राष्ट्रीय दल का कार्यालय....और लोकल समस्या पर छुटभैये नेता टाकिंग कर रहे थे...एक ने कहा ए गो समस्या का प्राब्लम रहे तो बात है, यहाँ तो केतना केतना साल गुजर गया एक बार भी लारिलप्पा नहीं किये...बिना एम टानिक के अब एक्को दिन नहीं चलेगा....बीच में थोड़े दिनों के लिए इनडैरेक्ट मौको मिला तो बड़कन नेता लोग टकसाल ऊपरे-ऊपरे ले उड़े...यहाँ वर्कर का तो कोई महत्व का इम्पोर्टेंस नहीं है....
दूसर छुटभैये ने कहा," अरे का बतियाते हो तुम...हम नहीं जानते हैं कि 'के राज' में तुम केतना लारीलप्पा किए हो ? उ जे तुमारा बसवा चल रहा है उ का तुमरे कमाई का है? का उ ऊपरे से सड़कवा पर टपक गया ?'
तभी एक लल्लू जी आये और अखबार दिखलाते हुए पूरी बौद्धिकता के साथ बोले,'अरे तुम लोगन सिर्फ अपनी समस्या के प्राब्लेम पर टाकिंग पर टाकिंग कर रहे हो...ज़रा ई खबरवा तो पढ़ो...केंद्र में हमरा राज है और केंद्र का परतीनिधी हमरे नेतवा का सुनबे नहीं करता है. उ जो सुनता है तो सिर्फ मंत्री भैया का ही सुनता है...लेकिन अब नया रिप्लेसमेंट आयेगा...जो सिर्फ हिन्दी जानेगा और कुच्छो नहीं और हमरे नेता जी को सुनेगा... और मंत्री भैया जी को घासे नहीं डालेगा....समझे... इसको कहते हैं राष्ट्रभाषा का राजनीतिक यूज ....देखो, मंत्री भैया जी भी अंग्रेजी नहीं जानते हैं और फिर भी जब बोलते हैं तो हमरे अंग्रेजी के टीचर जी हँसते हैं.. लेकिन उनका दिल्लीवाली हिंदी का स्पोकेन केतना अच्छा है...अभियो जा के तुम लोगन हिंदी फ्लूएंट स्पीकिंग के लिए दिल्ली वाली हिंदी का स्पोकेन क्लास करो...और नहीं सीखोगे तो खेतवा में ग्रेज़िंग करते रह जाओगे...बूझे कि नहीं बूझे ?'
मुरली जी ने अपनी मुरली बजाई," हाँ ई तो सेंटे परसेंट ओके है कि हिंदी जब हम लोगों का मदर टंग है तो सीखना ही होगा. मेरे को भी सीखने का मन है, उ भी दिल्ली वाला हिंदिये...थोड़ा डिफीकल्ट है लेकिन इंगलिश जेतना डिफीकल्ट नहीं....हम तो देल्लीए वाला हिंदी का प्रैक्टिस करबे करते हैं....प्रैक्टिस विल मेक योर हिंदी परफेक्ट...अंडरस्टैंड किये कि नहीं?"
एक छुटभैया जी से रहा नहीं गया,"देखो बस स्टैंड के एजेंट जी, यहाँ आला जी हिंदी जानते हैं कि नहीं, इसका कौनो सवाले में क्वेश्चने नहीं उठाता है. सवाल में क्वेश्चंवा ई है कि 'के -कांड' का सी बी आई से जाँच काहे हो रहा है...ई जांच का फंदवा तो सभ्भे पार्टिया के बड़कन नेतवन पर परबे करेगा...चार पार्टी का सिंडीकेट बना है ताकि "के कांड" की जाँच से बचने का रस्तवा तलाशा जाये....अंडरस्टैंड कि नहीं अंडरस्टैंड?

सर मुझे आपके लेखनी के बारे में पता ही नहीं था... ग़र मालूम होता तो शायद रांची छोड़ कर दर-दर की ठोकरे नहीं खाता वहीं दोनों बाप बेटा मिलकर कुछ धमाल कर देते... ख़ैर अभी भी देर नहीं हुई है... कोशिश है कि आपके सानिध्य में जल्द से जल्द आऊं......
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