्यक्तिगत बयान है, आरएसएस का नहीं. ऐसा ही बयान तब भी दिया गया था जब बीजेपी के एक राष्ट्रीय अध्यक्ष को पूरी दुनिया ने घूस लेते हुए देखा था, वह भी प्रतिरक्षा के सौदा हेतु. लेकिन इसी फार्मूला पर कांग्रेस कहे कि आदर्श घोटाला अशोक चाहवान का व्यक्तिगत मामला है, या करुणा निधि जी कहें कि राजा के मंत्रालय का कथित घोटाला राजा का व्यक्तिगत मामला है, तो इसे आरएसएस या बीजेपी के नेता कतई नहीं मानेंगे मानेंगे. वे तो एक सुर में पूरी 'कांग्रेस चोर है, चोर है' का नारा हुआं-हुआं करते रहेंगे हैं.
तीन हजार वर्ग फीट के फ्लैट पर कथित रूप से अशोक चाहवान के सगों के कब्जे के मामले पर अशोक चौहान को कांग्रेस मुख्यमंत्री के पद से हटा देती है, लेकिन जिस नरेंद्र मोदी के शासन काल में हजार से अधिक लोगों को मौत के घात उतार दिया गया, गर्ववती महिलाओं के पेट चीर दिए गए, कितनो को जिन्दा जला दिया गया और उसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी के चाहने पर भी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हटाया नहीं गया क्योंकि वह तो बीजीपी के असली चेहरा बन चुके थे, कहीं कोई अपने असली चेहरे को हटा सकता है?
लेकिन, सुदर्शन जी ही शायद बंद कमरे में रियाज कर रहे थे- अजी मैंने ऐसा तो नहीं कहा था.... ये प्रेस वाले कुछ का कुछ लिखते-दिखाते रहते हैं, कभी वरुण को हाथ काटने की धमकी देते दिखा-सुना देते हैं, तो कभी बीजेपी के अनेक सांसदों को प्रश्न के बदले पैसे लेते दिखा देते हैं.....इन प्रेस वालों पर कोई कैसे विश्वास कर सकता है....सब के सब कांग्रेसी सीबीआई हैं....एक हमारे ज़माने में सीबीआई थी, वह हमारे गढ़े बोफोर्स कांड की जाँच पर घोटाले से चौगुनी रकम खर्च कर भी किसी को दोषी नहीं ठहरा पाई और इधर हमारे लोगों ने जैसे ही एक दो धमाके कर दिए तो सबूत के साथ हाजिर हो गई कांग्रेसी सीबीआई...... उधर कान में एक आवाज आई- सो फाइनली सुदर्शन जी बोलेंगे कि मेरे वक्तव्य के तोड़-मरोड़ के पीछे कांग्रेस का पंजा है, सीबीआई का हाथ है, प्रेस का हाथ है!
हाँ तो, बात चल रही थी कि आरएसएस के पास बकरों की कमी नहीं है. उसी बात को जारी रखते हुए बता दें कि उनका लैटेस्ट बकरा हैं, महामना सुदर्शन जी महाराज.
अब कांग्रेस, सरदार बल्लभ भाई पटेल की कमी को दूर करने की कोशिश करते हुए, उनके बताए रास्ते का अनुशरण किया और आरएसएस के कई लोगों पर आतंकी वारदात करने के इल्जाम में अंदर करवा दिया. अगर बल्लभ भाई पटेल कुछ वर्ष और जीवित रह पाते तो शायद देश के प्रधानमंत्री बन जाते और आरएसएस इतिहास बन जाता. लेकिन, देश के दुर्भाग्य से पटेल जी के जीवन का असामयिक अंत हो गया और आरएसएस को पनपने का मौका मिल गया, कभी जेपी के इस विश्वास के कारण कि क्रांति की अग्नि में तप कर एक दिन वे सोना बन कर निखरेंगे, तो कभी रामजन्म भूमि विवाद पर देशवासियों और श्रीराम को एक साथ धोखा दे कर. लेकिन इस संकट की घड़ी में बेचारा बना आरएसएस क्या करता ? सो सुदर्शन जी को कहा कि बोलो जो मैं तुम्हारे कान में कहता हूँ और वे बोल गए, सोनिया सीआईए की एजेंट हैं और राजीव गाँधी की हत्या के पीछे भी वे ही थीं. ऐसी अमर्यादित और काल्पनिक बातें ही तो गोएबेल्स के हथियार हुआ करते थे.
सो सुदर्शन जी ने मेमिया दिया और जैसा कि बकरों के मेमिया जाने के बाद होता है, आरएसएस ने अपने पूर्व के बकरों से सम्बंधित उसी पुराने वक्तव्य को दुहरा दिया, सिर्फ नाम बदलते हुए- यह सुदर्शन जी का व्यक्तिगत बयान है, आरएसएस का नहीं. ऐसा ही बयान तब भी दिया गया था जब बीजेपी के एक राष्ट्रीय अध्यक्ष को पूरी दुनिया ने घूस लेते हुए देखा था, वह भी प्रतिरक्षा के सौदा हेतु. लेकिन इसी फार्मूला पर कांग्रेस कहे कि आदर्श घोटाला अशोक चाहवान का व्यक्तिगत मामला है, या करुणा निधि जी कहें कि राजा के मंत्रालय का कथित घोटाला राजा का व्यक्तिगत मामला है, तो इसे आरएसएस या बीजेपी के नेता कतई नहीं मानेंगे मानेंगे. वे तो एक सुर में पूरी 'कांग्रेस चोर है, चोर है' का नारा हुआं-हुआं करते रहेंगे हैं.
तीन हजार वर्ग फीट के फ्लैट पर कथित रूप से अशोक चाहवान के सगों के कब्जे के मामले पर अशोक चौहान को कांग्रेस मुख्यमंत्री के पद से हटा देती है, लेकिन जिस नरेंद्र मोदी के शासन काल में हजार से अधिक लोगों को मौत के घात उतार दिया गया, गर्ववती महिलाओं के पेट चीर दिए गए, कितनो को जिन्दा जला दिया गया और उसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी के चाहने पर भी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हटाया नहीं गया क्योंकि वह तो बीजीपी के असली चेहरा बन चुके थे, कहीं कोई अपने असली चेहरे को हटा सकता है?
लेकिन, सुदर्शन जी ही शायद बंद कमरे में रियाज कर रहे थे- अजी मैंने ऐसा तो नहीं कहा था.... ये प्रेस वाले कुछ का कुछ लिखते-दिखाते रहते हैं, कभी वरुण को हाथ काटने की धमकी देते दिखा-सुना देते हैं, तो कभी बीजेपी के अनेक सांसदों को प्रश्न के बदले पैसे लेते दिखा देते हैं.....इन प्रेस वालों पर कोई कैसे विश्वास कर सकता है....सब के सब कांग्रेसी सीबीआई हैं....एक हमारे ज़माने में सीबीआई थी, वह हमारे गढ़े बोफोर्स कांड की जाँच पर घोटाले से चौगुनी रकम खर्च कर भी किसी को दोषी नहीं ठहरा पाई और इधर हमारे लोगों ने जैसे ही एक दो धमाके कर दिए तो सबूत के साथ हाजिर हो गई कांग्रेसी सीबीआई...... उधर कान में एक आवाज आई- सो फाइनली सुदर्शन जी बोलेंगे कि मेरे वक्तव्य के तोड़-मरोड़ के पीछे कांग्रेस का पंजा है, सीबीआई का हाथ है, प्रेस का हाथ है!
बुधवार, 27 अक्टूबर 2010
अरुन्धत्ती:कोई आगे बढ़ कर उनको चीन का मिनरल वाटर तो पिलाओ भाई....
अरुन्धत्ती राय ने अपने देश विरोधी बयानों से मेरी रांची की धरती को दागदार कर दिया, जिस धरती पर अनेक स्वतंत्रता सेनानिओयों ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी. लेकिन, नक्सलियों से बेइन्तहां प्रेम और सहयोग रखनेवाली महाश्वेता देवी भी कुछ कम नहीं हैं. उन्होंने भगवान् बिरसा पर लिखे अपने एक उपन्यास में बिरसा को बाल चोर की पदवी दे दी है. दोनों ने झारखण्ड की धरती को अपवित्र किया है.
लेकिन, ये दोनों महिलाएं ऐसा क्यों करती हैं ? वस्तुतः दोनों बहुत भूखी हैं. बहुत दिनों से अखबारों में हेड लाईन नहीं बटोर पा रहीं हैं. अरुन्धत्ति तो कुछ-कुछ सफल रहीं, लेकिन महाश्वेता देवी को ज्यादा सफलता नहीं मिली, क्योंकि वह नक्सलियों के मामले में ढुलमुल हो गयीं. परन्तु, अरुंधती तो शर्म जैसी नाचीज से नाता ही नहीं रखतीं हैं, सो अभी तक कश्मीर सम्बन्धी अपने मूर्खतापूर्ण बयान पर अडिग रह कर, नाम कमाने के रास्ते पर चल निकली हैं. एक कहावत है कि गुमनामी से बदनामी बेहतर होती है.
एक और महान हैं, अडिगाजी, उनको हनुमान राम के पेड सर्वेंट नजर आते हैं. उनको भारत में सभी दिशाओं में अन्धेरा और चोर टाईप के लोग नजर आते हैं, सिर्फ एक वे ही शरीफ और अच्छे हिन्दुतानी शेष रह गए हैं. अगर वे हिंदुस्तान से चीन चले जायें, जहाँ उनके आका विराजते हैं, तो हिन्दुस्तान, चोरों और उचक्कों का देश शेष रह जायेगा.
पता नहीं, इस वेला में हमारे माओ प्रेमी कम्युनिस्ट लोग कहाँ छुपे बैठे हैं ? किस बिल में समा गए हैं ? वे एक भी शब्द अपने प्रिय विचारक, प्रबुद्ध और प्रगतिशील अरुन्धत्ती की सेवा में मुह से नहीं निकाल रहे हैं. लगता है कि उनका गला ममता के खिलाफ बोलते-बोलते सूख गया है. कोई आगे बढ़ कर उनको चीन का मिनरल वाटर तो पिलाओ भाई....अगर कम्यूनिस्टों का हलक सूख गया है तो चीन का मिनरल वाटर अरुंधती को ही पिलाओ, ताकि वे अब अरुणाचल, असम, मेघालय, नगालैंड,सिक्किम, भूटान आदि पर भी अपनी माओवादी टिपण्णी से देश को अनुगृहीत कर सकें.
एक थीं महारानी लक्ष्मी बाई, जिन्होंने देश कि अस्मिता के लिए तलवार उठा कर बंदूकधारी अंग्रेजों के सामने खड़ी हो गयीं और अंतिम सांस तक अंग्रेजो से लोहा लिया. एक हैं माओ की वीरांगना अरुन्धत्ती, बहुत मोडर्न हैं, और कभी हाथ की कलम तो कभी अपनी जुबान को तलवार की तरह इस्तेमाल कर भारत माता को लहूलुहान करती रहती हैं. वह चीन का साल्ट खातीं हैं, सो हम उनको भारतीय नमकहराम तो कतई नहीं कह सकते हैं. सो, अब यह आम लोगों पर छोड़ता हूँ कि वे इस क्रांतिकारी महिला को किस श्रेणी में रखना चाहेंगे. यह माओ प्रिया या भक्तिनी, सचमुच आदरणीया हैं, देश के लिए कोहिनूर हैं. जांबाज हैं. चीन के लिए भारतीय संस्करण की देश भक्तिनी हैं. जो भी हैं, गजब की हैं. अजब की हैं. पता नहीं उनको अपने बयानों पर कब बुकर-सूकर टाईप का पुरस्कार न मिल जाये, जैसे भारत की झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वालों को कुत्ता कहने के कारण आस्कर अवार्ड मिल गया था. सो मैं अडवांस में अरुन्धत्ती को संभावित किसी बड़े पुरस्कार के लिए लाल सलाम कहते हैं और बधाइयाँ भी देते हैं.
लेकिन, ये दोनों महिलाएं ऐसा क्यों करती हैं ? वस्तुतः दोनों बहुत भूखी हैं. बहुत दिनों से अखबारों में हेड लाईन नहीं बटोर पा रहीं हैं. अरुन्धत्ति तो कुछ-कुछ सफल रहीं, लेकिन महाश्वेता देवी को ज्यादा सफलता नहीं मिली, क्योंकि वह नक्सलियों के मामले में ढुलमुल हो गयीं. परन्तु, अरुंधती तो शर्म जैसी नाचीज से नाता ही नहीं रखतीं हैं, सो अभी तक कश्मीर सम्बन्धी अपने मूर्खतापूर्ण बयान पर अडिग रह कर, नाम कमाने के रास्ते पर चल निकली हैं. एक कहावत है कि गुमनामी से बदनामी बेहतर होती है.
एक और महान हैं, अडिगाजी, उनको हनुमान राम के पेड सर्वेंट नजर आते हैं. उनको भारत में सभी दिशाओं में अन्धेरा और चोर टाईप के लोग नजर आते हैं, सिर्फ एक वे ही शरीफ और अच्छे हिन्दुतानी शेष रह गए हैं. अगर वे हिंदुस्तान से चीन चले जायें, जहाँ उनके आका विराजते हैं, तो हिन्दुस्तान, चोरों और उचक्कों का देश शेष रह जायेगा.
पता नहीं, इस वेला में हमारे माओ प्रेमी कम्युनिस्ट लोग कहाँ छुपे बैठे हैं ? किस बिल में समा गए हैं ? वे एक भी शब्द अपने प्रिय विचारक, प्रबुद्ध और प्रगतिशील अरुन्धत्ती की सेवा में मुह से नहीं निकाल रहे हैं. लगता है कि उनका गला ममता के खिलाफ बोलते-बोलते सूख गया है. कोई आगे बढ़ कर उनको चीन का मिनरल वाटर तो पिलाओ भाई....अगर कम्यूनिस्टों का हलक सूख गया है तो चीन का मिनरल वाटर अरुंधती को ही पिलाओ, ताकि वे अब अरुणाचल, असम, मेघालय, नगालैंड,सिक्किम, भूटान आदि पर भी अपनी माओवादी टिपण्णी से देश को अनुगृहीत कर सकें.
एक थीं महारानी लक्ष्मी बाई, जिन्होंने देश कि अस्मिता के लिए तलवार उठा कर बंदूकधारी अंग्रेजों के सामने खड़ी हो गयीं और अंतिम सांस तक अंग्रेजो से लोहा लिया. एक हैं माओ की वीरांगना अरुन्धत्ती, बहुत मोडर्न हैं, और कभी हाथ की कलम तो कभी अपनी जुबान को तलवार की तरह इस्तेमाल कर भारत माता को लहूलुहान करती रहती हैं. वह चीन का साल्ट खातीं हैं, सो हम उनको भारतीय नमकहराम तो कतई नहीं कह सकते हैं. सो, अब यह आम लोगों पर छोड़ता हूँ कि वे इस क्रांतिकारी महिला को किस श्रेणी में रखना चाहेंगे. यह माओ प्रिया या भक्तिनी, सचमुच आदरणीया हैं, देश के लिए कोहिनूर हैं. जांबाज हैं. चीन के लिए भारतीय संस्करण की देश भक्तिनी हैं. जो भी हैं, गजब की हैं. अजब की हैं. पता नहीं उनको अपने बयानों पर कब बुकर-सूकर टाईप का पुरस्कार न मिल जाये, जैसे भारत की झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वालों को कुत्ता कहने के कारण आस्कर अवार्ड मिल गया था. सो मैं अडवांस में अरुन्धत्ती को संभावित किसी बड़े पुरस्कार के लिए लाल सलाम कहते हैं और बधाइयाँ भी देते हैं.
सोमवार, 25 अक्टूबर 2010
राहुल गाँधी को गंगा में फेंक देना चाहिए: शरद यादव
शरद यादव ऊपर से बहुत घबराहट में हैं, लेकिन अंदर से मुस्कुरा रहे हैं. उन्होंने अपने अटपटे भाषण से राहुल और नीतीश दोनों पर निशाना साधा है. उन्होंने राहुल और उनके स्वतंत्रता सेनानी परिवार की कटु आलोचना करते हुए कहा है कि भाषण देते हुए अपने कुरते की आस्तीन चढ़ाने वाले राहुल को गंगा में फेंक देना चाहिए.
उनको जो बोलना था, वे पूरी चालाकी के साथ बोल गए लेकिन, इससे नीतीश के लिए चुनावी रास्ता कठिन हो गया, क्योंकि शरद ने चुनावी मुद्दा ही बदल दिया और जो मुद्दा बढ़ाया है, वह घनघोर आलोचनों का शिकार होगा ही. अब शरद यादव की पार्टी जदयू भाजपा के साथ है, जो आरएसएस की एक इकाई है और आरएसएस ने तो कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन तक नहीं किया, उलटे उसने उस अभिनव भारत का साथ दिया जिसके एक सदस्य ने महात्मा गाँधी की ह्त्या कर दी थी. इस प्रकार शरद यादव ने जदयू के एक तीर(छाप) से दो-दो निशाने साधे और नीतीश को बता दिया कि वे उसके सामने दादागिरी न दिखाया करें.
इधर नीतीश, जदयू को अपनी जागीर की तरह देखने लग गए हैं. शरद जी को चटनी समझने लग गए हैं, सो शरद जी ने उनको समाजवादी दांव दिखला दिया है.
चाहे कुछ भी हो, शरद जी को भाजपाई लोगों के साथ रहते-रहते स्वतंत्र सेनानिओं के खिलाफ बोलने की भाजपाई-बीमारी लग गई है. भाजपाई लोग महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, डा. राजेंद्र प्रसाद आदि की आलोचना किया करते थे, लेकिन वे मोती लाल नेहरू की आलोचना नहीं किया करते थे, परन्तु शरद जी ने मोती लाल नेहरू से लेकर राहुल गाँधी तक की आलोचना कर और व्यक्तिगत आक्षेप कर, एक नया रिकार्ड बना दिया है. लेकिन, यह रिकार्ड नीतीश का भी रिकार्ड ख़राब कर देगा. पर शरद जी को क्या गम कि नीतीश की सरकार बिहार में फिर बने न बने.....नीतीश को पार्टी पर हावी होने की सजा तो मिलनी ही चाहिए. सो उन्होंने सजा दे दी है और अपने चुनावी भाषण का स्वयं लाभ उठा गए हैं.
अगर नीतीश को पता होता की शरद जी ऐसा गुल खिलायेंगे तो, वे उनको भी नरेंद्र मोदी की श्रेणी में रख देते. वरुण गाँधी की श्रेणी में रख देते- कट्टर सांप्रदाइक श्रेणी में रख देते.
अपने को असली और श्रेष्ठ सेक्यूलर मानने वाले नीतीश जी का मानना है कि भाजपा घटाव नरेन्द्र मोदी, घटाव वरुण गाँधी, एक विशुद्ध सेक्यूलर पार्टी है और अगर लोहिया जी जीवित होते तो वे आरएसएस और भाजपा की दोहरी सदस्यता ले लेते. आचार्य नरेंद्र देव जीवित होते तो वे समाजवाद में भाजपा के योगदान पर नीतीश के चश्मे से एक कीताब लिख डालते और उसे बुकर पुरस्कार मिलता.
उनको जो बोलना था, वे पूरी चालाकी के साथ बोल गए लेकिन, इससे नीतीश के लिए चुनावी रास्ता कठिन हो गया, क्योंकि शरद ने चुनावी मुद्दा ही बदल दिया और जो मुद्दा बढ़ाया है, वह घनघोर आलोचनों का शिकार होगा ही. अब शरद यादव की पार्टी जदयू भाजपा के साथ है, जो आरएसएस की एक इकाई है और आरएसएस ने तो कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन तक नहीं किया, उलटे उसने उस अभिनव भारत का साथ दिया जिसके एक सदस्य ने महात्मा गाँधी की ह्त्या कर दी थी. इस प्रकार शरद यादव ने जदयू के एक तीर(छाप) से दो-दो निशाने साधे और नीतीश को बता दिया कि वे उसके सामने दादागिरी न दिखाया करें.
इधर नीतीश, जदयू को अपनी जागीर की तरह देखने लग गए हैं. शरद जी को चटनी समझने लग गए हैं, सो शरद जी ने उनको समाजवादी दांव दिखला दिया है.
चाहे कुछ भी हो, शरद जी को भाजपाई लोगों के साथ रहते-रहते स्वतंत्र सेनानिओं के खिलाफ बोलने की भाजपाई-बीमारी लग गई है. भाजपाई लोग महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, डा. राजेंद्र प्रसाद आदि की आलोचना किया करते थे, लेकिन वे मोती लाल नेहरू की आलोचना नहीं किया करते थे, परन्तु शरद जी ने मोती लाल नेहरू से लेकर राहुल गाँधी तक की आलोचना कर और व्यक्तिगत आक्षेप कर, एक नया रिकार्ड बना दिया है. लेकिन, यह रिकार्ड नीतीश का भी रिकार्ड ख़राब कर देगा. पर शरद जी को क्या गम कि नीतीश की सरकार बिहार में फिर बने न बने.....नीतीश को पार्टी पर हावी होने की सजा तो मिलनी ही चाहिए. सो उन्होंने सजा दे दी है और अपने चुनावी भाषण का स्वयं लाभ उठा गए हैं.
अगर नीतीश को पता होता की शरद जी ऐसा गुल खिलायेंगे तो, वे उनको भी नरेंद्र मोदी की श्रेणी में रख देते. वरुण गाँधी की श्रेणी में रख देते- कट्टर सांप्रदाइक श्रेणी में रख देते.
अपने को असली और श्रेष्ठ सेक्यूलर मानने वाले नीतीश जी का मानना है कि भाजपा घटाव नरेन्द्र मोदी, घटाव वरुण गाँधी, एक विशुद्ध सेक्यूलर पार्टी है और अगर लोहिया जी जीवित होते तो वे आरएसएस और भाजपा की दोहरी सदस्यता ले लेते. आचार्य नरेंद्र देव जीवित होते तो वे समाजवाद में भाजपा के योगदान पर नीतीश के चश्मे से एक कीताब लिख डालते और उसे बुकर पुरस्कार मिलता.
शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010
सबके सब एक दूसर को नंगा-अधनंगा कर रहे हैं
बिहार में चुनावी राजनीति का पारा सातवें आसमान पर है. नेतालोग एक दूसर पर बेरहमी से आरोपों की बरसात कर रहे हैं. जनता बहुत खुश है कि सबके सब एक दूसर को नंगा-अधनंगा कर रहे हैं. लेकिन, लालू जी को बड़ी चिंता चिंता यह है कि नीतीश को रोकें कि राहुल को. बेचारे छटपटा रहे हैं. उनका दिमागे नहीं काम कर रहा है. पहले से उनको राहुल फैक्टर के बारे में कोई खाश अंदाज नहीं था. लेकिन, जो पहले चरण के चुनाव में दिखा वह चिंताजनक है.
वैसे, नीतीश जी कम परेशान नहीं हैं. उनको भाजपा के नेताओं के भाषणों से परेशानी है, क्योंकि वे घुमाफिरा कर साम्प्रदाइक बात परोस रहे हैं. दूसरी ओर, कांग्रेस सेंधमारी कर रही है.
राहुल सेन्ट्रल फंड का हिसाब मांग रहे हैं, और हिसाब-किताब रखने का काम तो बिहार में कब से बंद पड़ा है. उनको तो सिर्फ नरेंद्र मोदी के द्वारा भेजे गए पैसे के हिसाब से मतलब था, जिसको लौटा कर उन्होंने अपने आप को सेक्यूलर साबित करने का प्रयास किया है. यह उनके जीवन का सबसे बड़ा साहसिक कदम था. इस लोहियावादी ने साबित कर दिया कि वह भाजपा के दलदल में रहने के बाद भी बिल्कुल साफसुथरा है. पांच सौ प्रतिशत सेक्यूलर है.
आज हर कोई अपने आप को सेक्यूलर साबित करने पर तुला है. अब आडवाणी जी बिहार आये और बोले कि हमारे नरेन्द्र मोदी जी आकंठ सेक्यूलर हैं, लेकिन क्या करें उनके खिलाफ प्रचार ज़रा गलत हो गया.
मोदी जी के प्रचार आइटम से क्रोधित हो कर नीतीश जी ने भी उनके खिलाफ कुछ गलत प्रचार कर दिया. उनको और उनके कदम चिन्हों पर चल रहे वरुण गाँधी को भी बिहार दौरे से अलग कर कुछ ज्यादा ही गलत प्रचार कर दिया. वर्ना मोदी जी तो सच्चे सेक्यूलर हैं. अब इससे अधिक दुःख कि बात क्या हो सकती है कि मोदी जी कि छवि सिर्फ गलत प्रचार के कारण ख़राब हो गई है. ये अखबारवाले भी बड़े वाहियात हैं. जो मन में आता है अखबार में मोदी जी के नाम पर छाप देते हैं. बेचारा सच्चा सेक्यूलर सिपाही साम्प्रदाइक घोषित हो गाया है.
वैसे,आडवाणी जी भी कुछ कम सेक्यूलर नहीं हैं और चर्चा है कि इस बार शायद वे मस्जिद बनवाने के लिए रथयात्रा का प्रोग्राम बनायेंगे....उनको किसी भी हालत में बस एक बार प्रधानमंत्री बनना है. इस दिशा में उन्होंने जिन्ना साहब की तारीफ़ में क्या क्या नहीं किया. उनके चेले जशवंत जी भी ने जिन्ना भक्ति पर किताब लिख डाली. जशवंत जी तो पकिस्तान में तो काफी पॉप्यूलर हो गए, लेकिन अब देखना है कि गुरु चेले कि जोड़ी अपने नए इमेज को भारत में कितना भुना पाती है.
वैसे, नीतीश जी कम परेशान नहीं हैं. उनको भाजपा के नेताओं के भाषणों से परेशानी है, क्योंकि वे घुमाफिरा कर साम्प्रदाइक बात परोस रहे हैं. दूसरी ओर, कांग्रेस सेंधमारी कर रही है.
राहुल सेन्ट्रल फंड का हिसाब मांग रहे हैं, और हिसाब-किताब रखने का काम तो बिहार में कब से बंद पड़ा है. उनको तो सिर्फ नरेंद्र मोदी के द्वारा भेजे गए पैसे के हिसाब से मतलब था, जिसको लौटा कर उन्होंने अपने आप को सेक्यूलर साबित करने का प्रयास किया है. यह उनके जीवन का सबसे बड़ा साहसिक कदम था. इस लोहियावादी ने साबित कर दिया कि वह भाजपा के दलदल में रहने के बाद भी बिल्कुल साफसुथरा है. पांच सौ प्रतिशत सेक्यूलर है.
आज हर कोई अपने आप को सेक्यूलर साबित करने पर तुला है. अब आडवाणी जी बिहार आये और बोले कि हमारे नरेन्द्र मोदी जी आकंठ सेक्यूलर हैं, लेकिन क्या करें उनके खिलाफ प्रचार ज़रा गलत हो गया.
मोदी जी के प्रचार आइटम से क्रोधित हो कर नीतीश जी ने भी उनके खिलाफ कुछ गलत प्रचार कर दिया. उनको और उनके कदम चिन्हों पर चल रहे वरुण गाँधी को भी बिहार दौरे से अलग कर कुछ ज्यादा ही गलत प्रचार कर दिया. वर्ना मोदी जी तो सच्चे सेक्यूलर हैं. अब इससे अधिक दुःख कि बात क्या हो सकती है कि मोदी जी कि छवि सिर्फ गलत प्रचार के कारण ख़राब हो गई है. ये अखबारवाले भी बड़े वाहियात हैं. जो मन में आता है अखबार में मोदी जी के नाम पर छाप देते हैं. बेचारा सच्चा सेक्यूलर सिपाही साम्प्रदाइक घोषित हो गाया है.
वैसे,आडवाणी जी भी कुछ कम सेक्यूलर नहीं हैं और चर्चा है कि इस बार शायद वे मस्जिद बनवाने के लिए रथयात्रा का प्रोग्राम बनायेंगे....उनको किसी भी हालत में बस एक बार प्रधानमंत्री बनना है. इस दिशा में उन्होंने जिन्ना साहब की तारीफ़ में क्या क्या नहीं किया. उनके चेले जशवंत जी भी ने जिन्ना भक्ति पर किताब लिख डाली. जशवंत जी तो पकिस्तान में तो काफी पॉप्यूलर हो गए, लेकिन अब देखना है कि गुरु चेले कि जोड़ी अपने नए इमेज को भारत में कितना भुना पाती है.
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